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रस्मों रिवाज

 सुबह से ही घर में भागमभाग मची थी। माँ कभी सूटकेस में नेफ़्थलीन की गोलियाँ रख रही थीं, कभी मेरी जींस निकाल कर अलग रख देतीं।

“माँ, प्लीज़… मैंने कहा ना, इस बार नहीं जा पाऊँगी,” मैंने किताबें समेटते हुए फिर आवाज़ लगाई,
“अगले हफ़्ते मिड सेमेस्टर टेस्ट है, नोट्स भी पूरे नहीं हुए, आप समझ क्यों नहीं रही हैं?”

माँ ने बिना मेरी तरफ़ देखे जवाब दिया,
“पढ़ाई में दुनिया की अकेली तुम ही नहीं हो, नीलू। दो दिन कहीं जाकर आओगी तो तुम्हारी डिग्री रुक नहीं जाएगी। और वैसे भी, यह पहली तीज है तुम्हारे भैया की शादी के बाद, रीति है कि ससुराल पक्ष से कोई लड़की साथ जाए।”

“तो आप चली जाइए न, या पापा चले जाएँ…” मैंने आख़िरी कोशिश की।

माँ ने पलटकर ऐसा घूरा कि मेरे शब्द स्वतः गले में अटक गए।
“तेरे भैया की पहली तीज है, बहू पहली बार मायके गई है, और तू यहाँ बैठकर बिजनेस लॉ पढ़ती रहेगी? गाँव के लोग क्या कहेंगे? ‘शहर की लड़की है, रस्मों में यक़ीन नहीं रखती’—सबसे पहले तेरी चाची यही बोएँगी। उठ, बस्ता समेट, और ये दुपट्टा रख। ट्रेन का टाइम हो रहा है।”

मैंने हार मानकर बैग बंद किया।
दिल में कहीं एक कोना था जो गाँव की हवा, नदी किनारे की कच्ची पगडंडियाँ, और नीम के पेड़ पर लटके झूले के लिए मचलता था… लेकिन साथ ही ये बात भी खटक रही थी कि मेरा समय, मेरी पढ़ाई, सब कुछ रस्मों के नाम पर यूँ ही हल्के में ले लिया जाता है।

भैया ड्राइववे में गाड़ी स्टार्ट कर चुके थे।
“चल नीलू, वरना इस बार सच में तुझे वहीं छोड़ आएँगे,” उन्होंने चुटकी ली।

मैंने मुँह बिचकाया, “कहाँ? भाभी के गाँव या किसी और ग्रह पर?”

गाड़ी में बैठते ही शहर की भीड़ पीछे छूटने लगी। खेत, तालाब, सरसों की झूमती हल्की बची फसल, और दूर तक फैले आम के पेड़… मार्च की हल्की गर्म हवा भी गाँव की तरफ़ जाते हुए कुछ नरम लगती थी।


भाभी का गाँव एक पुराने ज़मींदार परिवार वाला था। बड़े-बड़े बरामदे, बीच में चौकोर आँगन, और दरवाज़े पर पीतल की घंटी। हमारी गाड़ी हवेली के सामने रुकी तो अंदर से एक साथ कई आवाज़ें आईं—

“अरे, दामाद जी आ गए!”
“नीलू बिटिया भी आई हैं?”

दालान में कदम रखते ही भाभी की माँ हाथ में आरती की थाली लिए खड़ी मिल गईं।
भैया के माथे पर रोली का तिलक, गले में कलावा, और कानों में चूड़ी की खनक। भैया तो जैसे अपने ही संसार में खोए थे; भाभी को देखते ही उनके चेहरे पर जो चमक आई, उसे देखकर बरबस मुस्कुरा दिया मैंने भी।

उसी भीड़ में मुझे एक परिचित चेहरा दिखा—हल्के पीले कुर्ते में, बिना किसी विशेष तामझाम के, भाभी का ममेरा भाई आदित्य।
शादी में उसे बस झलक भर देखा था—ऊपर मंडप के पास कुछ काम देखता हुआ, हाथ में कैमरा, और कभी-कभी हमारे ग्रुप की तरफ़ देखकर मुस्कुरा देता था।

“नमस्ते,” मैंने हल्का सा सिर झुकाकर कहा।

उसने दोनों हाथ जोड़कर जवाब दिया, “नमस्ते नीलू जी। फिर से गाँव में स्वागत है आपका।”

उसके ‘जी’ पर मुझे थोड़ी हँसी आ गई,
“इतना औपचारिक मत होइए, कॉलेज में प्रोफ़ेसर नहीं हूँ मैं।”

“आपके सामने तो मैं फेलो स्टूडेंट भी नहीं, बस गाँव का साधारण बंदा हूँ,” उसने मज़ाक में कहा और घर वालों की तरफ़ मुड़ गया।

भीतर से भाभी की दादी की आवाज़ आई,
“लो सुनो सब, इस बार तो मज़ा आ जाएगा। बड़ी पोती की तीज में दामाद भी, और उनकी बहन भी। अगली तीज तक छोटी पोती का भी कुछ इंतज़ाम हो जाए तो अच्छा रहे।”

बोलते-बोलते उन्होंने आँख दबाकर आदित्य की तरफ़ देखा और फिर मेरी ओर।
मेरे गाल गर्म हो गए। भाभी ने मुझे इशारे से शांत रहने को कहा और दादी को टालने लगीं,
“अरे बड़की तीज तो होने दीजिए पहले, आप अभी से नीलू के पीछे पड़ गईं।”


अगले दिन हरतालिका तीज थी।
सुबह से ही घर में मेहंदी, हल्दी, हरी चूड़ियों, और मिठाइयों की खुशबू घुली थी। आँगन में तुलसी के गमले के पास छोटे-छोटे मिट्टी के घड़े, ऊपर रंग-बिरंगे धागे, और पूजा की थाली में कलावा के अलग-अलग गुच्छे रखे थे।

भाभी ने समझाया,
“आज लड़कियाँ भगवान शिव–पार्वती से अच्छे जीवनसाथी की मनौती करती हैं। ये धागे इच्छाएँ बाँधने वाले हैं, पेड़ पर भी बाँधते हैं, और कलाई पर भी।”

मैंने हँसकर कहा,
“मेरी अभी कोई मनौती नहीं है, मुझे बस एग्ज़ाम पास करने हैं।”

भाभी जोर से हँस पड़ीं,
“दिन में चार केस स्टडी पढ़ लेती हो, और भगवान से भी मार्कशीट ही माँगोगी!”

दोपहर बाद आँगन में और भी औरतें और लड़कियाँ इकट्ठा हो गईं। दादी की निगरानी में पूजा शुरू हुई। भाभी, उनकी बहनें, और मैं सब जमीन पर आसन पर बैठ गए। आदित्य को भी दादी ने बुला लिया।

“अरे तू भी बैठ जा, बेटा,” दादी ने कहा,
“आज लड़कियों की मनौती है, लेकिन भगवान दोनों का सुनते हैं। बाँधना धागा तुम लोग, रखना निभाना तुम सबको ही।”

मैंने थाली उठाई थी। उस पर छोटे-छोटे कलावे रखे थे, हर एक पर पीले अक्षरों से “शुभ” लिखा था। हमें निर्देश था—पहले तुलसी माता पर एक धागा, फिर अपनी कलाई पर एक, और फिर चाहें तो किसी प्रियजन के लिए भी एक धागा बाँध सकते हैं।

मैंने चुपचाप तुलसी के गमले के चारों तरफ़ एक धागा बाँधा, मन ही मन सोचा—
“हे भगवान, अगले हफ्ते वाले टेस्ट अच्छे से निकलवा देना बस।”

आदित्य मेरे ठीक सामने बैठा था। उसके माथे पर तिलक की हल्की रेखा थी, और हाथ में फूल-माला। पूजा खत्म होते ही बच्चों का झुंड प्रसाद के लिए टूट पड़ा। दादी ने जल्दी-जल्दी सबको धागे बाँटना शुरू कर दिया।

इसी अफरा-तफरी में, जब मैं उठकर थाली लेकर खड़ी हुई, मेरी कलाई से एक कलावा फिसलकर गिरा।
मैंने झट से झुका, उसी समय आदित्य भी चौंककर नीचे झुका… धागा हवा में हिला, और जाने कैसे, मेरे हाथ से निकलकर सीधे उसके दाहिने हाथ की कलाई पर लिपट गया।
उसने सहजता से उसे थाम लिया, और दादी ने पलटकर यह दृश्य देख लिया।

“अरे वाह!” दादी ने तालियाँ बजा दीं,
“ये तो भगवान की सीधी मर्ज़ी है। लड़की के हाथ का धागा सीधे लड़के की कलाई पर… अब इससे ज़्यादा साफ़ संकेत क्या चाहिए?”

आँगन में ताली और हँसी की आवाज़ें गूँज उठीं।
“दामाद नहीं, घर का अपना लड़का,” कोई बोली।
“एक ही छत के दो रिश्ता, बढ़िया रहेगा,” बुआ ने जोड़ दिया।

मेरे कान तक तपने लगे।
“दादी, ये बस गलती से हुआ… धागा फिसल गया था,” मैंने समझाने की कोशिश की।

पर दादी कहाँ सुनने वाली थीं,
“बेटी, कुछ भी यूँ ही नहीं होता। तूने मन में जो इच्छा बाँधी होगी, भगवान ने जवाब दे दिया। देख न, धागा भी उसी के हाथ पर जा गिरा जिससे जुड़ना था।”

आदित्य कुछ बोलने ही वाला था, पर अचानक चुप हो गया।
उसकी आँखों में एक अजीब–सा संकोच और हल्का–सा मुस्कान का मिश्रण था।

मैंने गुस्से से उसकी तरफ़ देखा—
“आप कुछ कहिए ना, यह सब मजाक सही नहीं है,” पर शब्द केवल मन में ही घूम कर रह गए। होंठ भींचकर मैं अंदर कमरे में चली गई।

पूरे दो दिन मैंने उससे आँख मिलाने की कोशिश भी नहीं की।
जहाँ वह होता, मैं जान-बूझकर दूसरी तरफ़ निकल जाती।
भाभी ने दो–तीन बार छेड़ने की कोशिश की, पर मैंने मज़ाक में भी कोई बात आगे नहीं बढ़ने दी।

जब वापसी का समय आया, तब भी आदित्य गाड़ी तक आया ही नहीं।
बस दरवाज़े पर खड़े होकर बोला,
“अपना ख्याल रखना… और एग्ज़ाम अच्छे से देना।”

मैंने सिर हिला दिया, न धन्यवाद, न मुस्कान।
भैया ने स्टेयरिंग पकड़ा और शहर की तरफ़ निकल पड़े। रास्ते भर माँ और भाभी दादी की बातों पर हँसती रहीं,
“अरे लोगों की बातों पर ध्यान मत दे नीलू, बुज़ुर्ग हैं, कहने-सुनने को थोड़ा मजाक कर लेते हैं।”

पर मेरे लिए वो मज़ाक नहीं था।
किसी धागे के फिसल जाने भर से अगर ज़िंदगी तय हो जाती है, तो मेरे सपनों की, मेरे फैसलों की, कोई कीमत है भी या नहीं?


दो हफ्ते बाद घर में भाभी और माँ रसोई में धीमी आवाज़ में बात कर रही थीं। मैं पानी लेने गई तो अनायास सुन लिया।

“दीदी, आदित्य कह रहा था कि गाँव में सब लोग बातें बना रहे हैं,” भाभी बता रही थीं,
“कहते हैं, ‘शहर वाली नीलू ने तो मनौती बाँध दी, अब देखो कब डेट फाइनल होती है।’
उसे इस बात से ज़्यादा तकलीफ़ नहीं है, जितनी इस से कि नीलू उससे अब बात ही नहीं करती।”

माँ ने चिंता से पूछा,
“तो उसने क्या कहा?”

“कहा, ‘आंटी, मैं नीलू पर कोई दबाव नहीं डालूँगा। जो कुछ भी हुआ, गलती से हुआ, लेकिन अब मैं कुछ भी करूँगा तो उसे ऐसा लग सकता है कि मैं उस धागे का फायदा उठा रहा हूँ।’”

मुझे लगा, जैसे किसी ने मेरी जमी हुई सोच पर हल्का सा पानी छिड़का हो।
तो वो यूँ ही चुप नहीं था… उसे भी शायद यह सब अच्छा नहीं लगा होगा…

लेकिन फिर गुस्सा भी आया—
“उसी समय बोल सकता था ना दादी के सामने? तब चुप्पी साध ली, अब शहर से दूर बैठकर समझदारी दिखा रहा है।”

मैंने जाने-अनजाने किचन में कुछ ज़ोर से गिलास रख दिया। दोनों की नज़र मेरी तरफ़ उठ गयी।
“कुछ नहीं,” मैंने टालते हुए कहा, “बस हाथ से फिसल गया था—जैसे धागा।”


समय फिर भी रुकता नहीं।
सेमेस्टर ख़त्म हुआ, इंटर्नशिप की दौड़ शुरू हुई, और जीवन अपनी रफ़्तार से चल पड़ा। गाँव की तीज, धागा, दादी के ताने—सब धीरे-धीरे धुंधले होने लगे, बस कभी–कभी रात को सोचते हुए हल्का-सा खटक जाता।

एक दिन ऑफिस से लौटते हुए भैया ने casually कहा,
“कल सुबह अगर फ्री हो तो आदित्य को स्टेशन से ले आना।”

मैंने चौंककर पूछा,
“कौन आदित्य?”

“भाभी का ममेरा भाई। सिविल सर्विसेज़ का प्री दे रहा है शहर में, दो दिन हमारे यहाँ रहेगा। मेरी मीटिंग है, मैं नहीं जा पाऊँगा, इसलिए मैंने माँ से कहा कि नीलू जाएगी।”

माँ कमरे से ही बोलीं,
“देख नीलू, बच्चा पहली बार बड़े एग्ज़ाम देने शहर आया है, स्टेशन से अकेले लाना ठीक नहीं लगेगा। तू गाड़ी लेकर चली जाना।”

मैंने ठंडी साँस ली,
“ठीक है… गाड़ी मैं ले जाऊँगी।”

अगली सुबह जब मैं प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँची, तो आदित्य भीड़ के बीच खड़ा दिख गया—सफेद शर्ट, बैग कंधे पर, और हाथ में उसी तरह की पुरानी घड़ी।
मेरी तरफ़ देखते ही उसने हल्की मुस्कान दी,
“हाय, नीलू।”

“हाय,” मैंने छोटा सा जवाब दिया,
“चलो, गाड़ी इस तरफ़ है।”

रास्ते भर हल्की-फुल्की बातें होती रहीं—कोचिंग, एग्ज़ाम का पैटर्न, और शहर की ट्रैफ़िक।
कहीं भी तीज, धागा, या गाँव का ज़िक्र नहीं हुआ।
जैसे दोनों में से ही कोई उस याद को छूना नहीं चाहता था।

एग्ज़ाम वाले दिन माँ ने मुझे फिर साथ भेजा,
“तू वैसे भी ऑफिस लेट जा सकती है आज, पहले उसे सेंटर छोड़ आना, जगह नई है।”

पेपर का सेंटर थोड़ी दूर था।
आदित्य रास्ते भर सिलेबस, कट-ऑफ, और पिछले साल के सवालों में उलझा रहा। सेंटर के बाहर पहुँचकर मैंने कहा,
“घबराने की जरूरत नहीं, जो पढ़ा है वही आएगा। बाकी भगवान का काम।”

वह मुस्कुराया,
“भगवान ने अगर तीज वाले दिन धागे का काम इतना गंभीरता से ले लिया, तो शायद इस बार यह वाला भी सुन लें।”

मैंने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।
उसके शब्दों में मज़ाक था, लेकिन चेहरे पर एक हल्की गंभीरता भी थी।
कुछ कहे बिना मैंने बस ‘ऑल द बेस्ट’ कहा और गाड़ी मोड़ दी।

पेपर तीन घंटे का था।
सीधा घर लौटने की बजाय मैं शहर के एक छोटे-से बुक कैफ़े के बाहर रुक गई।
ज़्यादातर दिन मैं वहाँ अकेली चाय पीती, किताबें पढ़ती, और खुद से बातें करती थी।
अचानक एक ख़याल आया—क्यों न आज हम दोनों वहीं बैठ कर खुले में बात करें?

पेपर खत्म होने के बाद मैं दोबारा सेंटर पहुँच गई।
आदित्य बाहर आया तो चेहरे पर न तो बहुत खुशी थी न बहुत निराशा—जैसे हर अभ्यर्थी के चेहरे पर एक मानक-सी थकान और उम्मीद का मिश्रण होता है।

“कैसा गया?” मैंने पूछा।

“जैसे उम्मीद थी, उससे थोड़ा बेहतर। तुम?” वह हँस पड़ा,
“मतलब, तुमने कैसे बिताए ये तीन घंटे?”

“आओ, दिखाती हूँ,” मैंने कहा और उसे कैफ़े की तरफ़ इशारा किया।

वह बिना सवाल किए साथ चल पड़ा।
कांच के दरवाज़े के अंदर आते ही कॉफी की महक और हल्की-सी अंग्रेजी म्यूज़िक की धुन ने माहौल बदल दिया।

हम एक कोने वाली टेबल पर बैठ गए।
मैंने खुद के लिए मसाला चाय और उसके लिए ब्लैक कॉफी ऑर्डर की—शादी में उसने कहा था कि उसे ब्लैक कॉफी पसंद है, वह बात मुझे अनजाने में ही याद रह गई थी।

कप सामने आने तक हम दोनों चुप रहे।
चाय का पहला घूँट लेते हुए मैंने आखिरकार कहा,
“आदित्य, एक बात करनी थी तुमसे… गाँव वाली।”

उसने कप टेबल पर रखा, सीधा मेरी तरफ़ देखा,
“मैं भी करना चाहता था, पर सोचा, शायद तुम इस बारे में बात नहीं करना चाहोगी। तभी से टाल रहा था।”

मैंने गहरी साँस ली,
“तीज वाले दिन… जो हुआ, वो जानबूझ कर नहीं था। धागा फिसल गया, बस।
लेकिन उसके बाद जो हुआ, जो बातें बनीं, जो मज़ाक हुए… उससे मुझे बहुत गुस्सा आया।
ऐसा लगा, मेरे हाथ की छोटी-सी गलती के बहाने सब लोग मेरी पूरी ज़िंदगी पर दावा ठोकने लगे।”

आदित्य चुपचाप सुनता रहा।
मैंने आगे कहा,
“और तुम्हारी चुप्पी ने भी मुझे बहुत hurt किया।
तुम बोल सकते थे कि ये बस accident था, मजाक मत बनाइए…
पर तुम भी मुस्कुराए, चुप रहे। सब चलने दिया।”

उसने धीरे से सिर झुकाया, फिर मेरी आँखों में देखते हुए बोला,
“सॉरी… उस दिन के लिए नहीं, उसके बाद के हर दिन के लिए।
तुम्हें शायद लगे कि मैं डर गया था या कमजोर था। हो सकता है, था भी।
लेकिन सच यह है कि उस पल मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या सही है।
दादी, बुआ, सबकी हँसी के बीच अगर मैं कुछ कहता, तो या तो उनका दिल दुखता… या तुम्हारी बात और ज़्यादा चर्चा का विषय बन जाती।”

मैंने तंज कसते हुए कहा,
“तो आसान रास्ता चुन लिया—चुप रहो, मुस्कुराओ, और हवा में बात उड़ जाने दो…”

“हाँ, और वही मेरी सबसे बड़ी गलती थी,” उसने बिना बहस किए मान लिया।
“तुम्हें hurt हुआ, और मैंने बाद में भी तुमसे बात साफ नहीं की।
तुम सोचती रहीं कि शायद मैं भी उन मज़ाकों का हिस्सा था।
वास्तव में, मैं उस धागे से ज़्यादा उस नज़र से डर गया था, जो तुम्हारी आँखों में एक पल को आई थी—जैसे तुम्हारी इंसानी agency, तुम्हारा अपना निर्णय, सब कोई रस्म खा जाएगी।”

उसके शब्द सुनकर मैं हल्का सा चौंक गई।
मैंने सोचा नहीं था कि उसने इतने गहरे में जाकर इस बात पर सोचा होगा।

“और अब?” मैंने सीधा सवाल किया,
“अब क्या सोचते हो उस धागे के बारे में?”

आदित्य ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा।
धागा तो कब का उतर चुका था, पर जहाँ वो बाँधा गया था वहाँ हल्की-सी सफ़ेदी की रेखा अभी भी थी, धूप से कुछ कम जली हुई त्वचा की तरह।

“अब वो बस धागा नहीं है, नीलू,” उसने धीमे स्वर में कहा,
“रस्में कागज़ पर या दादी की ज़ुबान पर नहीं, हम लोगों के दिल में लिखी जाती हैं।
अगर मैं कहूँ कि उस दिन के पहले मुझे तुम्हारी तरफ़ कोई आकर्षण नहीं था, तो झूठ होगा।
शादी के समय तुमको एक–दो बार देखा, तुम्हारी बातें सुनीं… तुम्हारा अपने भैया से बहस का तरीका, भाभी की मदद करते हुए तुम्हारी हँसी… यह सब मुझे अच्छा लगा था।
पर मैंने सोचा, ‘ये सब कॉलेज वाली दोस्ती जैसा है, इसे नाम देने की ज़रूरत नहीं।’
फिर जब वो धागा मेरी कलाई पर आया, अचानक सबको वह ‘नाम’ मिल गया—जिसके लिए न तुम तैयार थीं, न मैं।
बस फर्क ये था कि तुमने उस भ्रम के ख़िलाफ़ खुद को बंद कर लिया, और मैंने अंदर ही अंदर उस संभावना को गंभीरता से देखना शुरू किया।”

मैं निशब्द उसे देखती रही।
वह आगे बोला,
“मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया हूँ, न किसी रस्म का वास्ता देने।
अगर तुम्हें लगता है कि वो सब बस accident था, और तुम खुद को मेरे साथ imagine भी नहीं कर सकती, तो मैं तुम्हारे निर्णय का सम्मान करूँगा।
पर कम से कम, ये मत समझना कि मैं तुम्हारी चुप्पी के बदले तुम्हारी मजबूरी खरीदने आया हूँ।”

चाय लगभग ठंडी हो चुकी थी।
कैफ़े के कोने में बजती धुन अब ज़्यादा सुनाई दे रही थी।
मैंने कप घुमाते हुए धीरे से कहा,
“तुम जानते हो, मुझे किस बात ने सबसे ज़्यादा परेशान किया?”

“किस बात ने?” उसने पूछा।

“इस बात ने कि गाँव के दो चार तानों, कुछ बुज़ुर्गों की हँसी, और एक रस्म के नाम पर, मुझे ऐसा लगने लगा था कि शायद मेरी ज़िंदगी पर मेरा हक़ ही नहीं है।
और जितना मैं विरोध करती, उतना ही लगता कि लोग कहेंगे—‘देखो, लड़की पहले धागा बाँधती है, फिर मना करती है।’
जैसे हाँ या ना दोनों ही मेरे खिलाफ़ इस्तेमाल हो सकते थे।”

“तो तुमने क्या सोचा?” उसने सचमुच उत्सुकता से पूछा।

मैंने थोड़ी सी मुस्कान के साथ कहा,
“पहले तो यही कि ‘मूव ऑन’… जैसा तुम्हारे favorite अंग्रेज़ी वाले dialog होता है।
लेकिन सच कहूँ तो…
गाँव से लौटने के बाद भी जब मैं अकेली होती थी, तुम किसी ना किसी बात से याद आ ही जाते थे।
भाभी के साथ तुम्हारी बातों के किस्से… तुम्हारा गाना, तुम्हारा बच्चों के संग खेलना…
ये सब याद आते तो लगता, ‘अगर इतना ही बुरा इंसान है, तो याद क्यों आ रहा है?’”

आदित्य के चेहरे पर हल्की आशंका और उम्मीद साथ-साथ तैरने लगी।

मैंने गहरी साँस ली,
“अब अगर तुम यह उम्मीद कर रहे हो कि मैं अचानक से कह दूँगी—‘हाँ, मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, बस धागे का इंतज़ार था’—तो ऐसा नहीं होने वाला।
पर इतना ज़रूर है कि मैं अब यह मान चुकी हूँ, मेरे मन में तुम्हारे लिए ‘कुछ’ है, जो डर, गुस्सा और चोट के पीछे कहीं दब गया था।
आज पहली बार हम यहाँ, बिना किसी दादी-बुआ के, बिना किसी मज़ाक के, अकेले बैठे हैं… और इस ‘कुछ’ को नाम देने की कोशिश कर रहे हैं।”

आदित्य की आँखें चमक उठीं।
“तो… क्या मैं इसे ‘शुरुआत’ कह सकता हूँ?” उसने हिचकते हुए पूछा।

मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया और मुस्कुरा कर कहा,
“हाँ, बस ‘शुरुआत’। धागों से नहीं, हमारी मर्ज़ी से।”


घर लौटने पर माहौल न जाने कैसे बदल गया।
शायद हमारे चेहरों से कुछ साफ़ दिखाई दे रहा था।
माँ ने मुझे रसोई में काम करते हुए देखा,
“नीलू, थक गई होगी, जा थोड़ा आराम कर ले। आदित्य भी कमरे में चला गया होगा। शाम को साथ बैठकर खाना खा लेना।”

कुछ हफ्ते ऐसे ही निकल गए—हम घरों के काम के बीच, बीच-बीच में छोटी–छोटी बातों में, कभी किताबों पर, कभी राजनीति पर, कभी गाँव की स्मृतियों पर बात करते।
न कहीं धागा का ज़िक्र, न दादी के तंज का।
जैसे कोई पुरानी फाइल, जिसके ऊपर हमने नया टाइटल चिपका दिया हो—“फ्यूचर”, “संभावना”, “हमारा निर्णय।”

एक शाम भैया और भाभी ने दोनों परिवारों को वीडियो कॉल पर जोड़ा।
स्क्रीन पर दादी भी दिखाई दे रही थीं, अपना पुराना चश्मा संभालती हुई।

“दादी, एक बात कहनी थी,” भाभी ने हँसते हुए कहा,
“याद है न, तीज वाले दिन आपका डायलॉग—‘लड़की के हाथ का धागा जिस लड़के की कलाई पर जा लगे, वो भगवान की जोड़ी होती है’?”

दादी ने हँसकर कहा,
“हाँ, तो? तभी तो कह रही थी, तुम लोग सुनते नहीं मेरी बात।”

भाभी ने स्क्रीन घुमाई।
मैं और आदित्य साथ सोफ़े पर बैठे थे।
हल्की-सी झिझक के साथ मैंने बोलना शुरू किया,
“दादी, आपकी जोड़ी वाली बात याद आ गई…
बस फर्क इतना है कि धागा तो भगवान ने गिरा दिया होगा, पर रिश्ता हमने खुद सोच-समझकर तय किया है।
अगर आप सब की रज़ामंदी हो, तो हम… आगे की बातें कर सकते हैं।”

दादी की आँखें भर आईं।
उन्होंने कैमरे के इतने पास आकर चेहरे को जमा लिया कि स्क्रीन पर बस उनकी झुर्रियों भरी मुस्कुराहट ही दिखने लगी।
“अरे पगली, इसी दिन का तो इंतज़ार था।
रस्म वही पूरी होती है, जिसमें दिल भी शामिल हो…
वरना ज़माने भर के धागे और सिंदूर भी बस दिखावा रह जाते हैं।”

दोनों तरफ़ से हँसी और तालियों की आवाज़ आई।
भाई ने मज़ाक में कहा,
“चलो, एक ही घर दो रिश्ते… अब गाँव वालों को भी नई gossip मिल जाएगी, लेकिन इस बार हम सब गर्व से सुनेंगे।”

माँ ने मेरी तरफ़ देखते हुए धीमे से कहा,
“फैसला तुम्हारा है, नीलू। हमने बस इंतज़ार किया था, कि तुम खुद बोलो।”

मेरे अंदर जाने क्यों एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई—डर की नहीं, राहत की।
मैंने आदित्य की तरफ़ देखा।
उसकी कलाई पर इस बार एक नया, साफ़-सुथरा कलावा बंधा था—जो उसने आज सुबह ही शिव मंदिर में बँधवाया था, मेरी जानकारी के बिना।

मैंने मुस्कुराकर उसकी कलाई पकड़ ली,
“धागा अब भी है… पर इस बार मुझे कोई डर नहीं लग रहा।”

उसने भी धीमे से जवाब दिया,
“क्योंकि इस बार इसे किसी रस्म ने नहीं, तुम्हारी मर्ज़ी ने जगह दी है।”


शहर की भीड़ में अब भी वही शोर, वही भाग-दौड़ थी।
पर मेरे भीतर एक अलग-सी शांति बस चुकी थी।
कभी-कभी शाम को बालकनी में बैठकर आसमान को देखते हुए मुझे गाँव का वह पहला तीज वाला दिन याद आ जाता—जब एक धागा अनजाने में किसी की कलाई पर गिरा था और मैं इसे सिर्फ़ मज़ाक मानकर भागती रही थी।

अब समझ आता है—
रस्में तभी तक बोझ लगती हैं, जब तक वे हमारे ऊपर थोपी जाती हैं।
जब वही रस्में हमारी पसंद, हमारे निर्णय, और हमारे प्रेम से जुड़ती हैं, तो वे बोझ नहीं, पुल बन जाती हैं—दो दिलों के बीच, दो घरों के बीच, दो दुनियाओं के बीच।

उस दिन कैफ़े में, ठंडी हो चुकी चाय के कप के साथ बैठकर जो एक ‘शुरुआत’ हुई थी,
वह शायद किसी भी धागे से ज़्यादा पवित्र थी—
क्योंकि उसने हमें यह समझा दिया था कि
ज़िंदगी की सबसे सच्ची रस्में कलाई पर नहीं, दिल की धड़कनों पर लिखी जाती हैं।


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  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...