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मन का रिश्ता

 “रिया, चल ना… आज नई मूवी लगी है, और सुन… शो हाउसफुल जा रहा है!” कशिश ने फोन पर लगभग हुक्म चलाते हुए कहा।

रिया ने किचन की घड़ी की ओर देखा—साढ़े पाँच बज रहे थे। गैस पर दाल का आख़िरी उबाल था, और ड्राइंग रूम में सोफ़े पर बैठी शांति देवी टीवी के सामने ऊँघ रही थीं। रिया ने धीमे स्वर में कहा, “कशिश, आज नहीं जा पाऊँगी। अम्मा को अकेला छोड़कर… मन नहीं मान रहा।”

“अम्मा… अम्मा…” कशिश ताना मारकर हँसी, “यार तू भी दिन भर उन्हीं के पीछे लगी रहती है। वो तेरी सगी सास भी तो नहीं हैं। बस… कागज़ों वाली मां है। तू ही बता—इतनी बड़ी कुर्बानी क्यों?”

रिया का चेहरा एकदम सख़्त हो गया। उसने चम्मच सिंक में रखा और फोन कान से हटाकर एक पल साँस ली। फिर बहुत संयम से बोली, “कशिश… मां मां होती है। ‘सगी’ और ‘अपनी’ का टैग हम लगाते हैं, प्यार नहीं। अम्मा ने ही अयान को पाल-पोसकर बड़ा किया है। पढ़ाया, नौकरी लगवाई। पता नहीं अपने कितने सपने दबा दिए होंगे उन्होंने। अब अगर उन्हें मेरी ज़रूरत है तो मैं उन्हें अकेला कैसे छोड़ दूँ?”

“अरे, इतना सीरियस मत हो। मैं तो मज़ाक कर रही थी।” कशिश का स्वर हल्का हुआ,, “चल छोड़… मैं किसी और को ले जाती हूँ।”

फोन कट गया।

रिया ने खाना बनाते-बनाते भी वही लाइन मन में सुनी—“कागज़ों वाली मां।” उसे लगा जैसे किसी ने उसके भीतर की सबसे मुलायम चीज़ को खुरच दिया हो। वह जानती थी, शांति देवी ने अयान को जन्म नहीं दिया था। पर उन्होंने उसे “अपनाया” जरूर था—और अपनाने का मतलब सिर्फ घर में जगह देना नहीं होता, अपने जीवन में जगह देना होता है।

शांति देवी… के पति के गुजर जाने के बाद, उन्होंने अनाथालय से अयान को गोद लिया था। तब लोग तरह-तरह की बातें करते थे—“अपने खून का बच्चा नहीं है,” “किसका वंश बढ़ाओगी?” “कल को छोड़कर चला गया तो?” पर शांति देवी मुस्कुरा कर कह देतीं—“खून से रिश्ते बनते हैं, पर निभते हैं संस्कार से।”

आज वही शांति देवी उम्र की ढलान पर थीं। घुटनों में दर्द रहता, शुगर की दिक्कत, और कभी-कभी याददाश्त भी साथ छोड़ देती। वो बोलती नहीं थीं, पर रिया समझ जाती थी—उनकी चुप्पी में कितनी थकान है।

शाम को अयान ऑफिस से लौटा। आते ही उसने टाई ढीली की और बोला, “रिया, आज तुम बहुत थकी लग रही हो।”

रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, “बस… थोड़ा सा।”

अयान ने ध्यान से देखा, “कुछ हुआ है? कशिश ने कुछ कहा क्या?”

रिया चौंकी, “तुम्हें कैसे पता?”

मुझे भी फ़ोन किया था मैं उठा नहीं पाया था 


रिया ने बात बदल दी, “मैंने कशिश को मना कर दिया मूवी के लिए।”

अयान हल्का सा हँसा, “और तुमने सही किया। चलो, आज माँ और हम दोनों साथ में छत पर बैठकर चाय पीते हैं।”

चाय के साथ रिया ने बेसन के छोटे-छोटे लड्डू रख दिए। शांति देवी ने एक उठाया, फिर रिया की तरफ देखकर अचानक बोल पड़ीं, “तू… मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी जैसी है।”

रिया का गला भर आया। उसने बस इतना कहा, “अम्मा… आप ठीक से खाइए, बस।”

उस रात रिया को देर से नींद आई। कशिश के शब्द उसके कान में बजते रहे, और शांति देवी की आँखों में छुपी सी तसल्ली भी… जैसे कोई कह रहा हो—“किसी रिश्ते को ‘सगा’ बनने में वक्त लगता है, पर ‘अपना’ बनने में नीयत लगती है।”

अगले दिन सुबह रिया नाश्ता बना रही थी कि शांति देवी अचानक सीढ़ियों से गिर पड़ी । उनका चेहरा पीला पड़ गया, और वे दीवार का सहारा लेकर खड़ी रहीं। रिया दौड़ी, “अम्मा! क्या हुआ?”

शांति देवी बोल नहीं पा रही थीं। रिया ने तुरंत अयान को आवाज़ दी। अयान भागते हुए आया, “अम्मा!”

कुछ ही मिनटों में एंबुलेंस बुला ली गई। डॉक्टर ने कहा—“लो बीपी और डिहाइड्रेशन… उम्र है, सावधानी रखनी होगी। आज यहीं ऑब्ज़र्वेशन में रखेंगे।”

अयान का चेहरा चिंता से भरा था। रिया ने उसका हाथ दबाकर कहा, “तुम घबराओ मत। मैं यहीं हूँ।”

अस्पताल के बाहर बैठी रिया को कशिश का फोन आया। “रीया, कल वाली बात के लिए… सॉरी। मैं बस…”

रिया ने उसे बीच में रोक दिया, “कशिश, अभी मैं अस्पताल में हूँ। अम्मा की तबीयत खराब है।”

“ओह! तुमने बताया क्यों नहीं? मैं आती हूँ।” कशिश की आवाज़ अब सचमुच नरम थी।

“आ जाना… पर एक बात समझना,” रिया ने धीरे से कहा, “किसी का ‘अपना’ होना खून से नहीं, साथ से तय होता है। अम्मा ने हमारे लिए जो किया… वो कोई ‘कागज़’ नहीं कर सकता।”

कशिश कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “मैं आ रही हूँ।”

शाम को कशिश अस्पताल आई। पहली बार उसने शांति देवी को इतने करीब से देखा—उम्र से झुकी हुई, पर चेहरे पर एक ठहराव। रिया उनके लिए सूप लेकर आई, फिर दवा की पर्ची संभाल रही थी। अयान पानी भर रहा था। कशिश ने धीरे से कहा, “यार… तुम दोनों तो जैसे एक टीम हो।”

रिया मुस्कुराई, “घर ऐसे ही चलता है।”

कशिश ने फुसफुसाकर पूछा, “वो… सच में… उन्होंने अयान को गोद लिया था?”

“हाँ,” रिया ने सिर हिलाया, “और गोद लेना कोई छोटी बात नहीं होती। वो अपना जीवन बांटना होता है।”

कशिश ने शांति देवी की तरफ देखा। फिर अचानक बोली, “मैंने कल जो कहा… मैं शर्मिंदा हूँ। मैं समझ नहीं पाई।”

रिया ने कुछ नहीं कहा। बस इतना बोली, “समझ आ जाए… वही काफी है।”

अगले दो दिन शांति देवी अस्पताल में रहीं। रिया ने एक पल भी ढील नहीं दी—दवा, खाना, रिपोर्ट, बीपी, सब। अयान रात में भी जागकर उनका ध्यान रखता। तीसरे दिन डॉक्टर ने छुट्टी दे दी, मगर साथ में चेतावनी भी—“अकेला न छोड़िए। खान-पान और दवाइयों का ध्यान रहे।”

घर लौटते ही रिया ने अम्मा का कमरा आरामदायक बना दिया—साइड टेबल, पानी की बोतल, दवाइयों का डिब्बा, हल्की रौशनी वाला लैंप। शांति देवी ने उसे देखा और हौले से कहा, “इतना सब… मेरे लिए?”

रिया ने उनकी हथेली पर हाथ रखा, “अम्मा, आप ही तो हमारा घर हैं।”

इसी बीच एक अजीब बात हुई। कशिश का फोन फिर आया—उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। “रिया… मेरी सास की तबीयत… बहुत बिगड़ गई है। और… सच बोलूँ… मैं डर गई हूँ।”

रिया ने बिना कुछ पूछे कहा, “मैं आ रही हूँ।”

कशिश के घर का माहौल अलग था—तेज़ आवाज़ें, शिकायतें, और एक कोने में बैठी बुज़ुर्ग महिला, जिनकी आँखें भीगी थीं। कशिश ने रिया का हाथ पकड़कर कहा, “मैंने हमेशा उन्हें बोझ समझा। मुझे लगा… वो मेरी जिंदगी में रुकावट हैं। पर आज जब डॉक्टर ने कहा कि ‘ख़तरा है’, तो… मुझे लगा मैं कितनी गलत थी।”

रिया ने बुज़ुर्ग महिला के पास जाकर पानी दिया, सिर सहलाया। फिर कशिश से धीमे स्वर में कहा, “देख… इंसान रिश्ते ‘सुविधा’ से निभाएगा तो रिश्ते थक जाएंगे। और ‘आदर’ से निभाएगा तो रिश्ते सांस लेंगे।”

कशिश की आँखों से आँसू बह निकले। “मैं बदलना चाहती हूँ, रिया… बस डर लगता है कि देर हो गई।”

रिया ने उसे देखा, “देर तब होती है जब इंसान जिद पर अड़ा रहे। अगर मन में पछतावा है तो शुरुआत अभी से कर।”

उस रात कशिश ने अपनी सास के पास बैठकर पहली बार उनका हाथ पकड़ा। “माँ… मुझे माफ कर दीजिए। मैं… मैं बहुत गलत थी।”
बुज़ुर्ग महिला ने कमजोर आवाज़ में सिर्फ इतना कहा, “बेटा… बस अब प्यार से बोल दिया कर… यही काफी है।”

रिया जब घर लौटी, तो शांति देवी जाग रही थीं। उन्होंने रिया का चेहरा देखकर पूछा, “कहाँ गई थी?”

रिया ने उनके पास बैठते हुए कहा, “अम्मा, किसी को समझाने गई थी कि मां… मां होती है।”

शांति देवी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने रिया के सिर पर हाथ रखा, “तूने मेरे अयान को अच्छा घर दिया, बेटा… और मुझे… अपना मन।”

अयान दरवाजे पर खड़ा यह सब सुन रहा था। उसने आगे बढ़कर रिया के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “रिया… मैंने तुमसे शादी नहीं की थी… मैंने एक इंसान को चुना था। और आज मैं समझ गया हूँ कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसकी डिग्री या नौकरी नहीं होती… उसकी पहचान उसके रिश्ते निभाने का तरीका होता है।”

रिया की पलकों के कोने भीग गए। उसने बस मुस्कुरा दिया।

कुछ हफ्तों बाद कशिश ने रिया को फिर फोन किया। इस बार उसकी आवाज़ में हल्कापन था। “रिया, आज मेरी सास ने मेरे लिए अपने हाथों से खिचड़ी बनाई। और मैंने… पहली बार उन्हें ‘माँ’ कहा। यकीन कर… उस एक शब्द से उनका चेहरा खिल गया।”

रिया ने आँखें बंद करके कहा, “देखा… रिश्तों में सबसे बड़ा इलाज सम्मान होता है।”

शांति देवी धीरे-धीरे बेहतर होने लगीं। रिया और अयान ने तय किया कि अब हर महीने एक दिन सिर्फ अम्मा के नाम होगा—उनके साथ बैठना, पुरानी बातें सुनना, उनकी पसंद का खाना बनाना। अम्मा कभी-कभी बस चुप रहतीं, मगर उनकी चुप्पी में अब अकेलापन नहीं था—सुकून था।

और रिया के भीतर एक नया विश्वास जन्म ले चुका था—कि दुनिया चाहे रिश्तों को “सगा-सौतेला” कहकर बाँट दे, पर इंसान अगर दिल से अपना ले, तो मां की ममता भी “कागज़” नहीं देखती, सिर्फ अपनापन देखती है।

उस दिन रिया ने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए खुद से कहा—“मां बनने के लिए जन्म देना ज़रूरी नहीं… और बेटी बनने के लिए खून का रिश्ता नहीं… बस मन का रिश्ता चाहिए।”
लेखिका : संगीता त्रिपाठी

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