सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जहाँ मायका पराया लगा… वहाँ ससुराल घर बन गया

 कांच की खिड़की से टकराती बारिश की बूंदें नैना के मन में चल रही उथल-पुथल से होड़ लगा रही थीं। वह अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में कॉफ़ी का मग था, लेकिन ध्यान कहीं और था। आज सुबह ही वह अपने मायके, यानी अपनी माँ के घर से लौटी थी। दस दिन रही थी वहां। कहने को तो वह उसका अपना घर था, जहां वह पैदा हुई, पली-बढ़ी, लेकिन इस बार उसे वहां एक अजीब सा 'परायापन' महसूस हुआ था। और विडंबना यह थी कि जिस घर को समाज 'पराया' कहता है—यानी उसका ससुराल—वहां लौटकर उसे खुली हवा में सांस लेने जैसा महसूस हो रहा था।

नैना की शादी को दो साल हो चुके थे। पति, आकाश, एक समझदार इंसान थे और सास, सुमित्रा देवी, एक बेहद कम बोलने वाली महिला। नैना की अपनी माँ, वंदना जी, बहुत मुखर और चंचल स्वभाव की थीं। नैना को हमेशा लगता था कि उसकी माँ दुनिया की सबसे बेहतरीन माँ हैं और सासू माँ... खैर, वह बस 'सास' हैं। एक ऐसी महिला जो शायद मन ही मन अपनी सत्ता छिन जाने से डरती होंगी। लेकिन पिछले दस दिनों की घटनाओं ने नैना के सोचने का नज़रिया पूरी तरह बदल दिया था।

कहानी कुछ यूँ शुरू हुई थी कि नैना ने अपनी नौकरी छोड़कर अपना खुद का बुटीक डिज़ाइनिंग का काम शुरू करने का फैसला किया था। इसके लिए उसे घर में एक अलग जगह, एक स्टूडियो जैसा कुछ चाहिए था।

जब वह मायके गई, तो उसने बड़े उत्साह से अपनी माँ वंदना जी से कहा, "माँ, सोच रही हूँ तुम्हारे यहाँ जो ऊपर वाला कमरा खाली पड़ा है, वहां अपना सेट-अप लगा लूँ? शुरुआत में क्लाइंट्स कम होंगे, तो रेंट बच जाएगा। वैसे भी पापा ने वो कमरा कबाड़ भरने के लिए रखा है।"

वंदना जी ने चाय छानते हुए माथे पर शिकन डाली। "अरे नहीं बेटा। वहां तो तेरे पापा का पुराना सामान रखा है। और फिर, तू यहाँ काम शुरू करेगी तो मोहल्ले वाले क्या कहेंगे? कि दामाद जी कुछ कमाते नहीं हैं क्या जो बेटी मायके में दुकान खोल रही है? और फिर... देख, तेरा आना-जाना लगा रहे, वो ठीक है। पर यहाँ परमानेंट अड्डा जमाना... रिश्तों में खटास आ जाती है। तू मेहमान है, रानी बनकर रह, काम-धाम की टेंशन ससुराल में जाकर ले।"

नैना चुप रह गई। माँ का प्यार था, पर उस प्यार में एक सीमा रेखा थी। "तू मेहमान है"—यह वाक्य उसके कानों में गूंजता रहा। उसने देखा कि जिस अलमारी में कभी उसके कपड़े भरे रहते थे, अब वहां उसकी भाभी का सामान था। जब उसने अपनी पुरानी जगह पर अपना तौलिया रखना चाहा, तो माँ ने टोक दिया, "अरे नैना, गीला तौलिया वहां मत रख, सनमाइका ख़राब हो जाएगी। तू बालकनी में डाल दे।"

छोटी-छोटी बातें थीं। माँ ने उसे लाड़ तो बहुत लड़ाया, सुबह देर तक सोने दिया, खाना बिस्तर पर दिया, लेकिन 'अधिकार' नहीं दिया। रसोई में जब नैना ने अपनी पसंद की भिंडी बनानी चाही, तो माँ ने हँसकर कहा, "रहने दे, तू तेल ज़्यादा डाल देती है, तेरे पापा को पसंद नहीं आएगा। मैं बना देती हूँ।"

नैना को समझ आ गया कि मायका अब एक 'हॉलिडे होम' है, उसका 'घर' नहीं। वहां उसे लाड़ मिल सकता है, पर जगह (space) और निर्णय लेने की आज़ादी नहीं।

आज जब वह वापस ससुराल लौटी, तो उसका मन भारी था। उसे लगा यहाँ तो और भी मुश्किल होगी। स्टूडियो के लिए जगह मांगना मतलब पहाड़ तोड़ने जैसा होगा। सुमित्रा देवी (उसकी सास) वैसे भी पुराने ख्यालात की थीं, उन्हें ये 'वर्क फ्रॉम होम' और 'स्टार्टअप' शायद ही समझ आए।

शाम को आकाश ऑफिस से आए। डिनर की टेबल पर नैना ने हिम्मत जुताई। सुमित्रा देवी चुपचाप रोटी पर घी लगा रही थीं।

"आकाश, मुझे अपना काम शुरू करने के लिए घर में एक कमरा चाहिए होगा," नैना ने झिझकते हुए कहा। "मैं सोच रही थी कि गैराज के पास वाला स्टोर रूम साफ़ करवा लूँ? हालांकि वहां रौशनी कम है, पर काम चल जाएगा।"

आकाश कुछ बोलते, उससे पहले ही सुमित्रा देवी बोल पड़ीं, "स्टोर रूम? वहां तो सीलन की बदबू आती है। वहां तू डिज़ाइनिंग कैसे करेगी? कपड़े ख़राब हो जाएंगे।"

नैना का दिल बैठ गया। उसे लगा अब मनाही आने वाली है। 'देखा, मैंने कहा था न, सास तो सास होती है,' उसने मन ही मन सोचा।

सुमित्रा देवी ने पानी का गिलास नैना की ओर बढ़ाया और शांत स्वर में कहा, "मैंने कल ही मिस्त्री को बुलाकर ऊपर वाला मास्टर बेडरूम खाली करवा दिया है। उसकी दीवारें भी पुतवा दी हैं। बड़ी खिड़की है वहां, रौशनी अच्छी आती है। तू वहां अपना ऑफिस बना ले।"

नैना के हाथ से निवाला गिरते-गिरते बचा। "मास्टर बेडरूम? पर माँ जी... वो तो आपका कमरा है। पापा जी की सारी यादें, आपका पूजा का कोना... सब वहीँ तो है। आप... आप कहाँ रहेंगी?"

सुमित्रा देवी ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा, "मैं नीचे वाले कमरे में शिफ्ट हो गई हूँ। मेरे घुटनों में अब दर्द रहने लगा है, बार-बार सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल होता है। और फिर, मुझे इतनी बड़ी जगह का क्या करना है? मेरी ज़रूरते तो एक चारपाई और टीवी तक सीमित हैं। तुझे काम बढ़ाना है, तुझे जगह की ज़रूरत है।"

नैना सन्न रह गई। उसे याद आया मायके का वो खाली पड़ा कबाड़ वाला कमरा, जिसे देने में माँ को 'समाज' और 'व्यवस्था' की चिंता थी। और यहाँ? यहाँ इस महिला ने, जिसे वह पराया समझती थी, अपनी सबसे कीमती जगह, अपना शयनकक्ष—जो इस घर में उनके अस्तित्व का केंद्र था—बिना मांगे नैना के सपनों के नाम कर दिया था।

खाना खाने के बाद नैना ऊपर गई। कमरा सचमुच खाली था। बस एक कोने में सुमित्रा जी की एक पुरानी तस्वीर रह गई थी। दीवारों का रंग ताज़ा था। साफ़-सफाई ऐसी कि नैना अभी अपनी टेबल लगा ले। उसने देखा कि कमरे के अटैच्ड बाथरूम में भी नए टाइल्स लगवाए गए थे और नैना की पसंद का खुशबूदार हैंडवॉश रखा था।

नैना की आँखों में आंसू आ गए। वह तुलना करने से खुद को रोक नहीं पाई।

शादी के वक़्त माँ ने कहा था, "बेटा, अपनी साड़ियां संभल कर रखना, ससुराल वाले न जाने कैसे हों।" और यहाँ सुमित्रा जी ने गृह-प्रवेश वाले दिन ही अपनी अलमारी की चाभी नैना को थमा दी थी और कहा था, "ये ले, आज से घर का राशन और खर्चे तू देखना। मुझे अब इन झंझटों से मुक्ति चाहिए। जो तुझे सही लगे, वो बना, जो तुझे सही लगे, वो मंगा।"

मायके में माँ ने विदाई के समय नैना को गले लगाकर रोते हुए कहा था, "अपना ख्याल रखना।" लेकिन उन्होंने नैना के लिए कोई एफडी या संपत्ति नहीं दी थी, सब भाई के नाम था। "बेटियां तो पराई होती हैं," यही रीत थी। लेकिन यहाँ? सुमित्रा जी ने पिछले महीने ही आकाश को डांटकर कहा था, "नए फ्लैट की नॉमिनी में नैना का नाम डालना। कल को मुझे या तुझे कुछ हो जाए, तो मेरी बहु को किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।"

नैना बालकनी में खड़ी यही सब सोच रही थी कि तभी पीछे से सुमित्रा देवी आईं। उनके हाथ में एक शॉल थी।

"हवा ठंडी है, ओढ़ ले," उन्होंने शॉल नैना के कंधों पर डाल दी।

नैना ने पलटकर सास को देखा। वह झुर्रियों भरा चेहरा, जिस पर न कोई दिखावा था, न कोई अहसान जताने का भाव।

"माँ जी," नैना ने रुंधे गले से कहा। "आपने अपना कमरा क्यों छोड़ा? मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मैं कहीं और एडजस्ट कर लेती।"

सुमित्रा देवी ने हँसकर कहा, "पगली, जब पेड़ बड़ा होने लगता है न, तो गमले बदल देने चाहिए, वरना जड़ें फैल नहीं पातीं। मैं तो अब शाम का सूरज हूँ, ढल रही हूँ। तू उगता हुआ सवेरा है। अगर मैं अपनी पुरानी जगह, अपनी पुरानी आदतों को जकड़ कर बैठ जाऊंगी, तो तू इस घर में फैलेगी कैसे? और अगर तू खुश नहीं रहेगी, तो मेरा बेटा खुश कैसे रहेगा? और ये घर... घर कैसे रहेगा?"

ये शब्द नैना के दिल में तीर की तरह उतर गए। कितनी गहराई थी इस सोच में।

नैना को याद आया कि शादी से पहले माँ अक्सर कहती थीं, "ससुराल में जुबान कम चलाना, वहां एडजस्ट करना पड़ता है।" माँ ने उसे 'झुकना' सिखाया था। लेकिन सुमित्रा जी? उन्होंने पहले दिन ही कहा था, "ये घर अब तेरा है। अगर तुझे परदे पसंद नहीं, तो बदल दे। अगर तुझे खाना देर से खाना है, तो देर से खा। किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है, मैं बैठी हूँ न।"

माँ ने उसे 'डर' दिया था, सास ने 'हिम्मत'।

माँ ने उसे 'संस्कार' दिए थे, सास ने 'संसाधन' (resources)।

माँ ने उसे 'विदा' किया था, सास ने उसे 'अपनाया' था।

नैना ने अचानक महसूस किया कि समाज कितना गलत नैरेटिव सेट करता है। हम लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि माँ की ममता का कोई मोल नहीं, और सास हमेशा खडूस होती है। लेकिन सच्चाई तो यह थी कि माँ ने उसे जन्म दिया, पाल-पोस कर बड़ा किया, लेकिन एक उम्र के बाद माँ ने भी अनजाने में हाथ खींच लिए थे—चाहे वह भाई के मोह में हो या सामाजिक दबाव में। लेकिन सास... वह स्त्री, जिसका नैना से खून का कोई रिश्ता नहीं था, उसने अपना पूरा साम्राज्य, अपनी सत्ता, अपनी तिजोरी और अब अपना आराम भी नैना के चरणों में रख दिया था।

"क्या सोच रही है?" सुमित्रा जी ने पूछा।

"यही कि मैं कितनी गलत थी," नैना ने सास के हाथ पकड़ लिए। "माँ, लोग कहते हैं सास कभी माँ नहीं बन सकती। वो सच कहते हैं। सास माँ नहीं बन सकती, क्योंकि सास माँ से भी बढ़कर होती है। माँ तो बेटी को पराया कर देती है, लेकिन सास पराई बेटी को अपनी मालकिन बना देती है।"

सुमित्रा जी की आँखों में नमी तैर गई। उन्होंने नैना के सिर पर हाथ फेरा। "चल पगली, अब जा के सो जा। कल से तुझे अपनी दुकान भी तो जमानी है। और हाँ, सुबह की चाय मैं बना दूंगी, तू आराम से उठना।"

सुमित्रा जी अपने छोटे कमरे की ओर चली गईं। नैना उन्हें जाते हुए देखती रही। वह थोड़ी झुक गई थीं, चाल धीमी थी, लेकिन नैना को उस पल वह दुनिया की सबसे ताकतवर स्त्री लग रही थीं।

नैना कमरे में आई और अपना फ़ोन उठाया। उसने अपनी और सुमित्रा जी की एक तस्वीर ढूंढी। यह पिछली दिवाली की तस्वीर थी, जिसमें सुमित्रा जी नैना को अपने हाथों से कंगन पहना रही थीं—वो कंगन जो उनकी सास ने उन्हें दिए थे और जो अब नैना के थे।

नैना ने व्हाट्सएप खोला। उसने अपनी माँ की फोटो हटाकर, सुमित्रा जी के साथ वाली वह फोटो अपनी डीपी (DP) पर लगाई। और स्टेटस में लिखा:

"जड़ें वो नहीं होतीं जहाँ हम पैदा होते हैं, जड़ें वो होती हैं जो हमें फलने-फूलने के लिए ज़मीन देती हैं। थैंक यू माँ जी, मुझे सिर्फ़ बहु नहीं, इस घर की बेटी और भविष्य बनाने के लिए।"

कुछ ही मिनटों में मैसेजेस आने लगे।

उसकी सहेलियों के मैसेज थे: "Wow, lovely pic!"

लेकिन सबसे खास मैसेज उसकी अपनी माँ, वंदना जी का आया।

"बड़ी सयानी हो गई है तू। खुश रह। तेरी सास सच में हीरा है, उसकी कद्र करना।"

नैना मुस्कुरा दी। उसे समझ आ गया था कि माँ का प्यार 'संरक्षण' (protection) था, जो उसे दुनिया की धूप से बचाता था। लेकिन सास का प्यार 'प्रोत्साहन' (empowerment) था, जो उसे धूप में तपकर सोना बनने का मौका देता था।

माँ ने उसे चलना सिखाया था, लेकिन सास ने उसे उड़ना सिखाया था।

अगले दिन सुबह जब नैना उठी, तो देखा कि सुमित्रा जी रसोई में हैं।

"अरे माँ जी, आप क्यों? मैं बना लेती," नैना ने कहा।

"चुप कर," सुमित्रा जी ने गैस बंद करते हुए कहा। "मैंने लिस्ट बना दी है। देख, घर में राशन पूरा है, बस तेरे ऑफिस के उद्घाटन के लिए मिठाई मंगवानी है। मैंने तेरे ससुर जी के पुराने दोस्तों को भी न्योता भिजवा दिया है। वो सब आएंगे आशीर्वाद देने। और सुन, आज तू वो लाल वाली साड़ी पहनना जो मैंने तुझे मुहं-दिखाई में दी थी, उस पर तू एकदम अफसर बिटिया लगती है।"

नैना ने देखा कि सुमित्रा जी के हाथ में एक कागज था—मिठाई और मेहमानों की लिस्ट। उसे याद आया मायके का वो सीन जहाँ माँ ने उसे लिस्ट नहीं, बल्कि हिदायतें दी थीं। यहाँ सास उसके काम को अपना उत्सव मान रही थीं।

नैना ने पीछे से जाकर सुमित्रा जी को गले लगा लिया।

"क्या हुआ?" सुमित्रा जी चौंक गईं।

"कुछ नहीं माँ जी," नैना ने उनकी पीठ पर सिर रख दिया। "बस सोच रही थी कि मैं कितनी किस्मत वाली हूँ। लोग भगवान को मंदिरों में ढूंढते हैं, और मुझे मेरे घर की रसोई में मिल गए।"

सुमित्रा जी हँस पड़ीं। "मस्का मत लगा। चाय ठंडी हो रही है।"

उस दिन घर में एक नई शुरुआत हुई। सिर्फ़ नैना के बिज़नेस की नहीं, बल्कि एक ऐसे रिश्ते की जो खून से नहीं, बल्कि त्याग और विश्वास से बना था।

यह कहानी उन हज़ारों घरों की है जहाँ सासू माँएं चुपचाप अपनी जगह छोड़ देती हैं ताकि नई बहुएं उस जगह को भर सकें। जो अपने पुराने बक्से, पुरानी आदतें और पुराना रूतबा त्याग देती हैं, सिर्फ़ इसलिए ताकि उनका बेटा और बहु अपना नया संसार बसा सकें। वे विलेन नहीं होतीं, वे वो नींव होती हैं जो खुद ज़मीन में दफ़न हो जाती हैं ताकि इमारत बुलंद खड़ी हो सके।

और नैना ने आज यह सीख लिया था। अब उसे कभी यह शिकायत नहीं होगी कि "सास माँ जैसी नहीं होती"। उसे गर्व होगा कि "सास, सास जैसी होती है"—त्याग की मूरत और भविष्य की निर्माता।

शाम को जब नैना अपने नए ऑफिस में बैठी, तो उसने महसूस किया कि यह कमरा सिर्फ़ ईंट-गारे का नहीं है, यह सुमित्रा जी के उस 'विश्वास' का मंदिर है जो उन्होंने नैना पर जताया था। उसने मन ही मन वादा किया कि जिस तरह सुमित्रा जी ने उसे अपना सब कुछ सौंपा है, वह भी अपने बुढ़ापे में उन्हें कभी अकेला नहीं होने देगी। क्योंकि यह घर अब उन दोनों का था—एक ढलते सूरज का और एक उगते सवेरे का, और दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।

दोस्तों “आपके हिसाब से माँ का प्यार बड़ा होता है

या सास का त्याग?

कमेंट में ईमानदारी से लिखिए।”

लेखिका : निशा दत्त 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...