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जड़ों की पुकार

 रमाकांत जी ने मायरा को अपनी गोद में उठा लिया और झूले पर बैठाते हुए बहुत प्यार से बोले, "मेरी बच्ची, यह कोई रूम फ्रेशनर या परफ्यूम नहीं है। यह हमारे भारत की, तुम्हारे इस पुश्तैनी आंगन की मिट्टी की महक है। इसे 'सोंधी खुशबू' कहते हैं। जब यह मिट्टी कई महीनों तक सूरज की तेज गर्मी सहती है और फिर आसमान से बारिश की पहली बूंदें इसे चूमती हैं, तो यह मिट्टी खुशी से महक उठती है। यह हमारे जड़ों की खुशबू है।"


बनारस के बाहरी इलाके में बसा पंडित रमाकांत जी का पुराना लेकिन विशाल पुश्तैनी घर आज जैसे किसी बड़े त्योहार की खुशी में डूबा हुआ था। घर के हर कोने को चमकाया गया था और आंगन में लगे तुलसी के पौधे के पास एक नया दीया टिमटिमा रहा था। रमाकांत जी और उनकी पत्नी जानकी देवी की आँखों में जो चमक आज थी, वह पिछले चार सालों में कभी नहीं देखी गई थी। लंदन की भागदौड़ भरी जिंदगी से समय निकालकर उनका इकलौता बेटा देवांश, बहू श्रुति और सात साल की पोती मायरा आज घर आ रहे थे। मायरा का जन्म लंदन में ही हुआ था और वह केवल एक बार जब बहुत छोटी थी, तब भारत आई थी। 


जानकी देवी की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। उनके पैरों में जैसे पहिए लग गए थे। सुबह से ही रसोई में उनके हाथों का जादू चल रहा था। लंदन में पैकेट बंद खाना और बर्गर-पिज़्ज़ा खाने वाले बच्चों के लिए उन्होंने बेसन के लड्डू, कुरकुरी मटर की कचौड़ियां, मीठे शकरपारे और आम का तीखा अचार बनाकर डाइनिंग टेबल को किसी दावत की तरह सजा दिया था। उन्हें बस इस पल का इंतज़ार था कि कब उनका बेटा और पोती उनके हाथ का बना यह देसी स्वाद चखेंगे।


दोपहर ढलते ही दरवाजे पर गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ गूंजी। रमाकांत जी ने लगभग दौड़ते हुए जाकर दरवाजा खोला। गाड़ी से उतरते ही देवांश ने अपने पिता के चरण स्पर्श किए और जानकी देवी के गले लग गया। श्रुति ने भी सासू माँ के पैर छुए। लेकिन दोनों बुजुर्गों की नज़रें तो उस नन्ही परी को ढूंढ़ रही थीं, जो एक हाथ में अपना टैबलेट पकड़े हुए थोड़ी हिचकिचाहट के साथ इस बड़े से, खुले आंगन वाले घर को देख रही थी। मायरा के लिए यह सब बहुत नया था। उसे कंक्रीट के बंद अपार्टमेंट्स और हर वक्त एसी में रहने की आदत थी। यहाँ का खुला वातावरण, पेड़ों की सरसराहट और धूल उसे थोड़ा असहज कर रही थी।


जानकी देवी ने आगे बढ़कर मायरा को अपने गले से लगा लिया और उसे खूब सारा प्यार किया। अंदर आने के बाद जब डाइनिंग टेबल पर खाना परोसा गया, तो मायरा पहले तो उन भारतीय व्यंजनों को देखकर थोड़ा झिझकी, लेकिन जब जानकी देवी ने अपने हाथों से उसे एक कुरकुरी कचौड़ी खिलाई, तो उसका स्वाद मायरा को ऐसा भाया कि उसने टैबलेट किनारे रख दिया और मजे से खाने लगी। देवांश और श्रुति भी बरसों बाद घर के उस शुद्ध और प्यार भरे स्वाद में खो गए थे।


शाम का समय था। बनारस की गर्मियों में अक्सर शाम को मौसम करवट ले लेता है। आसमान में अचानक काले बादल घिर आए और ठंडी हवाएं चलने लगीं। आंगन में लगे आम और नीम के पेड़ हवा के झोंकों से झूमने लगे। रमाकांत जी मायरा को उंगली पकड़कर अपने बड़े से दालान (बरामदे) में ले आए जहाँ लकड़ी का एक बड़ा सा झूला डला हुआ था। मायरा हैरानी से पेड़ों को ऐसे नाचते हुए देख रही थी। लंदन में उसने बारिश तो बहुत देखी थी, लेकिन इस तरह प्रकृति का ऐसा उन्मुक्त रूप उसके लिए नया था। 


तभी बादलों की गड़गड़ाहट के साथ बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें आंगन की सूखी और प्यासी मिट्टी पर गिरने लगीं। तपती हुई ज़मीन पर जैसे ही पहली बारिश की बूंदें पड़ीं, एक जादू सा हो गया। हवा में एक बहुत ही अजीब, लेकिन बेहद सुकून देने वाली खुशबू तैरने लगी। यह खुशबू इतनी तेज और मनमोहक थी कि श्रुति और देवांश भी अपने कमरे से बाहर बरामदे में आ गए और गहरी सांसें लेने लगे।


मायरा ने अपनी छोटी सी नाक सिकोड़ते हुए चारों तरफ हवा में कुछ सूंघने की कोशिश की। उसकी आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं। वह तुरंत अपने दादाजी की तरफ पलटी और अपने मासूम लहजे में अंग्रेजी मिली हिंदी में पूछने लगी, "वाओ दादू! यह कौन सा रूम फ्रेशनर है? इसकी स्मेल तो बहुत ही अमेजिंग है! क्या दादी ने अंदर कोई खास परफ्यूम स्प्रे किया है? क्या हम इसे लंदन ले जाने के लिए अमेज़न या यहाँ के सुपरमार्केट से खरीद सकते हैं?"


मायरा की इस मासूम सी बात पर रमाकांत जी और जानकी देवी ने एक-दूसरे को देखा और जोर से खिलखिलाकर हंस पड़े। देवांश और श्रुति के चेहरों पर भी एक प्यारी सी मुस्कान आ गई, लेकिन साथ ही एक गहरी सोच भी। 


रमाकांत जी ने मायरा को अपनी गोद में उठा लिया और झूले पर बैठाते हुए बहुत प्यार से बोले, "मेरी बच्ची, यह कोई रूम फ्रेशनर या परफ्यूम नहीं है। यह हमारे भारत की, तुम्हारे इस पुश्तैनी आंगन की मिट्टी की महक है। इसे 'सोंधी खुशबू' कहते हैं। जब यह मिट्टी कई महीनों तक सूरज की तेज गर्मी सहती है और फिर आसमान से बारिश की पहली बूंदें इसे चूमती हैं, तो यह मिट्टी खुशी से महक उठती है। यह हमारे जड़ों की खुशबू है।"


मायरा ने हैरानी से पूछा, "तो क्या यह हमें बाजार में नहीं मिलेगी?"


रमाकांत जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "नहीं बेटा, दुनिया का कोई भी बड़ा बाजार, कोई भी महंगी दुकान इस खुशबू को शीशी में बंद करके नहीं बेच सकती। कंक्रीट के ऊंचे-ऊंचे जंगलों और पक्के फर्श वाले विदेशी शहरों ने यह खुशबू छीन ली है। इस महक को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, अपनी जड़ों से जुड़कर। इसे शीशी में नहीं, बल्कि अपनी यादों और अपनी रूह में सहेज कर अपने साथ लंदन ले जाया जा सकता है, ताकि जब भी तुम्हें इस सुकून की याद आए, तुम अपनी आँखें बंद करो और तुम्हारा दिल वापस अपने इस आंगन में पहुँच जाए।"


यह सुनकर मायरा दौड़कर आंगन के किनारे गई और उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से उस गीली मिट्टी को छू लिया। उसके चेहरे पर एक अलौकिक खुशी थी। पीछे खड़े देवांश की आँखों में आंसू आ गए थे। उसे एहसास हो रहा था कि सात समंदर पार की उस भागदौड़ में उसने कितना कुछ खो दिया है। आज उसकी बेटी ने उस मिट्टी की महक को पहचान लिया था, जो उसे हमेशा उसकी जड़ों की याद दिलाती रहेगी।


***


आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या आपको भी बारिश की पहली बूंदों के बाद उठने वाली उस मिट्टी की महक से प्यार है? क्या हम आधुनिकता की दौड़ में सचमुच प्रकृति के इन अनमोल उपहारों से दूर होते जा रहे हैं? अपने अनुभव और विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।


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