सुशीला, जो मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई थी, धीमी आवाज़ में बोली, "मालकिन, वो पुलिस वाले उसे साथ चलने को कह रहे हैं, पर वो बेचारी कैसे जाए? दाह-संस्कार के लिए लकड़ी, कफ़न और घाट का खर्च कहाँ से लाएगी? उसके पास तो आज शाम के खाने के भी पैसे नहीं हैं। अगर वो आज काम पर नहीं गई तो ये दोनों बच्चे कल भूखे रह जाएंगे। गरीबी इंसान को इतना लाचार कर देती है कि वो अपने अपनों की आखिरी विदाई भी नहीं कर पाता।"
दिसंबर की वह सर्द सुबह मेरे लिए बहुत भागदौड़ भरी थी। शाम को मेरे पति के कुछ ऑफिस वाले दोस्त घर पर डिनर के लिए आने वाले थे और मेरी कामवाली, सुशीला, अब तक नहीं आई थी। घर का सारा काम बिखरा पड़ा था। मेरी नज़र बार-बार दीवार घड़ी पर जा रही थी। नौ बज चुके थे। जैसे ही डोरबेल बजी, मैंने दरवाज़ा खोला और अपना सारा गुस्सा सुशीला पर उतार दिया, "सुशीला, ये कोई समय है आने का? तुम्हें पता है ना आज घर में मेहमान आने वाले हैं! रोज़-रोज़ की तुम्हारी इस लेटलतीफी से मैं तंग आ चुकी हूँ।"
मेरी इस तेज़ आवाज़ और डांट का सुशीला पर रोज़ की तरह कोई असर नहीं हुआ। अक्सर मेरी डांट सुनकर वह अपने पल्लू से मुँह छुपाकर हंस देती थी या कोई बहाना बना देती थी, लेकिन आज वह बिल्कुल चुप थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखें सूजी हुई थीं। वह चुपचाप बिना कुछ कहे रसोई की तरफ जाने लगी।
उसकी यह खामोशी मुझे अजीब लगी। मेरा गुस्सा थोड़ा शांत हुआ तो मैंने पीछे से जाकर पूछा, "क्या बात है सुशीला? तबीयत तो ठीक है तुम्हारी? या फिर आज सुबह-सुबह शराबी पति से मार खाकर आई हो?"
सुशीला ने स्लैब पर डस्टर रखते हुए एक गहरी, ठंडी सांस ली। उसकी आवाज़ रुंधी हुई थी, "नहीं मालकिन, आज घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ। बस आते वक्त मन बहुत भारी हो गया। रास्ते में उस फ्लाईओवर के नीचे जो झोपड़ी डाल कर रहते थे ना... वो गुब्बारे और सस्ती बिंदी बेचने वाली बूढ़ी अम्मा... वो आज सुबह ठंड से गुज़र गई।"
यह सुनकर मैं भी एक पल के लिए सन्न रह गई। मेरी उत्सुकता बढ़ी, "वही जो उस बड़े से पीपल के पेड़ के पास तिरपाल बांध कर रहती थी?"
सुशीला ने साड़ी के पल्लू से अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, "हाँ मालकिन, वही। बिचारी का क्या हाल था। पिछले कुछ सालों से देख रही हूँ उसे। शहर की इस निष्ठुर सर्दी हो, चिलचिलाती धूप हो या फिर बारिश, वो बेचारी उस फ्लाईओवर के नीचे ही ज़िंदगी काट रही थी। कई बार पुलिस वाले डंडे मारकर उन्हें वहाँ से भगा देते, उनका तिरपाल फाड़ देते। वो अपना सारा सामान समेट कर सड़क के दूसरी तरफ जा बैठते। रात गहराने पर जब पुलिस की गाड़ी चली जाती, तो वो बूढ़ी औरत अपनी विधवा बहू और दो छोटे पोते-पोतियों के साथ फिर उसी पीपल के पेड़ के नीचे अपना प्लास्टिक तान लेती। कहाँ जाते मालकिन वो गरीब... इस बड़े शहर में उनका अपना था ही कौन।"
मुझे भी उस बूढ़ी औरत का चेहरा याद आ गया। शायद साठ-पैंसठ के पार रही होगी। झुर्रियों से भरा चेहरा, पर आँखों में अपने परिवार को पालने की एक अजीब सी जिद। रोज़ सुबह वो अपनी एक मैली सी चादर ओढ़े, कंधे पर एक झोला लटकाए रेड लाइट पर खड़ी हो जाती थी। धूल और धुएं के बीच जब गाड़ियाँ रुकतीं, तो वह खिड़कियों को खटखटाकर बालों की क्लिप, बिंदी और छोटे-मोटे प्लास्टिक के खिलौने बेचने की कोशिश करती। उसकी बहू, जो शायद तीस साल की भी नहीं थी, पास ही एक निर्माणाधीन इमारत में ईंटें ढोने का काम करती थी। गाँव में पड़े किसी भयंकर सूखे ने शायद उन्हें इस शहर के फुटपाथ पर धकेल दिया था।
सुशीला की बात सुनकर मेरे हाथ से काम छूट गया। मैं हॉल की खिड़की की तरफ गई, जहाँ से वह फ्लाईओवर साफ नज़र आता था। मैंने नीचे सड़क की तरफ झांका। फ्लाईओवर के नीचे एक कोने में लोगों की एक छोटी सी भीड़ जमा थी। भीड़ के बीचों-बीच ज़मीन पर एक सफेद, मैली सी चादर से कुछ ढंका हुआ था। वह अम्मा का शव था।
नीचे सड़क पर गाड़ियाँ अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थीं। शहर अपनी भागदौड़ में व्यस्त था, किसी के पास एक पल रुककर उस बेजान शरीर को देखने का वक्त नहीं था। तभी वहाँ सायरन बजाती हुई एक पुलिस की गाड़ी आई और उसके पीछे-पीछे नगर निगम की एक सफेद एम्बुलेंस।
मैं खिड़की के शीशे से चिपक कर वह नज़ारा देख रही थी। पुलिस के दो जवानों ने अम्मा की बहू, शांति, से कुछ पूछताछ की। शांति ज़मीन पर बैठी सुबक रही थी। पुलिस वाले शायद उसे एम्बुलेंस के साथ सरकारी अस्पताल या श्मशान घाट चलने को कह रहे थे। मैंने देखा कि शांति ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और सिर हिलाकर मना कर दिया। वह अपने फटे हुए पल्लू से लगातार अपने आँसू पोंछ रही थी।
सुशीला, जो मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई थी, धीमी आवाज़ में बोली, "मालकिन, वो पुलिस वाले उसे साथ चलने को कह रहे हैं, पर वो बेचारी कैसे जाए? दाह-संस्कार के लिए लकड़ी, कफ़न और घाट का खर्च कहाँ से लाएगी? उसके पास तो आज शाम के खाने के भी पैसे नहीं हैं। अगर वो आज काम पर नहीं गई तो ये दोनों बच्चे कल भूखे रह जाएंगे। गरीबी इंसान को इतना लाचार कर देती है कि वो अपने अपनों की आखिरी विदाई भी नहीं कर पाता।"
सुशीला की बात मेरे दिल में किसी तीर की तरह चुभ गई। नीचे एम्बुलेंस के दो कर्मचारियों ने उस मैली चादर में लिपटे अम्मा के शरीर को स्ट्रेचर पर रखा और एम्बुलेंस के अंदर धकेल दिया। गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ और वह सरकारी खाते में एक और लावारिस लाश का अंतिम संस्कार करने के लिए आगे बढ़ गई।
शांति फुटपाथ के उसी किनारे पर खड़ी रही। उसने एम्बुलेंस के पीछे दौड़ने की कोई कोशिश नहीं की, बस हाथ जोड़े खड़ी रही। उसकी आँखों से बहते आँसू उसके गालों की धूल को धो रहे थे। उसने वहीं खड़े-खड़े अपनी सास को उसकी आखिरी विदाई दे दी। उसके पैरों से लिपटे हुए उसके दोनों छोटे बच्चे अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से एम्बुलेंस को जाते हुए देख रहे थे। उनके हाथों में अभी भी बेचने के लिए रखे गए दो लाल गुब्बारे थे। उनकी समझ से परे था कि जो दादी उन्हें रात को अपनी सूखी बांहों में समेट कर सुलाती थी, वो अब इस सफेद गाड़ी में बैठकर कहाँ जा रही है, और उनकी माँ इतना रो क्यों रही है।
मैं खिड़की से पीछे हट गई। मेरे कानों में अब भी उन बच्चों की मासूमियत और उस विधवा की सिसकियाँ गूंज रही थीं। मुझे अपने आप पर भयंकर शर्म आ रही थी। मैं यहाँ अपने मेहमानों के लिए बनने वाले पनीर और पुलाव की चिंता में अपनी कामवाली पर चिल्ला रही थी, और कुछ कदम की दूरी पर एक परिवार के पास अपने मृत इंसान को एक कफ़न देने तक के पैसे नहीं थे। उस दिन के बाद से मेरी ज़िंदगी को देखने की नज़र हमेशा के लिए बदल गई।
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