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बंद दरवाज़े

 "पापा, हम लोग वीकेंड के लिए बाहर जा रहे हैं, कल रात तक ही लौट पाएंगे। आप अपना ध्यान रखिएगा। आपके लिए डाइनिंग टेबल पर खाना रख दिया है। बाहर का मेन गेट हम बाहर से लॉक करके जा रहे हैं, आजकल मोहल्ले में चोरियां बहुत हो रही हैं, तो सिक्योरिटी के लिए ताला लगाना जरूरी है। आपको वैसे भी बाहर कहाँ जाना होता है। कुछ चाहिए हो तो फोन कर लीजिएगा।"

बड़े बेटे विकास ने अपनी कार की चाबी उँगलियों में घुमाते हुए बहुत ही रूखे और सामान्य लहज़े में यह बात कही। पास ही खड़ी बड़ी बहू शालिनी और छोटी बहू ऋचा अपने-अपने सनग्लासेस सेट कर रही थीं। छोटे बेटे विवेक ने तो अपने पिता की तरफ देखना भी ज़रूरी नहीं समझा और बच्चों को कार में बिठाने लगा। किसी के भी लहज़े में यह सवाल नहीं था कि "पापा, क्या आप भी हमारे साथ चलेंगे?"

सत्तर वर्षीय रघुनाथ जी अपने ही घर के बरामदे में खड़े, अपने बच्चों को इस तरह जाते हुए देख रहे थे। कार स्टार्ट हुई और धूल उड़ाती हुई आँखों से ओझल हो गई। जाते-जाते विकास सच में बाहर वाले लोहे के बड़े गेट पर एक भारी सा ताला जड़ गया था। रघुनाथ जी कुछ देर तक उस बंद गेट को सूनी आँखों से घूरते रहे। ऐसा लग रहा था जैसे वह ताला लोहे के गेट पर नहीं, बल्कि उनके सीने पर जड़ा गया हो।

भारी कदमों से चलते हुए वे वापस घर के अंदर आए। डाइनिंग टेबल की तरफ उनकी नज़र गई। वहां एक स्टील के टिफिन में चार रूखी रोटियां, एक छोटी सी कटोरी में रात की बची हुई कद्दू की सूखी सब्जी और एक किनारे पर थोड़ा सा अचार रखा था। यह उनका आज दोपहर और शायद रात का भोजन था। उस ठंडे और बेजान खाने को देखकर रघुनाथ जी की आँखों से आंसुओं की दो बूंदें छलक कर मेज़ पर गिर पड़ीं।

उन्हें वो दिन याद आ गए जब विकास और विवेक छोटे थे। उनकी पत्नी सुशीला खुद भूखी सो जाती थी, लेकिन बच्चों की थाली में हमेशा ताज़ा और गरम खाना परोसती थी। रघुनाथ जी एक साधारण स्कूल टीचर थे। उनकी तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन उन्होंने अपनी ज़रूरतों का गला घोंटकर अपने बच्चों के हर सपने को पूरा किया। विकास को इंजीनियर बनाने के लिए उन्होंने अपना पुश्तैनी खेत बेच दिया था और विवेक के एमबीए के लिए अपनी प्रोविडेंट फंड की सारी रकम निकाल ली थी। खुद सालों तक एक ही स्वेटर पहनकर सर्दियां निकाल दीं, ताकि बेटे ब्रांडेड जैकेट पहन सकें। और आज? आज उसी खून-पसीने से सींचे गए बेटों ने उन्हें एक ऐसे घर में कैद कर दिया था, जिसकी एक-एक ईंट रघुनाथ जी ने अपनी पाई-पाई जोड़कर बनवाई थी।

दोपहर के दो बज चुके थे। बाहर मई की चिलचिलाती धूप आग उगल रही थी। अचानक घर की बिजली चली गई। रघुनाथ जी ने सोचा कि इन्वर्टर काम करेगा, लेकिन थोड़ी ही देर में इन्वर्टर ने भी बीप की आवाज़ के साथ दम तोड़ दिया। शायद बहुओं ने ध्यान ही नहीं दिया था कि इन्वर्टर की बैटरी खराब हो चुकी है। घर के अंदर उमस और गर्मी बढ़ने लगी। रघुनाथ जी को अस्थमा की हल्की शिकायत थी। पंखा बंद होने के कारण उनका दम घुटने लगा। पसीने से उनके कपड़े भीग गए।

उन्होंने सोचा कि बाहर लॉन में जाकर किसी पेड़ की छाँव में बैठ जाएं, लेकिन जैसे ही वे बाहर जाने के लिए मुड़े, उन्हें याद आया कि मेन गेट पर तो बाहर से ताला लगा हुआ है। वे सचमुच अपने ही घर में एक कैदी बन चुके थे। घबराहट में उन्होंने अपने फोन से विकास को कॉल किया।

"पापा, अभी हम लोग रिज़ॉर्ट के पूल में हैं, बहुत शोर है, मैं आपको शाम को कॉल करता हूँ," विकास ने एक सांस में बोलकर फोन काट दिया। रघुनाथ जी ने विवेक को मिलाया, लेकिन उसका फोन आउट ऑफ नेटवर्क बता रहा था।

गर्मी और प्यास से उनका गला सूखने लगा। वे उस मेज़ के पास गए जहाँ वो रूखी रोटियां रखी थीं। उन रोटियों को देखकर उन्हें अब भूख नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व पर घिन आ रही थी। क्या एक पिता की कीमत बुढ़ापे में सिर्फ इन चार बासी रोटियों और एक बंद दरवाज़े तक सिमट कर रह जाती है?

तभी बाहर से किसी ने आवाज़ लगाई, "रघुनाथ भाई! ओ रघुनाथ भाई!"

यह आवाज़ उनके पुराने मित्र और सहकर्मी, मास्टर दीनदयाल की थी। दीनदयाल जी अक्सर शाम को रघुनाथ जी से मिलने आ जाया करते थे।

रघुनाथ जी लड़खड़ाते कदमों से खिड़की के पास गए। "दीनदयाल... मैं यहाँ हूँ अंदर।" उनकी आवाज़ में घुटन और लाचारी साफ़ झलक रही थी।

दीनदयाल जी ने बाहर से लगा ताला देखा और फिर खिड़की से पसीने में लथपथ रघुनाथ जी को देखा। उनका माथा ठनक गया।

"अरे! यह बाहर से ताला किसने लगाया है? और तुम्हारी यह हालत कैसी हो रही है रघुनाथ? घर में बिजली नहीं है क्या?"

रघुनाथ जी की रुलाई फूट पड़ी। उन्होंने फफकते हुए अपने दोस्त को सारी बात बता दी। दीनदयाल जी का खून खौल उठा। "अरे लानत है ऐसे पढ़े-लिखे बेटों पर! सुरक्षा के नाम पर एक बीमार और बुजुर्ग बाप को चिलचिलाती गर्मी में ताले में बंद कर गए? तुम रुको रघुनाथ, मैं अभी कुछ करता हूँ।"

दीनदयाल जी तुरंत दौड़कर मोहल्ले के चौराहे से एक ताले वाले को बुला लाए। हथौड़े की दो-तीन चोटों से वह भारी ताला टूट कर नीचे गिर पड़ा। दरवाज़ा खुला और दीनदयाल जी ने अंदर आकर सबसे पहले रघुनाथ जी को सहारा देकर बाहर निकाला, उन्हें अपनी बोतल से पानी पिलाया और पास ही नीम के पेड़ के नीचे बनी चबूतरी पर बैठाया।

हवा के ठंडे झोंके से रघुनाथ जी की सांस में सांस आई। लेकिन उनके भीतर एक बहुत बड़ा तूफ़ान चल रहा था। दीनदयाल जी ने गुस्से में कहा, "रघुनाथ, तुम मेरे साथ मेरे घर चलो। ऐसे बेगैरत बच्चों के घर में एक पल भी रुकना तुम्हारी तौहीन है।"

रघुनाथ जी कुछ देर चुप रहे। उनकी आँखें अब सूख चुकी थीं। उन सूखी आँखों में अब लाचारी नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चय था।

"नहीं दीनदयाल," रघुनाथ जी ने शांत लेकिन कठोर स्वर में कहा। "मैं तुम्हारे घर नहीं जाऊंगा। और न ही मैं अब इस घर में रहूंगा। तुमने आज मेरे घर का ताला नहीं तोड़ा है, तुमने मेरी आँखों पर पड़ा मोह का वो पर्दा तोड़ दिया है जिसने मुझे अब तक अंधा कर रखा था। मुझे आज समझ आ गया है कि जिस घर को मैंने अपनी ज़िंदगी दी, वह अब मेरा घर नहीं, सिर्फ एक ईंट-पत्थर का मकान है जहाँ मेरी हैसियत पुराने फर्नीचर से ज्यादा कुछ नहीं।"

रघुनाथ जी उठे और वापस घर के अंदर गए। उन्होंने अलमारी से अपना एक छोटा सा बैग निकाला। उसमें अपने कुछ ज़रूरी कपड़े, अपनी दवाइयां, अपनी पेंशन की पासबुक और अपनी पत्नी सुशीला की एक पुरानी तस्वीर रखी। बाहर आते हुए उनकी नज़र डाइनिंग टेबल पर रखे उस ठंडे, बेजान खाने पर पड़ी। उन्होंने एक कागज़ और पेन लिया और कांपते हाथों से कुछ लाइनें लिखीं। उस कागज़ को उन्होंने उसी टिफिन के डिब्बे के पास रख दिया।

"चलो दीनदयाल, शहर के बाहर जो 'शांति निकेतन' वृद्धाश्रम है, मुझे वहां छोड़ दो। मेरी पेंशन से मेरा वहां का खर्च आराम से निकल जाएगा। मुझे अब अपनी बची हुई ज़िंदगी सम्मान से जीनी है, किसी की दया या कैद में नहीं।"

दीनदयाल जी ने भारी मन से अपने दोस्त का हाथ पकड़ा और दोनों उस घर की चौखट को हमेशा के लिए पार कर गए।

अगली रात जब विकास, विवेक और उनकी पत्नियां रिज़ॉर्ट से मौज-मस्ती करके लौटे, तो मेन गेट का टूटा हुआ ताला ज़मीन पर पड़ा देखकर उनके होश उड़ गए।

"हे भगवान! चोरी हो गई!" शालिनी चीख पड़ी।

सब लोग बदहवास होकर घर के अंदर भागे। उन्होंने देखा कि घर का सारा सामान, टीवी, फ्रिज, अलमारियां सब कुछ अपनी जगह पर सुरक्षित था। कोई चोरी नहीं हुई थी। लेकिन घर में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा था।

"पापा! पापा कहाँ हैं?" विवेक ने पूरे घर में आवाज़ लगाई। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

तभी विकास की नज़र डाइनिंग टेबल पर गई। वो चार सूखी रोटियां और गोभी की सब्जी वैसी ही अछूती रखी थी, और उसके पास एक कागज़ रखा था। विकास ने कांपते हाथों से वह कागज़ उठाया। उसमें रघुनाथ जी की लिखावट थी।

"मेरे बच्चों,

तुमने चोरों के डर से बाहर ताला तो लगा दिया, लेकिन तुम यह भूल गए कि जिस घर से बड़े-बुजुर्गों का सम्मान चोरी हो जाए, वहां फिर लुटाने के लिए कुछ नहीं बचता। तुमने मुझे सुरक्षा नहीं दी थी, तुमने मुझे मेरी हैसियत बताई थी। जब मैं उस बंद कमरे में गर्मी और घुटन से तड़प रहा था, तब मुझे अपनी उन रातों की याद आ रही थी जब तुम दोनों को बुखार होता था और मैं रात-रात भर जागकर तुम्हारे माथे पर पट्टियां रखता था।

मैं तुम्हें यह मकान, यह डाइनिंग टेबल और यह बचा हुआ खाना मुबारक करता हूँ। मुझे अब किसी पिंजरे में नहीं रहना। मैं जा रहा हूँ एक ऐसी जगह, जहाँ मैं एक इंसान की तरह जी सकूं, तुम्हारे घर के किसी फालतू सामान की तरह नहीं। मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना।

तुम्हारा पिता, जिसे तुमने सिर्फ एक चौकीदार समझ लिया था।"

पत्र पढ़ते ही विकास और विवेक के हाथों से कागज़ छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। शालिनी और ऋचा के चेहरे शर्म से सफेद पड़ गए थे। उन्हें अचानक उस खाली घर की दीवारें काटने को दौड़ने लगीं। जो घर कल तक उन्हें अपनी जागीर लग रहा था, आज पिता के बिना वह एक वीरान खंडहर में तब्दील हो चुका था। वे समझ गए थे कि उन्होंने सिर्फ एक पिता को नहीं खोया है, बल्कि उस छत को खो दिया है जिसकी दुआओं से उनका वजूद कायम था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। बंद दरवाज़े तो टूट गए थे, लेकिन जो दरार उनके और उनके पिता के बीच आ गई थी, उसे अब दुनिया का कोई भी ताला या चाबी नहीं जोड़ सकती थी।

क्या आपको लगता है कि रघुनाथ जी ने घर छोड़कर सही फैसला लिया, या उन्हें अपने बेटों को एक और मौका देना चाहिए था? अपनी राय जरूर बताएं।

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