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करियर बाद में बन जाता है… माँ-बाप दोबारा नहीं मिलते

 बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, मानो आसमान भी आज रघुवीर बाबू और सावित्री देवी के मन की उदासी को अपने आंसुओं के जरिए बयां कर रहा हो। देहरादून की उस पुरानी हवेलीनुमा कोठी के बरामदे में रघुवीर बाबू अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे थे, लेकिन आज उस कुर्सी में उन्हें वो सुकून नहीं मिल रहा था जो पिछले तीस सालों से मिलता आ रहा था। उनके हाथ में एक चाय का प्याला था जिससे उठती भाप अब ठंडी हो चुकी थी, बिल्कुल उनकी उम्मीदों की तरह।

"सुनिए, अब अंदर आ जाइए, ठंड बढ़ गई है," सावित्री देवी की आवाज में एक अजीब सी कंपन थी। वो भी जानती थीं कि ठंड मौसम की नहीं, बल्कि उस सन्नाटे की है जो कल सुबह उनके घर में पसरने वाला था।

रघुवीर बाबू ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और एक गहरी सांस लेकर बोले, "सावित्री, मुझे लगा था कि पचास साल का सफर पूरा होने पर हम जश्न मनाएंगे, लेकिन लगता है वक्त को हमारा खुश होना मंजूर नहीं।"

कल रघुवीर और सावित्री की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। 'गोल्डन जुबली'। ये वो दिन था जिसका सपना सावित्री ने न जाने कब से संजो रखा था। उन्होंने महीनों पहले ही तय कर लिया था कि घर को कैसे सजाना है, खाने में क्या बनेगा, और सबसे बड़ी बात, उनकी इकलौती बेटी अनन्या, दामाद समीर और छोटा नाती आरव आने वाले हैं। लेकिन आज सुबह आई उस एक फोन कॉल ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया था।

अनन्या का फोन आया था। वो बैंगलोर में एक बहुत बड़ी आर्किटेक्ट फर्म में वाइस प्रेसिडेंट थी। उसने रुंधे गले से बताया था, "पापा, मुझे माफ कर दीजिए। हमारी कंपनी का एक इंटरनेशन मर्जर हो रहा है और ऐन वक्त पर क्लाइंट ने मीटिंग की तारीख बदल दी है। मेरा वहां होना अनिवार्य है। अगर मैं नहीं गई तो कंपनी को करोड़ों का नुकसान होगा। मैं कोशिश कर रही हूँ, लेकिन शायद... शायद मैं कल नहीं आ पाऊंगी।"

रघुवीर बाबू तो खामोश हो गए थे, लेकिन सावित्री की आंखों से आंसू नहीं रुके। उन्होंने बेटी को तो दिलासा दे दिया कि "कोई बात नहीं बिटिया, काम पहले है," लेकिन फोन रखने के बाद वो जिस तरह से सोफे पर ढह सी गई थीं, वो रघुवीर से देखा नहीं गया था।

"सावित्री, तुम क्यों इतना दिल छोटा कर रही हो? बच्चे अपनी जिंदगी बनाने में लगे हैं। हमें गर्व होना चाहिए कि हमारी बेटी इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल रही है," रघुवीर ने अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखते हुए समझाने की कोशिश की, हालांकि अंदर ही अंदर वो खुद भी टूट चुके थे।

सावित्री ने अपनी नम आंखें ऊपर उठाईं और बोलीं, "गर्व तो है, पर क्या करूं इस ममता का? पचास साल का यह सफर हमने एक-दूसरे का हाथ थाम कर तय किया, लेकिन इस खास पड़ाव पर अगर हमारी खून पसीने की कमाई, हमारी औलाद ही हमारे पास न हो, तो यह सोना भी पीतल जैसा लगता है। मैंने सोचा था कि आरव के साथ मिलकर पुराने एल्बम देखूंगी, उसे बताऊंगी कि उसके नाना जवानी में कितने जिद्दी हुआ करते थे।" सावित्री की हल्की सी मुस्कान आंसुओं के बीच कहीं खो गई।

रात गहरा रही थी। घर के कोने-कोने में सजाए गए गेंदे के फूलों की महक अब चुभ रही थी। ड्राइंग रूम में लगा वह बड़ा सा बैनर जिस पर 'हैप्पी 50th एनिवर्सरी' लिखा था, अब किसी व्यंग्य की तरह लग रहा था। दोनों ने बेमन से खाना खाया। घर में इतना सन्नाटा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी।

बैंगलोर में, अनन्या अपने आलीशान ऑफिस के केबिन में बैठी थी। रात के दस बज रहे थे। उसके सामने लैपटॉप खुला था, स्क्रीन पर प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन थी, लेकिन उसका दिमाग कोसों दूर देहरादून में अपने बूढ़े माता-पिता के घर पर था। उसने अपनी मेज पर रखे फ्रेम को देखा। उसमें उसके बचपन की तस्वीर थी—वह अपने पापा के कंधों पर बैठी थी और माँ हंसते हुए उन्हें देख रही थीं।

समीर, उसका पति, कॉफी के दो मग लेकर अंदर आया। उसने अनन्या के चेहरे पर वो तनाव देखा जो पिछले दस घंटों से जमा था।

"अनु, तुम प्रेजेंटेशन को घूर रही हो, लेकिन देख नहीं रही हो। क्या चल रहा है?" समीर ने नरमी से पूछा।

अनन्या ने चेहरा हथेलियों में छिपा लिया। "समीर, मैं यह क्या कर रही हूँ? पचास साल... पचास साल मायने रखते हैं। पापा ने अपनी पूरी जिंदगी एक पुरानी साइकिल पर सरकारी स्कूल में पढ़ाते हुए गुजार दी ताकि मैं आज इस एयर-कंडीशंड केबिन में बैठ सकूं। माँ ने कभी अपने लिए एक नई साड़ी नहीं खरीदी जब तक मेरी स्कूल की फीस नहीं भर दी गई। और आज, जब उन्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है, मैं यहाँ मुनाफे और घाटे का गणित लगा रही हूँ?"

समीर ने उसके पास बैठकर कहा, "लेकिन अनु, यह तुम्हारे करियर का सबसे बड़ा ब्रेक है। तुमने इसके लिए दो साल मेहनत की है।"

"हां, करियर..." अनन्या उठी और कांच की दीवार से बाहर शहर की रोशनी को देखने लगी। "करियर तो मैं और दस साल बना लूंगी समीर। प्रोजेक्ट्स आएंगे और जाएंगे। लेकिन मेरे माता-पिता की पचासवीं सालगिरह दोबारा नहीं आएगी। मुझे याद है जब मैं छोटी थी, पापा को बुखार था, लेकिन मेरे स्कूल के एनुअल फंक्शन में वो दवाई खाकर आए थे, सिर्फ इसलिए कि मुझे स्टेज पर नाचते हुए देख सकें। उन्होंने तब 'ड्यूटी' का बहाना नहीं बनाया था। आज मैं कैसे बना सकती हूँ?"

अचानक अनन्या ने अपना फोन उठाया और तेजी से एक नंबर डायल किया।

समीर हैरान था, "तुम किसे फोन कर रही हो? बॉस को? इस समय?"

"हाँ," अनन्या की आवाज में अब एक दृढ़ता थी।

फोन उठा। उधर से मिस्टर खन्ना की नींद में डूबी आवाज आई। अनन्या ने बिना हिचकिचाए कहा, "सर, आई एम सॉरी टू डिस्टर्ब यू। लेकिन मैं कल की मीटिंग अटेंड नहीं कर पाऊंगी। आप मेरी जगह विकास को भेज दीजिए, मैंने उसे सब समझा दिया है।"

उधर से मिस्टर खन्ना शायद भड़क गए थे, उनकी तेज आवाज समीर तक आ रही थी। "अनन्या, आर यू क्रेजी? यह तुम्हारे करियर की सुसाइड है। अगर तुम कल नहीं दिखीं, तो भूल जाओ उस प्रमोशन को।"

अनन्या ने एक गहरी सांस ली, उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन होठों पर मुस्कान। "सर, प्रमोशन मुझे दूसरी कंपनी दे देगी, या मैं अपनी फर्म खोल लूंगी। लेकिन मेरे पेरेंट्स मुझे दूसरा नहीं मिल सकते। मेरे लिए मेरी 'सक्सेस' की परिभाषा आज बदल गई है। अगर मैं कल उनके पास नहीं हुई, तो मैं दुनिया की सबसे असफल बेटी कहलाऊंगी। गुड नाइट सर।"

उसने फोन काट दिया। केबिन में सन्नाटा छा गया। समीर उसे अविश्वास और गर्व भरी नजरों से देख रहा था।

"पैकिंग शुरू करें?" अनन्या ने आंसू पोंछते हुए पूछा।

"मैं अभी फ्लाइट चेक करता हूँ," समीर ने मुस्कुराते हुए अपना लैपटॉप खोला। "लेकिन देहरादून की सीधी फ्लाइट तो अब मिलेगी नहीं।"

"तो दिल्ली तक की लेते हैं, वहां से टैक्सी करेंगे। कैसे भी हो, सुबह की चाय हम पापा-मम्मी के साथ पिएंगे," अनन्या ने अपना बैग उठाया।

इधर देहरादून में सुबह हो चुकी थी। बारिश थम चुकी थी, लेकिन आसमान में बादल अब भी थे। रघुवीर बाबू अपनी आदत के मुताबिक सुबह पांच बजे उठ गए थे। उन्होंने घर के मुख्य द्वार पर लगे तोरण को ठीक किया, जो रात की हवा से टेढ़ा हो गया था। सावित्री अभी पूजा घर में थीं। आज उनकी आरती की आवाज में वो खनक नहीं थी।

तभी पड़ोस की मिसेज वर्मा और शर्मा जी आ गए।

"अरे रघुवीर भाई, बधाई हो! पचास साल का अर्धशतक मार लिया आपने," शर्मा जी ने हंसते हुए उन्हें गले लगाया।

"शुक्रिया, शुक्रिया," रघुवीर ने फीकी मुस्कान के साथ जवाब दिया।

मिसेज वर्मा ने इधर-उधर देखते हुए पूछा, "अरे, बिटिया नहीं दिख रही? अनन्या आने वाली थी न?"

सावित्री पूजा की थाली लेकर बाहर आईं, उनका चेहरा उतर गया। रघुवीर ने बात संभालते हुए कहा, "अरे वो... उसकी बहुत जरूरी मीटिंग आ गई। बड़ी अफसर है न भाई, जिम्मेदारियां भी बड़ी हैं। हम बूढ़ों के लिए अपना काम तो नहीं छोड़ सकती न।"

उनकी आवाज में छिपी टीस शर्मा जी भांप गए। माहौल थोड़ा भारी हो गया। "कोई बात नहीं, आजकल के बच्चों की यही मजबूरी है। चलो हम सब हैं न," उन्होंने ढांढस बंधाया।

तभी गेट पर एक सफेद रंग की एसयूवी आकर रुकी। गाड़ी की हालत देखकर लग रहा था कि उसने लंबा सफर तय किया है, कीचड़ से सनी हुई थी।

"कौन आया है सुबह-सुबह?" सावित्री ने चश्मा ठीक करते हुए देखा।

गाड़ी का दरवाजा खुला। पहले एक छोटा सा बच्चा, आरव, हाथ में एक बड़ा सा कार्ड लिए बाहर कूदा और चिल्लाया, "नाना-नानी! हैप्पी एनिवर्सरी!"

सावित्री के हाथ से आरती की थाली लगभग छूटते-छूटते बची। रघुवीर बाबू तो ऐसे खड़े हो गए जैसे उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही न हो रहा हो।

उसके पीछे-पीछे अनन्या और समीर गाड़ी से उतरे। दोनों की आंखों में रात भर के सफर की थकान थी, कपड़े थोड़े अस्त-व्यस्त थे, लेकिन चेहरों पर जो सुकून था, वो किसी भी मेकअप से ज्यादा चमक रहा था।

"अनन्या?" रघुवीर के मुंह से बस इतना ही निकला।

अनन्या दौड़कर आई और सीधे अपने पिता के गले लग गई। वो बचपन की तरह उनसे लिपट गई, जैसे वो कोई बड़ी कॉर्पोरेट ऑफिसर नहीं, बल्कि स्कूल से लौटी वही छोटी बच्ची हो।

"पापा, हैप्पी एनिवर्सरी," वह रो पड़ी।

सावित्री तो वहीं बरामदे की सीढ़ियों पर बैठ गईं, खुशी के मारे उनके पैर ही नहीं उठ रहे थे। समीर ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए। "माँ जी, आशीर्वाद नहीं देंगी?"

"अरे... अरे तुम लोग? तुम तो कह रही थी कि मीटिंग है? करोड़ों का नुकसान..." सावित्री ने समीर और अनन्या को एक साथ अपनी बाहों में भर लिया। उनका स्पर्श पाकर सावित्री को लगा जैसे उनके शरीर में नई जान आ गई हो।

पड़ोसी भी यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। शर्मा जी ने अपनी आंखें पोंछीं।

अनन्या ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, "माँ, दुनिया का कोई भी सौदा आपकी मुस्कान से महंगा नहीं हो सकता। मैंने बॉस से कह दिया, नुकसान होता है तो हो जाए, लेकिन मेरा असली मुनाफा तो यहाँ देहरादून में है।"

रघुवीर बाबू, जो हमेशा सख्त माने जाते थे, अपनी आंखों से बहते आंसुओं को रोक नहीं पाए। उन्होंने कांपते हाथों से अनन्या के सिर पर हाथ रखा और बोले, "पगली लड़की... नौकरी दांव पर लगा दी हमारे लिए?"

"नौकरी तो बहुत मिलेंगी पापा, पर पचासवीं सालगिरह तो आज ही है न," अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा।

आरव ने बीच में टोकते हुए कहा, "नाना जी, मैंने स्कूल मिस किया है केक खाने के लिए, अब जल्दी से केक काटिए!"

सबकी हंसी छूट गई। घर का वह सन्नाटा जो कल रात से किसी भूत की तरह डरा रहा था, अब खिलखिलाहट में बदल गया था।

"अरे सावित्री, खड़ी क्या हो? जल्दी से इनके लिए नाश्ता बनाओ, रात भर के भूखे होंगे। और सुन, वो गाजर का हलवा भी निकाल लेना," रघुवीर बाबू में अचानक गजब की फुर्ती आ गई थी। वो शर्मा जी से बोले, "अरे शर्मा, जा यार, उस नुक्कड़ वाले बैंड वालों को बुला ला, आज जश्न मनेगा, और ऐसा मनेगा कि पूरा मोहल्ला देखेगा।"

थोड़ी ही देर में घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जो घर कल शाम को उदासी की चादर ओढ़े था, अब वहां शहनाई की धुन बज रही थी। मोहल्ले के लोग इकट्ठा हो गए थे। अनन्या ने अपने हाथों से घर को और सजा दिया। समीर ने पुराना म्यूजिक सिस्टम चला दिया जिसमें किशोर कुमार के गाने बज रहे थे—'आने वाला पल जाने वाला है...'

दोपहर को केक काटने का वक्त आया। अनन्या ने एक बड़ा सा गोल्डन रंग का केक मंगवाया था। रघुवीर और सावित्री ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई, बिल्कुल पचास साल पहले की तरह।

केक काटते समय रघुवीर बाबू ने माइक लिया। उनका गला भर आया था। उन्होंने कहा, "जिंदगी में मैंने बहुत कुछ कमाया, इज्जत, शोहरत, दोस्त। लेकिन आज मुझे अहसास हुआ कि मेरी असली कमाई मेरे बैंक अकाउंट में नहीं, बल्कि यहाँ मेरे बगल में खड़ी है—मेरी पत्नी और मेरे सामने खड़े मेरे बच्चे। लोग कहते हैं कि बच्चे बड़े होकर उड़ जाते हैं, लेकिन अगर जड़ें मजबूत हों, तो वो लौटकर जरूर आते हैं।"

तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। अनन्या ने देखा कि उसके फोन पर बॉस का मैसेज आया था। उसने डरते-डरते फोन उठाया।

मैसेज में लिखा था: "अनन्या, तुम्हारे जज्बे ने मुझे मेरी माँ की याद दिला दी। मैंने क्लाइंट से बात की, वो मीटिंग पोस्टपोन करने को तैयार हो गए हैं। एन्जॉय योर फैमिली टाइम। हैप्पी एनिवर्सरी टू योर पेरेंट्स।"

अनन्या ने समीर को मोबाइल दिखाया। समीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "देखा? अच्छाई कभी हारती नहीं है।"

शाम को जब सब लोग आंगन में बैठे थे, रघुवीर बाबू अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर थे, लेकिन इस बार अकेले नहीं। उनकी गोद में आरव था, पास में सावित्री बैठी थीं, और सामने अनन्या और समीर चाय पी रहे थे।

बारिश फिर से शुरू हो गई थी, लेकिन इस बार वह बारिश उदासी की नहीं लग रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति भी उनके जश्न में शामिल होकर उन पर फूलों की वर्षा कर रही हो।

सावित्री ने रघुवीर की तरफ देखा और धीरे से कहा, "शुक्रिया।"

"किसलिए?" रघुवीर ने पूछा।

"इस सफर के लिए, और इस खूबसूरत अंत के लिए," सावित्री ने अनन्या की तरफ इशारा किया जो आरव के साथ खेल रही थी।

"यह अंत नहीं है सावित्री, यह तो अगले पचास सालों की शुरुआत है," रघुवीर ने हंसते हुए कहा और अपनी चाय की चुस्की ली। चाय अब भी गर्म थी, और रिश्ते भी।

उस रात देहरादून की उस कोठी में सिर्फ दीये नहीं जले, बल्कि उम्मीदों और रिश्तों की ऐसी मशाल जली जिसने यह साबित कर दिया कि दुनिया की किसी भी कॉरपोरेट मीटिंग, किसी भी डेडलाइन और किसी भी मुनाफे से बड़ा अगर कुछ है, तो वह है 'परिवार'। अनन्या ने उस दिन सिर्फ एक छुट्टी नहीं ली थी, उसने अपने बूढ़े माता-पिता की जिंदगी में कुछ साल और जोड़ दिए थे। और शायद, यही जीवन का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था जिसे उसने सफलतापूर्वक पूरा किया था।

“अगर आप अनन्या की जगह होते,

तो करियर चुनते या माता-पिता?

कमेंट में दिल से जवाब दीजिए।”

लेखिका : निधि गुप्ता


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