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पिता का त्याग

 सरिता की आँखों से एक आंसू गिरकर थाली में जा गिरा। वह जानती थी कि कल फिर दिनेश बाबू को ऑफिस में सिर दर्द होगा, उन्हें फाइलों में नंबर देखने के लिए आँखों को सिकोड़ना पड़ेगा, शायद बॉस की डांट भी सुननी पड़े। लेकिन वह यह भी जानती थी कि आज रात जब उनका बेटा अपने प्रोजेक्ट पर काम करेगा, तो दिनेश बाबू उस धुंधले चश्मे के पीछे से उसे दुनिया का सबसे साफ़ और सुंदर सपना बनते हुए देखेंगे

दिनेश बाबू ने अपनी नाक पर टिके चश्मे को एक बार फिर ऊपर खिसकाया और अखबार के बारीक अक्षरों को पढ़ने की कोशिश की। लेकिन अक्षर थे कि चींटियों की कतार की तरह एक-दूसरे में मिले जा रहे थे। अचानक 'चट' की एक हल्की सी आवाज़ हुई। चश्मे की कमानी (डंडी), जो पहले से ही धागे और 'फेवीक्विक' के सहारे जुड़ी थी, आज आखिरकार जवाब दे गई। चश्मा उनकी गोद में आ गिरा।

"उफ्फ! यह भी अभी ही टूटना था," दिनेश बाबू बुदबुदाए।

रसोई से चाय की प्याली लाती हुई उनकी पत्नी, सरिता ने यह देख लिया। "अब रहने भी दीजिये। कब तक इस टूटे चश्मे को गोंद लगाकर चलाएंगे? छह महीने से कह रही हूँ कि नया बनवा लीजिये। अब तो नंबर भी बढ़ गया होगा। आप जैसे एकाउंटेंट के लिए आँखें ही तो सब कुछ हैं। अगर गलत एंट्री हो गई तो मालिक नौकरी से निकाल देंगे।"

दिनेश बाबू ने एक फीकी मुस्कान के साथ चश्मे का टूटा हुआ हिस्सा उठाया। "अरे, कुछ नहीं हुआ भाग्यवान। बस पेच ढीला हुआ है। मैं अभी ठीक कर लेता हूँ। और रही बात नए चश्मे की, तो इस महीने तो हाथ तंग है। अगले महीने दिवाली का बोनस मिलेगा तो पक्का बनवा लूँगा।"

सरिता जानती थी कि यह 'अगला महीना' पिछले दो सालों से नहीं आया है।

दिनेश बाबू एक प्राइवेट फर्म में मुनीम थे। तनख्वाह इतनी थी कि महीना की बीस तारीख आते-आते बटुआ और पेट, दोनों सिकुड़ने लगते थे। ऊपर से बेटा रोहन, जो अब दसवीं में था, उसकी कोचिंग की फीस और बेटी रिया की कॉलेज की पढ़ाई। दिनेश बाबू अपनी जरूरतों की सूची में हमेशा सबसे आखिर में आते थे।

शाम को दिनेश बाबू दफ्तर से लौटे तो देखा रोहन कोने में मुंह फुलाए बैठा है।

"क्या हुआ भाई? हमारा शेर बेटा आज इतना उदास क्यों है?" दिनेश बाबू ने जूते उतारते हुए पूछा।

रोहन ने कोई जवाब नहीं दिया। सरिता ने पानी का गिलास थमाते हुए धीरे से कहा, "आज स्कूल में साइंस एग्जीबिशन (प्रदर्शनी) की घोषणा हुई है। इसे एक वर्किंग मॉडल बनाना है—सोलर सिस्टम का। उसके लिए मोटर, बैटरी, तार और पता नहीं क्या-क्या सामान चाहिए। कह रहा था कि पूरी क्लास के बच्चे बढ़िया प्रोजेक्ट बना रहे हैं, अगर इसका प्रोजेक्ट अच्छा नहीं हुआ तो इंटरनल मार्क्स कम हो जाएंगे।"

"तो इसमें उदास होने की क्या बात है?" दिनेश बाबू ने रोहन के सिर पर हाथ फेरा। "सामान आ जाएगा। लिस्ट बना ली है?"

रोहन ने नम आँखों से पिता की ओर देखा। "पापा, लिस्ट तो बना ली है, लेकिन सामान कम से कम आठ सौ रुपये का आएगा। मैंने इंटरनेट पर देखा था। और मुझे पता है अभी बजट नहीं है।"

दिनेश बाबू का दिल एक पल के लिए सिहर गया। आठ सौ रुपये। उनकी जेब में इस वक्त कुल मिलाकर बारह सौ रुपये पड़े थे, जो उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपने नए चश्मे के लिए बचाकर रखे थे। आज सुबह ही चश्मा पूरी तरह टूट चुका था, उन्होंने उसे काले धागे से बांधकर जैसे-तैसे काम चलाया था, लेकिन ऑफिस में फ़ाइलें पढ़ते वक्त सिर में जो भयंकर दर्द हुआ था, उसने उन्हें तय करने पर मजबूर कर दिया था कि आज शाम को नया चश्मा बनवाना ही है। बिना चश्मे के उनकी नौकरी खतरे में थी।

"तू चिंता मत कर बेटे," दिनेश बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा। "पापा हैं न। तू लिस्ट दे। मैं अभी बाज़ार जा रहा हूँ, लेते आऊंगा।"

"सच पापा?" रोहन का चेहरा खिल उठा।

"बिलकुल सच। तू अपनी तैयारी कर।"

दिनेश बाबू घर से निकले। उनकी जेब में वो बारह सौ रुपये थे। उनके कदम चश्मे की दुकान की तरफ बढ़ रहे थे। आँखों के सामने धुंधलापन था, सड़क की लाइटें फैली हुई दिख रही थीं। सिर का दर्द अभी भी हथौड़े की तरह बज रहा था।

वे 'गुप्ता ऑप्टिकल्स' के पास पहुंचे।

"अरे दिनेश भाई, आइये," दुकानदार ने पहचाना। "आज तो नया बनवाना ही पड़ेगा। वह पुराना वाला तो अब वेंटिलेटर पर है।"

दिनेश बाबू ने जेब में हाथ डाला। नोटों को टटोला। "हाँ गुप्ता जी, बस इसीलिए आया हूँ। वह सस्ता वाला फ्रेम और लेंस कितने तक में बन जाएगा?"

"देखिये, आपकी आँखों का नंबर कॉम्प्लीकेटेड है। प्रोग्रेसिव लेंस लगेगा। फ्रेम मैं आपको सबसे सस्ता वाला दे दूँगा, फिर भी सब मिलाकर हज़ार-बारह सौ तो लग ही जाएंगे।"

दिनेश बाबू चुप हो गए। बारह सौ। यानी पूरी की पूरी जमा पूंजी।

तभी उनकी नज़र सामने वाली 'स्टेशनरी और इलेक्ट्रिकल्स' की दुकान पर पड़ी। वहां कुछ बच्चे स्कूल प्रोजेक्ट का सामान खरीद रहे थे। उन्हें रोहन का खिला हुआ चेहरा याद आया। "सच पापा?"

दिनेश बाबू ने एक गहरी सांस ली। उन्होंने अपनी जेब से हाथ बाहर निकाला।

"गुप्ता जी," दिनेश बाबू ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा, "वो... दरअसल, आज मैं अपना पर्स घर भूल आया हूँ। बस रेट पता करने आया था।"

गुप्ता जी ने चश्मा थोड़ा नीचे करके उन्हें देखा। "अरे दिनेश भाई, आप पुराने ग्राहक हैं। बनवा लीजिये, पैसे बाद में दे दीजियेगा।"

उधारी। दिनेश बाबू का स्वाभिमान और मध्यमवर्गीय डर आड़े आ गया। सर पर पहले ही घर की मरम्मत का कर्ज़ था।

"नहीं-नहीं गुप्ता जी," उन्होंने जल्दी से कहा। "उधारी मुझे पचती नहीं है। मैं दो-चार दिन में आता हूँ। तब तक आप... आप बस इसमें एक और टांका लगा दीजिये। थोड़ा टाइट कर दीजिये धागा।"

गुप्ता जी ने सिर हिलाते हुए उनके पुराने, बदरंग चश्मे के दोनों हिस्सों को फिर से काले धागे और गोंद से जोड़ दिया। "लीजिए, पर यह ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। आँखें खराब हो जाएंगी।"

"चल जाएगा... चलाना पड़ेगा," दिनेश बाबू ने मन ही मन कहा।

वहां से निकलकर वे सीधे सामने वाली दुकान पर गए। उन्होंने रोहन की दी हुई लिस्ट निकाली। मोटर, कॉपर वायर, एलईडी लाइट्स, प्लाईवुड, रंगीन कागज़। दुकानदार ने सामान पैक किया।

"कितने हुए भाई?"

"साहब, कुल मिलाकर आठ सौ पचास रुपये हुए।"

दिनेश बाबू ने बिना एक पल की देरी किए जेब से नोट गिने और दुकानदार को थमा दिए। बचे हुए साढ़े तीन सौ रुपये लेकर जब वे दुकान से बाहर निकले, तो उन्हें लगा जैसे उनकी आँखों की रोशनी वापस आ गई हो। सब कुछ साफ़ दिख रहा था—सड़क, लोग, गाड़ियाँ। शायद आँखों से नहीं, मन से देख रहे थे।

घर पहुँचकर उन्होंने थैला रोहन के हाथ में थमाया।

"वाह पापा! आप तो जादूगर हो! सब कुछ ले आए!" रोहन ने उछलते हुए थैला खोला। "पापा, इसमें तो वो महंगी वाली डीसी मोटर भी है। अब तो मेरा प्रोजेक्ट बेस्ट बनेगा!"

रोहन खुशी से झूमता हुआ अपने कमरे में भागा। सरिता, जो खाना लगा रही थी, ने दिनेश बाबू की तरफ देखा। उनकी नज़र सीधे दिनेश बाबू के चश्मे पर गई। वही पुराना चश्मा, जिस पर अब काले धागे की एक और परत चढ़ गई थी।

सरिता सब समझ गई। वह चुपचाप उनके पास आई।

"चश्मा नहीं बनवाया?" उसने धीमे स्वर में पूछा।

दिनेश बाबू ने कुर्ते के पल्लू से चश्मा पोंछा। "अरे, गुप्ता जी की दुकान बंद थी। और फिर मैंने सोचा, अभी यह वाला काम तो कर ही रहा है। फालतू खर्चा क्यों करना? अभी वैसे भी दीवाली आ रही है, तब डिस्काउंट मिलेगा।"

"झूठ बोलना तो आपको आता नहीं है," सरिता की आवाज़ भर्रा गई। "दुकान बंद नहीं थी, जेब बंद थी। रोहन के प्रोजेक्ट के लिए अपने आँखों की रोशनी दांव पर लगा दी?"

दिनेश बाबू ने हंसते हुए बात टालने की कोशिश की। "अरे भाग्यवान, मेरी आँखें तो अब बुढ़ापे की ओर हैं, धुंधली भी हो जाएं तो क्या फर्क पड़ता है? पर रोहन का भविष्य धुंधला नहीं होना चाहिए। उसे साफ़ दिखना चाहिए। उसके सपने साफ़ होने चाहिए। अगर मेरे पुराने चश्मे के पीछे छिपकर उसका भविष्य चमकता है, तो यह सौदा सस्ता है।"

सरिता की आँखों से एक आंसू गिरकर थाली में जा गिरा। वह जानती थी कि कल फिर दिनेश बाबू को ऑफिस में सिर दर्द होगा, उन्हें फाइलों में नंबर देखने के लिए आँखों को सिकोड़ना पड़ेगा, शायद बॉस की डांट भी सुननी पड़े। लेकिन वह यह भी जानती थी कि आज रात जब उनका बेटा अपने प्रोजेक्ट पर काम करेगा, तो दिनेश बाबू उस धुंधले चश्मे के पीछे से उसे दुनिया का सबसे साफ़ और सुंदर सपना बनते हुए देखेंगे।

अगले दिन, रोहन स्कूल से लौटा तो उसके हाथ में एक ट्रॉफी थी। "पापा! पापा! मेरा प्रोजेक्ट फर्स्ट आया है!"

दिनेश बाबू, जो उस वक्त अपने चश्मे को टेप से चिपका रहे थे क्योंकि वह फिर से टूट गया था, ने सिर उठाया। उन्हें बेटा साफ़ नहीं दिख रहा था, बस एक धुंधली सी परछाई दिख रही थी जो खुशी से नाच रही थी।

"शाबाश मेरे शेर!" उन्होंने उसे गले लगा लिया।

उस धुंधलेपन में उन्हें जो सुकून मिला, वह किसी भी ब्रांडेड, महंगे और साफ़ लेंस वाले चश्मे से नहीं मिल सकता था।

मध्यमवर्गीय पिता की कहानी यही होती है। वह अपनी ज़रूरतों को 'जुगाड़' के धागे से बांधकर रखता है, ताकि उसके बच्चों के सपनों की उड़ान में कोई कमी न आए। वह खुद फटे हुए जूतों में चलता है या टूटा हुआ चश्मा पहनता है, ताकि उसके बच्चे दुनिया को अपनी नज़र से नहीं, बल्कि एक नई, साफ़ और ऊँची नज़र से देख सकें।

रोहन अपनी ट्रॉफी दिखा रहा था, और दिनेश बाबू अपना टूटा चश्मा छिपा रहे थे। उस कमरे में दो तरह की जीत थी—एक जो दुनिया को दिख रही थी (ट्रॉफी), और एक वह जो सिर्फ उस घर की दीवारों और सरिता की नम आँखों को पता थी (त्याग)।

और सच तो यही है, दुनिया की हर बड़ी कामयाबी की नींव में किसी पिता का एक 'टूटा हुआ चश्मा' या 'घिसी हुई चप्पल' ज़रूर दबी होती है।

लेखिका : रमा शुक्ला


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