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रिवाज़ों का रंग

घर के आंगन में हल्दी की रस्म का जश्न पूरे शबाब पर था। ढोलक की थाप और मंगल गीतों के बीच, पीली साड़ी में लिपटी श्रेया खिलखिला रही थी। आज उसका हल्दी का समारोह था, और पूरा घर रिश्तेदारों और सहेलियों से भरा हुआ था।

इन सबके बीच, एक कोने में खड़ी कावेरी चाची चुपचाप सब कुछ देख रही थीं। उन्होंने एक सादी सफेद साड़ी पहनी हुई थी, माथे पर कोई बिंदी नहीं, और कलाई सूनी। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में एक गहरा दर्द तैर रहा था, जिसे केवल कोई बहुत करीबी ही पढ़ सकता था।

कावेरी चाची श्रेया की सबसे छोटी बुआ थीं। पांच साल पहले, एक भयानक कार हादसे में उनके पति और छोटे बेटे की मौत हो गई थी। तब से, घर की हर खुशी, हर त्यौहार उनके लिए बस एक मूक दर्शक बनने का जरिया रह गया था। समाज और परिवार के अलिखित नियमों ने उन्हें रंगों से, खुशियों से और यहाँ तक कि शुभ कार्यों में सीधी भागीदारी से भी दूर कर दिया था।

श्रेया की हल्दी लगाने की बारी आई। एक-एक करके सभी सुहागन स्त्रियाँ आगे आईं, हल्दी की कटोरी में उंगली डुबोई और श्रेया के गालों पर लगाई। श्रेया की माँ, दादी, बड़ी चाची—सबने उसे आशीर्वाद दिया।

श्रेया की नज़रें लगातार कावेरी चाची को ढूंढ रही थीं। बचपन में कावेरी चाची ही उसे सबसे ज्यादा लाड़ करती थीं। जब उसे चोट लगती थी, तो चाची ही उसे गोद में उठाकर लोरी सुनाती थीं। आज, अपनी जिंदगी के इतने बड़े दिन पर, वह चाहती थी कि चाची उसे सबसे पहले हल्दी लगाएं।

लेकिन कावेरी चाची पीछे खड़ी थीं, एक खंभे के सहारे। उन्हें पता था कि उनका आगे आना अपशगुन माना जाएगा।

अचानक, श्रेया अपनी जगह से उठी। हल्दी से सने हाथों के साथ वह सीधे कावेरी चाची की तरफ बढ़ी। पूरा आंगन सन्न रह गया। ढोलक की थाप रुक गई। गीतों के बोल गले में अटक गए।

"कावेरी बुआ, आप मुझे हल्दी नहीं लगाएंगी?" श्रेया ने बहुत ही मासूमियत और हक़ से पूछा।

कावेरी चाची सकपका गईं। उन्होंने घबराकर चारों तरफ देखा। श्रेया की दादी, यानी उनकी अपनी सास, की भौंहें तन गई थीं।

"श्रेया, बेटा, जििद मत कर। जा अपनी जगह बैठ," कावेरी ने धीमे स्वर में कहा, उनकी आवाज़ कांप रही थी। "मैं... मैं दूर से ही आशीर्वाद दे रही हूँ न।"

"आशीर्वाद दूर से नहीं, स्पर्श से मिलता है बुआ," श्रेया ने उनका हाथ पकड़ लिया। "और मुझे आपका आशीर्वाद सबसे ज्यादा चाहिए। आपने मुझे गोद में खिलाया है, उंगली पकड़कर चलना सिखाया है। आज जब मैं नई जिंदगी शुरू करने जा रही हूँ, तो आप मुझे अछूत क्यों मान रही हैं?"

"अरे, ये क्या तमाशा है?" दादी की कड़क आवाज़ गूंजी। "श्रेया, होश में है तू? यह विधवा है। शुभ कार्यों में इनका हाथ लगाना अशुभ होता है। हमारे खानदान की परंपरा मत भूल।"

श्रेया ने पलटकर दादी की आँखों में देखा। आज उसकी आँखों में लिहाज तो था, लेकिन डर नहीं।

"परंपरा, दादी? कौन सी परंपरा? वो परंपरा जो कहती है कि एक औरत का अस्तित्व सिर्फ उसके पति से है? पति के जाने के बाद क्या उसका प्यार, उसकी ममता, उसका आशीर्वाद सब 'अशुभ' हो जाता है? बुआ ने अपना सब कुछ खोया, लेकिन उन्होंने अपना दिल नहीं खोया। उन्होंने इस घर को अपना जीवन दिया है। और आप कह रही हैं कि उनका स्पर्श अशुभ है?"

श्रेया ने हल्दी की कटोरी उठाई और जबरदस्ती कावेरी चाची के हाथ में थमा दी।

"लगाइये बुआ। अगर आपके हाथ लगाने से मेरा जीवन अशुभ होता है, तो मैं वो अशुभ भी खुशी-खुशी स्वीकार करूँगी। क्योंकि मुझे पता है कि उस अशुभ में आपका निस्वार्थ प्रेम होगा, जो दुनिया के किसी भी शगुन से बड़ा है।"

कावेरी चाची की आँखों से आंसू बह निकले। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने डरते-डरते अपनी उंगली हल्दी में डुबोई। उनकी नज़रें सास पर टिकी थीं, लेकिन सास की नज़रें अब झुकी हुई थीं। शायद श्रेया के शब्दों ने उनके पत्थर दिल पर भी चोट की थी।

कावेरी ने कांपते हाथों से श्रेया के गालों पर हल्दी लगाई। जैसे ही पीला रंग श्रेया के गाल पर लगा, ऐसा लगा जैसे सालों से जमी हुई बर्फ पिघल गई हो। श्रेया ने तुरंत बुआ को गले लगा लिया। कावेरी चाची फूट-फूट कर रो पड़ीं। यह रोना दुख का नहीं था, यह मुक्ति का था। मुक्ति उन बेड़ियों से, जो समाज ने उनके पैरों में डाल रखी थीं।

अचानक, श्रेया की माँ भी आगे आईं। उन्होंने अपनी हल्दी से सनी हथेलियाँ कावेरी चाची के गालों पर लगा दीं।

"कावेरी, आज से इस घर में कोई रंग तुम्हारे लिए वर्जित नहीं होगा। अगर मेरी बेटी समझ सकती है, तो हम क्यों नहीं?"

एक-एक करके, घर की सारी औरतें कावेरी चाची के पास आईं और उन्हें हल्दी लगाने लगीं। सफेद साड़ी अब पीली हो चुकी थी। कावेरी चाची, जो अब तक एक कोने में सिमटी रहती थीं, आज उत्सव के केंद्र में थीं।

दादी, जो अब तक चुप थीं, धीरे-धीरे अपनी लाठी टेकती हुई आगे आईं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से कावेरी के माथे पर एक बिंदी लगा दी—हल्दी की बिंदी।

"गलती मेरी थी बहू," दादी ने भर्राई आवाज़ में कहा। "मैंने रिवाज़ों को इंसानियत से बड़ा बना दिया था। श्रेया ने आज मेरी आँखें खोल दीं।"

उस दिन आंगन में सिर्फ हल्दी नहीं लगी थी, बल्कि एक नई सोच का रंग भी चढ़ा था। श्रेया ने साबित कर दिया था कि परंपराएं इंसान के लिए होती हैं, इंसान परंपराओं के लिए नहीं। और असली अपशगुन विधवा का स्पर्श नहीं, बल्कि वो छोटी सोच है जो एक औरत को उसकी खुशियों से वंचित करती है।

कावेरी चाची मुस्कुरा रही थीं। यह मुस्कान वैसी ही थी जैसी पांच साल पहले हुआ करती थी—जीवंत और रंगीन। आज उनके हाथों में मेहंदी तो नहीं थी, लेकिन हल्दी का वो पीला रंग किसी भी मेहंदी से ज्यादा गहरा और पक्का था।

लेखिका : मीरा प्रथम

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