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ढलती शाम और रिश्तों का आईना

  पार्वती, जिसका खुद का शरीर थकान से टूट रहा था, उसने एक बार अपनी सास की तरफ देखा। वह जानती थी कि यह दर्द सिर्फ उसे काम करते हुए देखकर उठा है, लेकिन एक आज्ञाकारी बहू होने के नाते उसके होंठों ने कभी बगावत करना नहीं सीखा था। उसने अपने माथे का पसीना साड़ी के पल्लू से पोंछा और ज़मीन पर हाथ टेककर उठने की कोशिश करने लगी। "जी माँ जी, बस अभी हाथ-मुँह धोकर तेल लाती हूँ," पार्वती ने थकी हुई आवाज़ में कहा।

सूरज धीरे-धीरे अपनी लालिमा समेटते हुए पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छुपने की तैयारी कर रहा था। शहर के उस पुराने मोहल्ले में शाम की खामोशी उतरने लगी थी, लेकिन घरों के भीतर का शोर अब परवान चढ़ रहा था। पार्वती थके हुए कदमों से घर के लोहे वाले मुख्य दरवाज़े को धकेल कर भीतर दाखिल हुई। दिन भर सरकारी स्कूल में बच्चों की चीख-पुकार, ब्लैकबोर्ड की चॉक की धूल और फिर लौटते हुए सब्जी मंडी की भीड़—इन सबने पार्वती के शरीर की आखिरी बूंद तक निचोड़ ली थी। उसकी सूती साड़ी पसीने से भीग कर पीठ पर चिपक गई थी और पैरों की बिवाइयाँ दर्द से चीख रही थीं।

उसने बरामदे में रखा पानी का जग उठाया और बिना किसी गिलास के ही एक लंबा घूंट भर लिया। अभी वह आँगन की ठंडी ज़मीन पर एक पल के लिए बैठी ही थी कि बाहर से उसकी सास, शांति देवी का प्रवेश हुआ। शांति देवी मोहल्ले के कीर्तन और पंचायत से लौट रही थीं। उनकी चाल में एक गज़ब की फुर्ती थी, जैसे कोई जवान लड़की चल रही हो। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र पसीने से तर-बतर और थकान से चूर पार्वती पर पड़ी, उनकी चाल अचानक धीमी हो गई और चेहरे पर एक अजीब सी पीड़ा के भाव उभर आए।

शांति देवी ने बरामदे में रखे तख्त पर धम्म से अपना शरीर गिराया और एक लंबी आह भरते हुए बोलीं, "हे राम! मेरी तो कमर ही टूट गई। अरे पार्वती, तू आ गई क्या? ज़रा सरसों का तेल गरम करके मेरे घुटनों और पिंडलियों को मल दे। ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने पैरों में कीलें ठोक दी हों। अब उम्र हो गई है, यह दर्द तो मेरी जान ही ले लेगा।"

पार्वती, जिसका खुद का शरीर थकान से टूट रहा था, उसने एक बार अपनी सास की तरफ देखा। वह जानती थी कि यह दर्द सिर्फ उसे काम करते हुए देखकर उठा है, लेकिन एक आज्ञाकारी बहू होने के नाते उसके होंठों ने कभी बगावत करना नहीं सीखा था। उसने अपने माथे का पसीना साड़ी के पल्लू से पोंछा और ज़मीन पर हाथ टेककर उठने की कोशिश करने लगी। "जी माँ जी, बस अभी हाथ-मुँह धोकर तेल लाती हूँ," पार्वती ने थकी हुई आवाज़ में कहा।

तभी रसोई के दरवाज़े से एक खनकती हुई आवाज़ आई। "रहने दीजिए भाभी, आप बैठिए।"

यह पार्वती की देवरानी, रचना थी। रचना के हाथों में चाय की एक ट्रे थी, जिसमें से अदरक और इलायची की महक उठ रही थी। रचना स्वभाव से स्पष्टवादी और बेबाक थी। उसने अपनी जेठानी की खामोश पीड़ा को हमेशा समझा था और इस घर में पार्वती की इकलौती दोस्त भी वही थी।

रचना ने चाय की ट्रे सामने रखी और शांति देवी की तरफ देखते हुए बहुत ही मीठी लेकिन तीखी आवाज़ में बोली, "अरे माँ जी, अभी तो जब मैं बालकनी से कपड़े उतार रही थी, तब आप शर्मा आंटी के घर के बाहर खड़ी होकर इतने ज़ोर-ज़ोर से हाथ नचा कर बातें कर रही थीं। आपकी फुर्ती देखकर तो शर्मा आंटी भी कह रही थीं कि शांति जी तो अभी भी तीस साल की लगती हैं। और यह दर्द अचानक भाभी को देखते ही कैसे उभर आया?"

शांति देवी की चोरी पकड़ी गई, लेकिन वे तिलमिला कर बोलीं, "तू क्या जाने री कल की छोकरी! अंदर हड्डियों में जो दर्द होता है, वो किसी को बाहर से थोड़ी दिखता है।"

रचना मुस्कुराई और उसने तेल की शीशी शांति देवी के पास रख दी। "कोई बात नहीं माँ जी, जब दर्द अंदर का है तो इलाज भी खुद ही करना पड़ेगा। यह रहा गरम तेल। ज़बान चलाने के साथ-साथ थोड़ा हाथ भी चला लीजिए, घुटनों पर मल लीजिए, बहुत आराम मिलेगा। भाभी सुबह छह बजे से स्कूल गई हैं, उनका शरीर भी पत्थर का नहीं है।"

पार्वती घबरा गई कि कहीं बात न बढ़ जाए। वह उठने लगी, लेकिन रचना ने आगे बढ़कर पार्वती का कंधा पकड़ लिया और उसे वापस बैठा दिया। "भाभी, कब तक ऐसे ही सबकी हाँ में हाँ मिलाती रहोगी? आपके भी दो हाथ-पैर हैं, कोई मशीन नहीं हो आप। चुपचाप यह चाय का कप उठाइए और मेरे साथ रसोई में चलिए। आज मैंने आपके पसंद के पकौड़े बनाए हैं। आराम से बैठकर बतियाएंगे।"

रचना ने पार्वती का हाथ पकड़ा और उसे लगभग खींचते हुए रसोई की तरफ ले गई। पार्वती की आँखों में एक अजीब सा सुकून था। आज तक उसे इस घर में किसी ने आराम करने को नहीं कहा था। रचना की इस ढाल ने उसे एक नई हिम्मत दी थी।

बरामदे में बैठी शांति देवी के लिए यह एक खुली बगावत थी। उनका वह 'झूठा दर्द' अब गायब हो चुका था और उसकी जगह अपमान ने ले ली थी। जब उन्हें लगा कि अब उनकी दाल यहाँ गलने वाली नहीं है और कोई उनके पैरों को दबाने नहीं आएगा, तो उन्होंने अपनी चप्पलें वापस पहनीं।

तख्त से झटके से उठते हुए शांति देवी ने बड़बड़ाना शुरू किया, "कलयुग है भाई, घोर कलयुग! बहुओं को तो सास का दर्द दिखता ही नहीं है।" फिर उन्होंने अपनी शॉल ठीक की और बाहर की तरफ कदम बढ़ाते हुए खुद से कहा, "ज़रा गली के नुक्कड़ पर बिमला के घर तक हो आती हूँ। बेचारी बहुत रो रही थी कल, कह रही थी कि उसकी बहू उसे एक गिलास पानी तक नहीं देती, बहुत परेशान करती है। जाकर उसे थोड़ा ढांढस बंधा कर आती हूँ।"

रचना, जो रसोई की खिड़की से यह सब देख रही थी, उसने पार्वती की तरफ देखकर आँख मारी और दोनों जेठानी-देवरानी की थकी हुई लेकिन सुकून भरी हँसी रसोई की दीवारों से टकराकर घर के उस तनावपूर्ण माहौल को हल्का कर गई। बाहर शांति देवी अपनी उसी फुर्ती के साथ बिमला की बहू की पंचायत करने निकल चुकी थीं, यह भूलकर कि उनके अपने घर में भी वे उसी दर्द का नाटक कर रही थीं।


आपकी क्या राय है?

क्या हर घर में एक ऐसी रचना की ज़रूरत नहीं है, जो अपनी जेठानी के दर्द को समझ सके? क्या रिश्तों की डोर सिर्फ एक औरत के झुकने से ही मज़बूत रहती है? अपनी राय हमें ज़रूर बताएँ।

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