सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रक्त और स्वार्थ

 बनारस के पुराने मोहल्ले में स्थित 'शांति सदन' की भव्यता अब वक्त की मार और परिवार की कड़वाहट के बीच दम तोड़ रही थी। घर के आंगन में लगे नीम के पेड़ के नीचे एक पुरानी बेंच पर सरोजनी देवी बैठी थीं, जिनकी आँखों में मोतियाबिंद की सफेदी से ज्यादा अपनों की बेरुखी का दर्द साफ झलकता था। उनके पति के गुजरने के बाद, यह हवेली ही उनकी एकमात्र पूंजी थी और उनके दो बच्चे—बड़ी बेटी आराधना और छोटा बेटा मयंक—उनकी सबसे बड़ी संपत्ति।

आराधना बचपन से ही समझदार थी, या यूँ कहें कि वह अपनी जरूरतों को मनवाना जानती थी। शादी के बाद भी उसने मायके पर अपना कब्जा जमाए रखा था। वहीं मयंक, जो शहर में एक छोटी सी नौकरी करता था, अपनी पत्नी रश्मि के साथ कभी-कभार ही घर आ पाता था। आज घर का माहौल कुछ अलग था। सरोजनी देवी की तबीयत पिछले कई दिनों से खराब चल रही थी, और इसी बीच वसीयत की बात हवा में तैरने लगी थी।

रश्मि रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसने सुना कि आराधना दीदी अपनी माँ के कमरे में अलमारी की चाबियों को लेकर बहस कर रही हैं। रश्मि से रहा नहीं गया, वह चाय का कप लेकर कमरे के दरवाजे पर खड़ी हो गई। आराधना के हाथ में कुछ पुराने दस्तावेज थे जिन्हें वह बड़ी बेसब्री से देख रही थी।

रश्मि ने बड़ी शांत लेकिन गंभीर आवाज में पूछा, "दीदी! क्या अम्मा जी की सारी जायदाद पर... आपका अकेले का ही हक है? क्या मयंक का इस घर में कोई स्थान नहीं?"

आराधना ठिठकी, उसका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। "हक की बात तुम जैसी बाहर से आई औरत न ही करे तो बेहतर है रश्मि। जब माँ बीमार थी, तब मैं यहाँ खड़ी थी। मयंक तो महीने में एक बार फोन करके अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेता है। इस घर की देखभाल मैंने की है, तो हक भी मेरा ही होगा।"

बहस बढ़ती गई। शब्दों के तीर एक-दूसरे के चरित्र और नीयत को छलनी करने लगे। कमरे के भीतर लेटी सरोजनी देवी सब सुन रही थीं। उनकी आँखों से आंसू बहकर तकिये को भिगो रहे थे। उन्हें याद आया जब ये दोनों बच्चे छोटे थे, तो एक खिलौने के लिए लड़ते थे और वह उन्हें समझाती थी कि बाँटकर रहने में ही सुख है। पर आज खिलौना नहीं, करोड़ों की हवेली थी और समझाने वाली माँ खुद बेबस थी।

अगले कुछ हफ्तों में घर का बंटवारा एक कानूनी जंग में बदल गया। मयंक ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। आराधना ने माँ को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वह उन्हें खाना तो देती, लेकिन साथ में कड़वे बोल भी परोसती। रश्मि और मयंक भी अब केवल अपने 'हिस्से' के लिए लड़ रहे थे, उन्हें उस माँ की गिरती सेहत से ज्यादा उस जमीन के टुकड़े की चिंता थी जो शहर के मुख्य मार्ग पर था।

एक दिन, सरोजनी देवी ने सबको अपने पास बुलाया। उनकी आवाज बहुत कमजोर हो चुकी थी। उन्होंने कांपते हाथों से एक लिफाफा मेज पर रखा। "तुम दोनों को अपना हिस्सा चाहिए न? लो, इसमें सब लिखा है।"

आराधना और मयंक दोनों ने झपटकर लिफाफा खोला। लेकिन भीतर जो निकला, उसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी। वह कोई वसीयत नहीं थी, बल्कि बैंक के कर्ज के कागजात थे। सरोजनी देवी के पति ने अपनी बीमारी के इलाज और बच्चों की पढ़ाई के लिए हवेली को गिरवी रखा था। सालों से सरोजनी देवी अपनी पेंशन से उसका ब्याज भर रही थीं, लेकिन अब कर्ज की राशि मूलधन से कहीं ज्यादा हो चुकी थी।

"इस हवेली पर अब न तुम्हारा हक है आराधना, न तुम्हारा मयंक। बैंक वाले अगले महीने इसे कुर्क करने आ रहे हैं। मैं तो जा रही हूँ, लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि मैंने तुम्हें संस्कार नहीं, सिर्फ भूख दी—पैसों की भूख।"

इतना कहकर सरोजनी देवी ने अपनी आँखें मूंद लीं। वह शायद उस शांति की तलाश में चली गई थीं जो 'शांति सदन' में अब बची ही नहीं थी।

आराधना और मयंक एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे। जिस जायदाद के लिए उन्होंने अपनी माँ का सुकून छीना, अपने रिश्तों में जहर घोला, वह असल में एक खोखला ढांचा था। उस दिन हवेली के उस पुराने नीम के पेड़ से आखिरी पत्ता भी गिर गया। मोहल्ले वालों ने देखा कि वह बड़ी हवेली नीलाम हो गई, और जो भाई-बहन कल तक एक-दूसरे का खून पीने को उतारू थे, आज एक-दूसरे से नजरें चुराकर अलग-अलग रास्तों पर चल दिए।

पीछे छूट गई तो बस एक अधूरी कहानी और वह कड़वा सवाल—"क्या जायदाद रिश्तों से बड़ी होती है?"


क्या आपको लगता है कि आराधना और मयंक की तरह आज हर घर में लालच रिश्तों पर हावी हो रहा है? अगर आप उनकी जगह होते, तो माँ की संपत्ति चुनते या माँ का साथ? अपनी कीमती राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...