बरामदे में कुर्सियाँ सजी थीं, पीतल के लोटों में पानी रखा था और रसोई से घी की महक आ रही थी। घर की दीवारों पर नए तोरण टँगे थे, पर भीतर की हवा में घुटन थी। मैं—नंदिनी—पास वाले मकान में रहती हूँ। आज सुबह से ही इस घर में शोर था, क्योंकि आज ईशा की सगाई थी… और उसी के साथ उसके भाई कुणाल की सगाई भी तय थी। गाँव में इसे “जोड़ी का रिश्ता” कहते हैं, बुजुर्ग इसे परंपरा कहते हैं, और लड़कियाँ इसे अपने सपनों का सौदा।
ईशा को देखते ही उसकी माँ लक्ष्मीदेवी का गुस्सा जैसे फूट पड़ा। उसने आवाज़ दबाकर कहा,
“अरी अभागिन, इतने लोगों के बीच तमाशा करेगी क्या? जल्दी तैयार हो जा।”
ईशा के चेहरे पर मेकअप की परत नहीं थी—थकान और डर की परत थी। उसने धीमे पर साफ स्वर में कहा,
“मैं कितनी बार कह चुकी हूँ… मैं ये शादी नहीं करूँगी। आप लोग मेरी ज़िंदगी को क्यों जबरदस्ती…?”
लक्ष्मीदेवी ने उसकी बात बीच में काट दी, “ज़्यादा मुँह मत चला। कुणाल की शादी तभी होगी, जब तेरी होगी। मुझे नहीं चाहिए कि उसके काम में कोई रुकावट आए। चुपचाप तैयार हो जा। किसी ने सुन लिया ना… तो घर की नाक कट जाएगी।”
नाक… इज्ज़त… औरत के नाम पर वही पुराने शब्द।
लक्ष्मीदेवी ने मुझे देख लिया तो, जैसे मजबूरी के तिनके का सहारा मिला हो। वह मुझे बाहर ले आई और धीरे से बोली, “नंदिनी, तू अंदर जा… बहू को बोल… ईशा को तैयार कर दे… बस, आज का दिन निकल जाए।”
मैंने कुछ कहना चाहा, पर गला सूख गया। सच कहूँ तो अंदर ही अंदर मुझे भी गलत लग रहा था, पर जिस घर में बारात बैठी हो, वहाँ “गलत” बोलने की हिम्मत कौन करे? समाज में पड़ोस का घर भी आधा ससुराल जैसा होता है—अगर तुमने आवाज़ उठाई तो कल तुम्हारी बेटी की बातों पर भी वही उंगली उठेगी।
लक्ष्मीदेवी की बहू सोनम हड़बड़ाकर ईशा के कमरे में गई।
“ईशा दीदी, प्लीज़ जिद मत कीजिए। लोग बैठे हैं, तमाशा हो जाएगा। घर की इज्ज़त…”
ईशा ने सोनम की तरफ देखा, उसकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ काँपी नहीं।
“तो घर की इज्ज़त के लिए मैं खुद को गिरवी रख दूँ? क्या आपको नहीं दिख रहा कि मेरे साथ क्या हो रहा है? मैं कोई गुड़िया नहीं हूँ जिसे जोड़ियों में बाँध दिया जाए।”
सोनम ने थकी हुई निगाहों से कहा, “दीदी, मैं समझती हूँ… पर अभी आप तैयार हो जाइए… फिर बात करेंगे।”
“फिर?” ईशा ने फीकी हँसी हँसी। “फिर… किसके बाद? शादी के बाद? जहाँ ‘फिर’ बोलने का हक भी नहीं रहता?”
फिर भी, ईशा ने जैसे-तैसे सलवार-कमीज़ पहनी, बाल बाँधे। बाहर खड़ी लक्ष्मीदेवी को देखकर उसने अपने आँसू पोंछ लिए। वह जानती थी—आज अगर वह रोई तो उसे “कमजोर” कहा जाएगा, और अगर वह लड़ी तो “कुलछिन्न”।
दोपहर होते-होते लड़के वाले भी आ गए। ढोलक की थाप पर रस्में शुरू हुईं। हँसी, फोटो, मिठाई—सब कुछ वैसा ही था जैसा हर सगाई में होता है। फर्क बस इतना था कि एक लड़की की सांसें दबी हुई थीं।
रिंग से पहले ईशा को लेने लक्ष्मीदेवी ही कमरे की तरफ गई। दो मिनट बाद वह जैसे हवा में से लौट आई—चेहरा पीला, आवाज़ काँपती।
“ई… ईशा कमरे में नहीं है!”
पहले तो सबने सोचा—शायद बाथरूम में होगी। फिर कमरे, फिर छत, फिर रसोई… मगर घर के पीछे वाला छोटा दरवाजा खुला मिला। आँगन में पड़ा दुपट्टा हवा में हिल रहा था। किसी ने धीरे से कहा, “लड़की… निकल गई।”
मुझे लगा जैसे समय का पहिया अटक गया। बाहर बैठे मेहमानों की बातों का शोर तेज हो गया—
“क्या? लड़की भाग गई?”
“हमें बेइज्जत करने बुलाया था क्या?”
“काहे का समधी… आपकी बेटी ने हमारी नाक काट दी!”
लक्ष्मीदेवी हाथ जोड़कर कहने लगी, “हमें नहीं पता था… वह कमरे में ही थी… पता नहीं कैसे…”
उधर से लड़के वालों के मुखिया हरिशंकर ने सख्ती से कहा, “भूल जाइए ये रिश्ता। शर्त यही थी—आपकी बेटी हमारी बहू बनेगी, तभी हमारी बेटी आपके घर की बहू बनेगी। अब कोई शादी-विवाह नहीं।”
और वे उठकर चले गए। मेहमानों की भीड़ में अब रस्म नहीं, रायता फैल चुका था। कोई घड़ी-घड़ी उंगली उठा रहा था, कोई दाँत पीस रहा था।
“कैसी औलाद है, माँ-बाप की इज्ज़त मिट्टी में मिला गई!”
“ऐसी लड़कियाँ कुल-घातिनी होती हैं!”
“अरे, कुणाल की सगाई टूट गई, सब इसकी वजह से!”
ईशा के पिता राजीव का चेहरा लाल हो गया। उसने दहाड़कर कहा, “मर गई वो मेरे लिए। नहीं चाहिए ऐसी बेटी।”
लक्ष्मीदेवी रोते-रोते गाल पीटने लगी, “पैदा होते ही मर जाती तो अच्छा था!”
मैं उनके बीच खड़ी थी, पर मुँह से शब्द नहीं निकले। मेरे मन में सिर्फ एक सवाल था—जिस लड़की ने हजार बार कहा कि “मैं नहीं चाहती,” क्या वह फिर भी दोषी है?
शाम तक पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाने की बातें शुरू हो गईं। “अपहरण” शब्द भी हवा में घूमा, जैसे लड़की की अपनी इच्छा कोई चीज़ ही नहीं। तभी सोनम ने धीमे से मेरे कान में कहा, “भाभी… ईशा दीदी का फोन आया था… उसने कहा—‘चिंता मत करना… मैं सुरक्षित हूँ।’”
मैं चौंकी। “कहाँ है वो?”
सोनम ने हकलाकर कहा, “उसने बस इतना कहा कि… वह शहर के… महिला सहायता केंद्र में है।”
मेरे भीतर का डर अचानक टूटकर साहस बन गया। मैंने तुरंत अपने पति को बताया और सोनम को साथ लेकर शहर की तरफ निकल पड़ी। रास्ते भर मेरे कानों में वही शब्द बजते रहे—कुलछिन्न, कुलघातिनी… और मेरे मन में एक अलग ही आवाज़—जिंदा रहने की कोशिश।
महिला सहायता केंद्र के बाहर हमें ईशा मिली। वह थकी हुई थी, पर आँखों में कोई अपराधबोध नहीं था। उसकी कलाई पर एक छोटा-सा कट था—शायद झाड़ियों से निकलते वक्त लगा होगा—पर उसकी पीठ सीधी थी।
उसने मुझे देखते ही कहा, “मैंने भागकर किसी का घर नहीं तोड़ा, दीदी… मैंने बस खुद को टूटने से बचाया है।”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। “तू अकेली कैसे?”
ईशा ने कहा, “मेरी कॉलेज की प्रोफेसर ने हेल्पलाइन नंबर दिया था। मैं पीछे वाले दरवाजे से निकली, बस स्टॉप तक भागी… फिर सीधे यहीं आई। मुझे पता था—अगर मैं वहीं रुकती… तो या तो मैं ज़बरदस्ती में ढकेल दी जाती, या मैं खुद को खत्म कर देती।”
उसका स्वर काँप गया, पर वह रुकी नहीं।
“सब कहते हैं—लड़ाई करो। मैं कब नहीं लड़ी? मैं हर दिन लड़ी, हर रात लड़ी। पर जब घर ही दुश्मन बन जाए, तब लड़ाई सिर्फ शब्दों से नहीं जीतते… तब बचने के लिए निकलना पड़ता है।”
अगले दिन मामला थाने तक पहुँचा। सहायता केंद्र की काउंसलर अनामिका मैडम और एक वकील शिवानी भी आईं। उन्होंने साफ कहा—“ईशा बालिग है। उसने किसी को धोखा नहीं दिया, उसने अपनी मर्जी से सुरक्षित जगह चुनी है। उस पर कोई मुकदमा नहीं बनता।”
घर वाले बौखला गए। राजीव बोले, “ये हमारी इज्ज़त…”
वकील शिवानी ने शांत पर कड़ी आवाज़ में कहा, “इज्ज़त आपकी बेटी की जान से बड़ी नहीं है। और ‘जोड़ी का रिश्ता’ आपकी सुविधा हो सकती है, लड़की की सहमति नहीं।”
तभी एक ऐसा मोड़ आया जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। कुणाल—जिसकी सगाई टूटने का शोर मचा था—थाने में आ गया। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, शर्म थी। उसने पिता से कहा,
“पापा… आप लोग ईशा को दोष दे रहे हो, पर दोष हमारा है। हम सबने उसे सुना ही नहीं। मेरी शादी के लिए आप उसकी जिंदगी गिरवी रख रहे थे… ये ठीक नहीं।”
लक्ष्मीदेवी ने झल्लाकर कहा, “अब तू भी इसी की तरफदारी करेगा?”
कुणाल का गला भर आया, “माँ… मैं भाई हूँ। मैं अपनी बहन की बर्बादी पर अपना घर बसाकर खुश नहीं रह सकता।”
कुणाल की इस एक लाइन ने कमरे की हवा बदल दी। पहली बार राजीव चुप हुए। लक्ष्मीदेवी के चेहरे पर ज़िद की जगह डर आया—डर अपने बेटे के सवालों का, डर अपने ही बनाए नियमों के टूटने का।
तीन दिन बाद पंचायत बैठी। वही लोग जो पहले “कुलघातिनी” कह रहे थे, अब कानाफूसी कर रहे थे—“कुणाल ने सही कहा… बहन की बिना मर्जी…”
किसी ने फुसफुसाया, “आजकल कानून भी सख्त है…”
और किसी ने बस इतना कहा, “लड़की ने गलत क्या किया…?”
ईशा गाँव नहीं लौटी। वह शहर में रहकर पढ़ाई पूरी करना चाहती थी। सहायता केंद्र की मदद से उसे एक छोटा-सा जॉब भी मिल गया। जाते-जाते उसने माँ-बाप को संदेश भिजवाया—
“मैं आपसे नफरत नहीं करती। मैं बस खुद से प्यार करना सीख रही हूँ। जब आप भी मेरी मर्जी को सम्मान देंगे, तब मिलूँगी।”
उधर कुणाल ने घर में साफ कह दिया कि वह अपनी शादी “शर्त” पर नहीं करेगा। उसने काम ढूँढा, खुद कमाना शुरू किया। धीरे-धीरे घर वाले समझने लगे कि रिश्ते “आटा-साठा” से नहीं, इंसानियत से टिकते हैं।
छह महीने बाद एक दिन मैं दूध लेने बाहर निकली तो देखा—लक्ष्मीदेवी मंदिर के बाहर बैठी थी। आँखों में वही पुरानी कठोरता नहीं थी। उसने मुझे बुलाया और बहुत धीमे कहा,
“नंदिनी… ईशा… ठीक है न?”
मैंने पहली बार उसके चेहरे पर माँ देखी, सिर्फ “घर की रखवाली” करने वाली औरत नहीं। मैंने कहा, “ठीक है… काम भी कर रही है… पढ़ भी रही है।”
लक्ष्मीदेवी की आँखें भर आईं। “मैंने… उसे समझा नहीं… मुझे लगा… मैं सही कर रही हूँ…”
मैंने जवाब नहीं दिया। कुछ जवाब ऐसे होते हैं जो वक्त ही देता है।
साल भर बाद ईशा घर आई। अकेली नहीं—अपने साथ आत्मविश्वास लेकर। उसने माँ के पाँव छुए। लक्ष्मीदेवी ने उसे कसकर पकड़ लिया। उस आलिंगन में माफी भी थी और पछतावा भी।
ईशा ने बस इतना कहा, “मैं लौट आई हूँ… पर वही पुरानी ईशा नहीं। अब आप मेरे लिए फैसले नहीं लेंगी… हम साथ बैठकर बात करेंगे।”
राजीव ने सिर झुकाकर कहा, “ठीक है बेटा… अब… हम सुनेंगे।”
और उस दिन मुझे पहली बार लगा कि यह घर “इज्ज़त” के डर से नहीं, समझ के सहारे चलने की कोशिश कर रहा है।
गाँव में अब भी बातें होती हैं—बातें तो होंगी ही। पर अब एक नई बात भी होने लगी थी—
“लड़की भागी नहीं थी… उसने खुद को बचाया था।”
कभी-कभी एक लड़की का एक कदम, एक पूरे घर की सदियों पुरानी जिद को आईना दिखा देता है।
और सच यही है—बेटियों को आगे करके बेटों की शादी नहीं, बेटों को इतना सक्षम बनाओ कि रिश्ते मजबूरी नहीं, सम्मान से जुड़ें।
लेखिका : आरती शुक्ला
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