सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आप अमीर हैं या गरीब, यह आपकी जेब नहीं, आपकी सोच तय करती है

 अमावस की काली रात थी और आसमान मानो धरती को डुबो देने की कसम खाकर बरसा जा रहा था। बादलों की गड़गड़ाहट से खिड़कियों के पुराने पल्ले थरथरा रहे थे। शहर के बाहरी इलाके में, एक तंग गली के आखिरी छोर पर बने एक जर्जर मकान में केशव और उसकी पत्नी सुधा रहते थे। गरीबी ने उनके घर की दीवारों का प्लास्टर उधेड़ दिया था, लेकिन उनके हौसलों की चमक को फीका नहीं कर पाई थी।

केशव एक छोटी सी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था, जहाँ उसे दिहाड़ी के हिसाब से पैसे मिलते थे। सुधा घरों में सिलाई-कढ़ाई का काम करती थी। दोनों की ज़िंदगी अभावों में कट रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक सपना था—अपने बेटे 'आर्यन' को एक बड़ा अफ़सर बनते देखना। आर्यन अभी दस साल का था और पढ़ने में बहुत होशियार था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह एक अजीब सी बीमारी से जूझ रहा था। डॉक्टरों ने कहा था कि उसके फेफड़ों में संक्रमण है और इलाज के लिए अच्छे-खासे पैसों की ज़रूरत होगी।

उस रात केशव और सुधा बहुत बेचैन थे, लेकिन वजह उनकी गरीबी या बारिश नहीं थी। वजह थी एक 'उम्मीद'।

दो दिन पहले, केशव को काम से लौटते वक़्त एक साधु मिले थे। साधु ने केशव के माथे की लकीरें देखकर कहा था, "बेटा, तेरा वक्त बदलने वाला है। बस, सेवा का भाव मत छोड़ना। इस पूर्णिमा की रात, ठीक बारह बजे, तेरे घर एक 'विशेष अतिथि' आएगा। अगर तूने उसे संतुष्ट कर दिया, तो तेरे घर के सारे दुख-दर्द हमेशा के लिए मिट जाएंगे।"

केशव साधु-संतों में बहुत विश्वास रखता था। उसने यह बात सुधा को बताई। सुधा ने भी अपनी माँ से सुना था कि कभी-कभी ईश्वर परीक्षा लेने के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं। दोनों ने मान लिया कि शायद कोई दैवीय शक्ति या कोई सिद्ध महात्मा उनके घर आने वाले हैं जो उनके बेटे को ठीक कर देंगे।

आज वही पूर्णिमा की रात थी। विडंबना देखिये कि बाहर तूफ़ान था और जेब एकदम खाली।

सुधा ने अपनी पुरानी संदूकची खोली। उसमें से एक मुड़ी-तुड़ी साड़ी के नीचे छिपाकर रखे हुए पाँच सौ रुपये निकाले। यह पैसे उसने आर्यन की दवा के लिए जमा किए थे।

"केशव," सुधा ने कांपती आवाज़ में कहा, "मेहमान आएंगे तो उन्हें रूखा-सूखा कैसे खिलाएंगे? वो हमारे दुख हरने आ रहे हैं। हमें उनका स्वागत राजसी करना चाहिए, चाहे हमारे पास कुछ न हो।"

केशव ने नोट को देखा। "लेकिन सुधा, यह आर्यन की दवा के पैसे हैं..."

"दवा तो कल भी आ जाएगी, केशव। लेकिन अगर आज 'वो' दरवाज़े से भूखे लौट गए, तो हमारा भाग्य हमेशा के लिए रूठ जाएगा। तुम जाओ, बाज़ार से कुछ अच्छा पकवान, फल और उनके ओढ़ने के लिए एक नई शॉल ले आओ। ठंड बहुत है।"

केशव का मन नहीं मान रहा था, लेकिन पत्नी के विश्वास के आगे वह झुक गया। वह छाता लेकर तूफ़ान में बाहर निकल पड़ा। बाज़ार बंद होने वाला था। उसने भीगते हुए एक हलवाई की दुकान से गरम पूड़ियाँ और सब्जी पैक करवाई। पास की दुकान से एक सस्ता लेकिन गर्म ऊनी शॉल खरीदा और कुछ सेब लिए। कुल मिलाकर उसके चार सौ अस्सी रुपये खर्च हो गए। अब जेब में सिर्फ बीस रुपये बचे थे।

सामान को छाती से चिपकाए केशव घर की ओर लपका। उसे लग रहा था जैसे वह दुनिया का सबसे कीमती खज़ाना लेकर जा रहा है। उसे अपने बेटे के स्वस्थ होने की उम्मीद उस पैकेट में नज़र आ रही थी।

घर से कुछ ही दूरी पर, बस स्टैंड के नीचे, उसे एक कराहने की आवाज़ सुनाई दी। केशव रुका। बारिश की बौछार तेज़ थी। उसने ध्यान से देखा, तो बेंच के नीचे एक बूढ़ा आदमी और एक छोटा बच्चा सिकुड़े हुए बैठे थे। दोनों के कपड़े फटे हुए थे और कीचड़ से सने थे। बच्चा ठंड से बुरी तरह कांप रहा था, उसका शरीर बुखार से तप रहा था। बूढ़ा आदमी बार-बार बच्चे के हाथ-पैर रगड़ रहा था और रो रहा था।

"बेटा... ओ बाबूजी..." बूढ़े ने केशव को देखकर हाथ फैलाया। "मदद कर दो। मेरा पोता ठंड से मर जाएगा। हम दो दिन से भूखे हैं। हमारा घर बाढ़ में बह गया।"

केशव ठिठक गया। उसका दिल पसीज गया, लेकिन तुरंत उसे याद आया कि घर पर 'विशेष अतिथि' आने वाले हैं। यह खाना और शॉल तो उनके लिए है। अगर यह दे दिया, तो घर आए मेहमान को क्या खिलाएगा? साधु की भविष्यवाणी झूठी पड़ जाएगी। उसका बेटा ठीक नहीं हो पाएगा।

केशव ने नज़रें फेर लीं और आगे बढ़ने लगा।

तभी बच्चे की एक चीख निकली, "दादा... भूख..." और वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

केशव के कदम ज़मीन में गड़ गए। उसके कानों में अपने बेटे आर्यन की खांसी गूंजने लगी। उसने सोचा, 'मेरा बेटा घर में बीमार है, लेकिन उसके सिर पर छत तो है, माँ तो है। लेकिन यह बच्चा? यह तो खुले आसमान के नीचे मर रहा है।'

केशव का अंतर्मन द्वंद्व का युद्धक्षेत्र बन गया था। एक तरफ भविष्य का सुख था, दूसरी तरफ वर्तमान का धर्म।

उसने एक गहरी सांस ली। उसने आसमान की तरफ देखा, मानो उस अदृश्य शक्ति से माफ़ी मांग रहा हो, और फिर मुड़ गया।

वह उस बूढ़े के पास गया। उसने खाने का पैकेट खोला। गरम पूड़ियों की महक से बच्चे की आँखें खुल गईं। केशव ने अपने हाथों से बच्चे को खाना खिलाया। फिर उसने वह नया खरीदा हुआ ऊनी शॉल निकाला और उस कांपते हुए बच्चे को ओढ़ा दिया। बचे हुए सेब बूढ़े के हाथों में रख दिए।

"भगवान तुम्हारा भला करे बेटा... भगवान तुम्हें बहुत दे," बूढ़ा आदमी रोते हुए खाना खा रहा था।

केशव ने अपनी जेब टटोली। वो बचे हुए बीस रुपये भी उसने बूढ़े को दे दिए। "बाबा, इससे सुबह चाय पी लेना।"

अब केशव के हाथ खाली थे। न खाना, न शॉल, न पैसे। सिर्फ एक भीगा हुआ छाता था। वह भारी कदमों से घर की ओर चला। उसे डर लग रहा था। सुधा क्या कहेगी? वो मेहमान क्या सोचेंगे?

जब वह घर पहुँचा, तो सुधा दरवाज़े पर ही खड़ी थी। उसने केशव के खाली हाथ देखे।

"सामान कहाँ है केशव? मेहमान आने ही वाले होंगे," सुधा ने उत्सुकता से पूछा।

केशव की आँखें भर आईं। उसने सुधा को सब कुछ सच-सच बता दिया। उसने बताया कि कैसे उसने 'विशेष अतिथि' के लिए लाया हुआ सब कुछ उन भिखारियों को दे दिया।

सुधा एक पल के लिए चुप रही। केशव को लगा अब वह चिल्लाएगी, रोएगी। लेकिन सुधा की आँखों में एक अजीब सी शांति उतर आई। उसने अपने पल्लू से केशव का भीगा सिर पोंछा और बोली, "केशव, तुमने सही किया। अगर तुम उस बच्चे को तड़पता छोड़कर आ जाते, और यहाँ हम किसी महात्मा को छप्पन भोग खिला रहे होते, तो वह निवाला मेरे गले से नीचे नहीं उतरता। अतिथि तो अभी आए नहीं हैं, लेकिन इंसानियत तो हर पल हमारे साथ होनी चाहिए न?"

केशव ने राहत की सांस ली। "लेकिन अब क्या करेंगे सुधा? खिलाने को तो कुछ नहीं है।"

"हमारे पास खिचड़ी है न?" सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा। "हम और आर्यन रोज़ वही खाते हैं। मेहमान को भी वही खिलाएंगे। अगर वो सच में ज्ञानी होंगे, तो भाव देखेंगे, पकवान नहीं।"

दोनों ने मिलकर सादी खिचड़ी बनाई। घर साफ़ किया और इंतज़ार करने लगे।

घड़ी ने बारह बजाए।

हवाओं का शोर बढ़ा। दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई।

केशव और सुधा दौड़कर दरवाज़े पर गए। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। दरवाज़ा खोला, तो सामने कोई साधु या महात्मा नहीं थे।

वहां एक पोस्टमैन (डाकिया) खड़ा था। बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ। उसकी साइकिल पंचर हो गई थी और वह हाफ रहा था।

"माफ़ करना भाई साहब," पोस्टमैन ने कहा। "इतनी रात को परेशान किया। मेरी साइकिल खराब हो गई और शहर जाने का कोई साधन नहीं है। बहुत ज़ोर की बारिश है। क्या थोड़ी देर आपके बरामदे में सर छुपा सकता हूँ?"

केशव और सुधा ने एक-दूसरे को देखा। क्या यही वो 'विशेष अतिथि' है? एक साधारण डाकिया?

निराशा तो हुई, लेकिन उन्होंने उसे अंदर बुलाया।

"अरे भाई, बाहर क्यों? अंदर आ जाओ," केशव ने कहा।

उसे तौलिया दिया, और सुधा ने गरम खिचड़ी परोसी। पोस्टमैन बहुत भूखा था। उसने तृप्त होकर खाया।

"भाभी जी, अमृत जैसा स्वाद है," उसने कहा।

बातों-बातों में पता चला कि वह शहर के बड़े अस्पताल से कोई ज़रूरी दस्तावेज़ लेकर आ रहा था, लेकिन रास्ता भटक गया था। जब वह जाने लगा, तो उसने अपने थैले से एक लिफाफा निकाला।

"अरे भाई साहब, मैं तो भूल ही गया। मैं इसी मोहल्ले के पते पर एक चिट्ठी देने आया था, लेकिन अंधेरे में घर नहीं मिला। अब आप मिल गए हैं, तो देख लीजिये। कहीं ये आपके लिए तो नहीं?"

केशव ने लिफाफा देखा। उस पर किसी का नाम नहीं था, बस लिखा था—"मकान नंबर 45, गली का आखिरी छोर।" यह उन्हीं का पता था।

केशव ने धड़कते दिल से लिफाफा खोला। अंदर एक पत्र था और एक चेक।

केशव ने पढ़ना शुरू किया, उसकी आवाज़ कांपने लगी:

"प्रिय केशव और सुधा,

मैं जानता हूँ तुम मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैं आया भी था। मैं बस स्टैंड पर ठंड से ठिठुर रहा था, और भूख से मेरी जान जा रही थी। तुमने जो गरम पूड़ियाँ खिलाईं, उनसे मेरी आत्मा तृप्त हो गई। तुमने जो शॉल ओढ़ाई, उसने मुझे नई ज़िंदगी दी। मैं तुम्हारे घर के दरवाज़े पर नहीं, तुम्हारे दिल के दरवाज़े पर आया था, और तुमने मुझे खाली हाथ नहीं लौटाया।

तुम सोच रहे होगे कि मैं कौन हूँ? मैं कोई साधु नहीं हूँ। मैं वह 'कर्म' हूँ जो तुमने निस्वार्थ भाव से किया। मैं वह 'परीक्षा' था जिसे तुमने पास कर लिया।

साधु बाबा ने मुझसे (शहर के एक बड़े ट्रस्ट के मालिक से) तुम्हारे बारे में ज़िक्र किया था। मैं देखना चाहता था कि क्या तुम सच में मदद के हक़दार हो। आज तुमने साबित कर दिया कि जिसके पास खुद कुछ नहीं है, अगर वह भी देने का हौसला रखता है, तो वह दुनिया का सबसे अमीर इंसान है।

लिफाफे में तुम्हारे बेटे आर्यन के इलाज के लिए पूरे खर्चे का चेक है। और जिस अस्पताल में मैं ट्रस्टी हूँ, वहां उसका इलाज मुफ्त होगा।

तुम्हारा,

वो बूढ़ा भिखारी (सेठ दीनानाथ)"

पत्र पढ़ते-पढ़ते केशव के हाथ से कागज छूट गया। सुधा वहीँ ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह सपना है या हकीकत।

केशव ने दौड़कर दरवाज़ा खोला कि शायद वो पोस्टमैन ही सेठ जी हों, लेकिन पोस्टमैन जा चुका था। दूर सड़क पर बस स्टैंड खाली पड़ा था। वहां कोई भिखारी नहीं था, बस वो शॉल बेंच के एक कोने पर रखी थी जो केशव ने दी थी—मानो निशानी के तौर पर छोड़ी गई हो कि यह सब सच था।

केशव और सुधा आर्यन के बिस्तर के पास गए। आर्यन गहरी नींद में सो रहा था। उन्होंने उसे गले लगा लिया। उस रात उस टूटे-फूटे मकान की छत भले ही टपक रही थी, लेकिन उनके दिलों में जो सुकून था, वो किसी महलों में रहने वालों को भी नसीब नहीं होता।

दोस्तों, हम अक्सर ईश्वर को मंदिरों, मस्जिदों या विशेष अतिथियों में ढूंढते हैं। हम सोचते हैं कि बड़ा चढ़ावा चढ़ाने से या बड़ा दान देने से पुण्य मिलेगा। लेकिन सच यह है कि ईश्वर किसी 'नाम' या 'रूप' का मोहताज नहीं होता। वह तो एक 'एहसास' है जो किसी ज़रूरतमंद की मदद करते वक़्त आपके दिल में जागता है।

केशव और सुधा वास्तव में गरीब थे—धन से। लेकिन उस रात उन्होंने साबित कर दिया कि अमीरी बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि नीयत से होती है। जब आप अपनी ज़रूरत को मारकर किसी और की ज़रूरत पूरी करते हैं, तो वह त्याग सीधे परमात्मा तक पहुँचता है, बिना किसी बिचौलिए के।

जीवन के अंत में हमारे साथ न तो हमारे द्वारा कमाए गए पैसे जाते हैं, न ही हमारे पद या प्रतिष्ठा। हमारे साथ जाता है तो बस वो 'एहसास' जो हमने दूसरों को दिया। क्या हमने किसी के आंसू पोंछे? क्या हमने किसी भूखे को खाना खिलाया? यही वो असली पूँजी है जो परलोक में काम आती है।

इसलिए, अगली बार जब कोई ज़रूरतमंद हाथ फैलाए, तो यह मत सोचियेगा कि आपके पास कम है। यह सोचियेगा कि शायद ईश्वर ने आपको चुना है, उस व्यक्ति की मदद करने के माध्यम के रूप में। और कौन जाने, कब किस रूप में नारायण मिल जाएं!

उस रात के बाद केशव और सुधा का जीवन बदल गया। आर्यन का इलाज हुआ, वह स्वस्थ हो गया। लेकिन वे कभी नहीं भूले कि उनकी सबसे बड़ी संपत्ति वो 'बीस रुपये और एक शॉल' थी, जिसने उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना दिया था।

आप अमीर हैं या गरीब, यह आपकी जेब नहीं, आपकी सोच तय करती है।

पुष्पा खंडेलवाल


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...