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अनामिका का सच

 पुरानी दिल्ली के एक संकरी गली वाले मकान की तीसरी मंजिल पर, खिड़की के पास बैठी वंदना बाहर हो रही बारिश को एकटक देख रही थी। उसके हाथ में अदरक वाली चाय का कप था, जिससे उठता हुआ धुआं उसकी सोच की तरह ही हवा में विलीन हो रहा था। कमरे के दूसरे कोने में, उसका पति, आलोक, अपनी मेज़ पर सिर झुकाए बैठा था। कमरे में सिर्फ आलोक के लैपटॉप के कीबोर्ड की खट-खट और बाहर गिरती बारिश की बूंदों का शोर था।

आलोक एक संघर्षशील लेखक था। पिछले दस सालों से वह "उस एक महान उपन्यास" को लिखने की कोशिश कर रहा था जो उसे साहित्य जगत में अमर कर दे। वह खुद को एक गंभीर चिंतक और बुद्धिजीवी मानता था। उसकी नज़र में वंदना सिर्फ़ एक साधारण गृहिणी थी—जिसकी दुनिया रसोई के मसालों, धोबी के हिसाब और शाम की चाय तक सीमित थी। वंदना ने कभी इस धारणा को तोड़ने की कोशिश भी नहीं की थी।

"वंदना!" आलोक की आवाज़ में झुंझलाहट थी। "ये चाय में चीनी फिर ज़्यादा कर दी तुमने। कितनी बार कहा है, जब मैं लिख रहा होता हूँ तो मुझे चीज़ें परफेक्ट चाहिए। मेरा ध्यान भटक जाता है।"

वंदना ने बिना किसी भाव के कप वापस ले लिया। "माफ़ करना, मैं दूसरी बना लाती हूँ।"

"रहने दो," आलोक ने हाथ झटकते हुए कहा। "अब मूड ख़राब हो गया। वैसे भी, तुम क्या समझोगी कि एक लेखक के लिए 'फोकस' क्या मायने रखता है। तुम्हारे लिए तो जीवन बस कुकर की सीटी गिनने जैसा है।"

वंदना चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई। यह ताना नया नहीं था। आलोक अक्सर अपनी नाकामी का गुस्सा वंदना की 'साधारणता' पर निकालता था। उसे लगता था कि उसका विवाह एक ऐसी स्त्री से हो गया है जो न तो कला समझती है, न साहित्य, और न ही जीवन की गहराई।

लेकिन आलोक को यह नहीं पता था कि रात के सन्नाटे में, जब वह अपनी 'महान रचना' के अधूरे पन्नों को छोड़कर सो जाता था, तब वंदना जागती थी। रसोई के एक कोने में, आटे के डिब्बे के पीछे छिपाई हुई एक पुरानी डायरी और एक सस्ती सी बॉलपेन वंदना के साथी बन जाते थे।

वंदना लिखती थी। वह भारी-भरकम शब्दों या जटिल रूपकों में नहीं लिखती थी, जैसा आलोक लिखने की कोशिश करता था। वह लिखती थी उन एहसासों को जो एक औरत के मन में घुमड़ते हैं, उन अनकही बातों को जो दीवारों के बीच दम तोड़ देती हैं। उसकी कहानियों में मसाले की महक थी, बारिश की नमी थी, और उन सपनों की टीस थी जो कभी पूरे नहीं हुए।

वह 'अनामिका' नाम से अपनी कहानियाँ एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका को भेजती थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि वे छपेंगी, लेकिन लिखना उसके लिए सांस लेने जैसा था।

एक दिन शाम को आलोक बहुत उत्तेजित होकर घर आया। उसके हाथ में एक पत्रिका थी।

"वंदना! देखो इसे," उसने सोफे पर बैठते हुए कहा। "आजकल के संपादकों का दिमाग ख़राब हो गया है। पता नहीं कैसे-कैसे लोगों को छाप देते हैं।"

वंदना पानी का गिलास लेकर आई। "क्या हुआ?"

"ये देखो," आलोक ने पत्रिका का एक पन्ना खोला। "कोई 'अनामिका' नाम की लेखिका है। पिछले छह महीनों से इसकी कहानियाँ धूम मचा रही हैं। आज साहित्य गोष्ठी में हर कोई इसी की चर्चा कर रहा था। आलोचक कह रहे हैं कि इसमें 'प्रेमचंद जैसी सादगी और मंटो जैसी सच्चाई' है।"

वंदना का दिल ज़ोर से धड़का। उसने चेहरे पर संयम बनाए रखा। "तो ये अच्छी बात है न?"

"अच्छी बात?" आलोक ने हिकारत से कहा। "अरे, मैंने पढ़ी इसकी कहानी। बिल्कुल साधारण! घर-गृहस्थी की बातें, छोटी-मोटी नोक-झोंक। इसमें न कोई दर्शन है, न कोई विद्रोही स्वर। बस भावनाओं का रोना-धोना है। और लोग इसे 'महान साहित्य' कह रहे हैं! मेरी समझ से बाहर है कि दुनिया को हो क्या गया है।"

वंदना ने मेज़ पर रखी पत्रिका उठाई। यह उसकी पिछले महीने भेजी गई कहानी थी—'बंसी हुई रोटियां'। यह कहानी उसने उस रात लिखी थी जब आलोक ने खाने में नमक कम होने पर थाली सरका दी थी और वह भूखी सो गई थी।

"शायद... शायद लोग इसमें अपना अक्स देखते होंगे," वंदना ने धीमे स्वर में कहा।

आलोक हंसा, एक व्यंग्यात्मक हंसी। "वंदना, तुम रहने दो। तुम और तुम्हारा अक्स! साहित्य सिर्फ़ आईना नहीं होता, वह समाज को दिशा देने वाली मशाल होता है। तुम राजमा भिगोने की चिंता करो, इन सब में दिमाग मत खपाओ।"

वंदना ने पत्रिका वापस रख दी और रसोई में चली गई। उसे दुख इस बात का नहीं था कि आलोक उसकी लेखन शैली को पसंद नहीं करता, दुख इस बात का था कि वह उसे इंसान ही नहीं समझता था, जिसके पास कोई विचार हो सकते हैं।

हफ़्ते बीतते गए। 'अनामिका' की शोहरत बढ़ती गई। अब बड़े-बड़े प्रकाशक उसकी किताब छापने के लिए कतार में थे। लेकिन कोई नहीं जानता था कि अनामिका कौन है। संपादक से वंदना ने सिर्फ़ ईमेल पर संपर्क रखा था और अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त रखी थी।

फिर एक दिन वह पत्र आया। शहर के सबसे बड़े 'साहित्य रत्न सम्मान' के लिए अनामिका को चुना गया था। आयोजकों ने बहुत आग्रह किया था कि वह पुरस्कार लेने स्वयं आएं। वंदना ने बहुत सोचा। क्या उसे जाना चाहिए? क्या उसे अपनी पहचान ज़ाहिर करनी चाहिए?

उस शाम आलोक बहुत उदास था। उसका उपन्यास तीसरी बार एक प्रकाशक ने अस्वीकार कर दिया था। वह बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था।

"आलोक," वंदना उसके पास गई। "अगले रविवार टाउन हॉल में साहित्य सम्मान समारोह है न?"

"हाँ," आलोक ने बिना मुड़े कहा। "मुझे भी न्योता आया है। दर्शक के तौर पर। उस 'अनामिका' को पुरस्कार मिल रहा है। विडंबना देखो, मैं दस साल से लिख रहा हूँ और मुझे दर्शक दीर्घा में बैठना पड़ेगा, और वो कल की आई लेखिका मंच पर होगी।"

"मैं भी चलूँ आपके साथ?" वंदना ने पूछा।

आलोक ने चौंककर उसे देखा। "तुम? तुम वहां क्या करोगी? बोर हो जाओगी। वहां साड़ियों की सेल नहीं लगी होगी, वहां बौद्धिक चर्चाएं होंगी।"

"मन है मेरा। कभी आपकी दुनिया भी तो देखूं," वंदना ने आग्रह किया।

"ठीक है, चलो। वैसे भी अकेले लौटना बोरिंग होता है," आलोक ने कंधे उचकाते हुए कहा।

रविवार की शाम, टाउन हॉल खचाखच भरा था। शहर के नामचीन लेखक, पत्रकार और आलोचक मौजूद थे। आलोक ने एक कोने की सीट पकड़ी और वंदना उसके बगल में सिमट कर बैठ गई। उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी, और कंधे पर वही पुराना थैला था।

कार्यक्रम शुरू हुआ। वक्ताओं ने अनामिका की कहानियों की तारीफों के पुल बांध दिए। आलोक हर तारीफ पर कुढ़ता रहा और वंदना के कान में फुसफुसाता रहा, "देखो, कैसे चढ़ा रहे हैं उसे। मार्केटिंग का ज़माना है बस।"

आखिरकार, वह पल आया। उद्घोषक ने माइक पर कहा, "और अब, हम उस शख्सियत को मंच पर बुलाना चाहेंगे जिन्होंने अपनी कलम से आम आदमी के दर्द को जुबान दी है। वर्ष की सर्वश्रेष्ठ लेखिका... अनामिका! कृपया मंच पर आएं।"

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सब इधर-उधर देखने लगे कि कौन उठेगा। आलोक भी गर्दन घुमा-घुमाकर देख रहा था।

एक पल बीता, फिर दूसरा।

तभी, आलोक के बगल में एक हरकत हुई। वंदना अपनी सीट से खड़ी हो गई।

आलोक ने उसका हाथ पकड़ा और नीचे खींचते हुए फुसफुसाया, "अरे, क्या कर रही हो? बैठो! वॉशरूम जाना है तो बाद में जाना, अभी वो लेखिका आ रही है। बीच में खड़े होकर तमाशा मत बनाओ।"

वंदना ने आलोक की तरफ देखा। उसकी आँखों में आज वह हमेशा वाली नरमी नहीं थी, बल्कि एक दृढ़ता थी जो आलोक ने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया।

"वॉशरूम नहीं जा रही हूँ, आलोक। अपना पुरस्कार लेने जा रही हूँ," वंदना ने शांत स्वर में कहा।

आलोक को लगा उसने गलत सुना है। "क्या? क्या बकवास कर रही हो? दिमाग फिर गया है क्या?"

लेकिन वंदना तब तक गलियारे में आ चुकी थी। वह सधे कदमों से मंच की ओर बढ़ रही थी। हॉल में सन्नाटा छा गया। लोग उस साधारण सी दिखने वाली महिला को देख रहे थे। उद्घोषक ने मुस्कुराते हुए कहा, "स्वागत कीजिये, श्रीमती वंदना 'अनामिका' का!"

आलोक के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। वह सुन्न होकर कुर्सी में धंस गया। वह वंदना... जो उसकी चाय में चीनी कम-ज़्यादा करने के लिए डांट खाती थी... वह अनामिका है? जिसके शब्दों का वह (भले ही ईर्ष्या से) लोहा मानता था?

मंच पर पहुँचकर वंदना ने माइक संभाला। उसकी आवाज़ में वही ठहराव था जो उसकी कहानियों में होता था।

"मैं कोई बड़ी लेखिका नहीं हूँ," वंदना ने बोलना शुरू किया। "मैं बस एक गृहिणी हूँ। मेरी कहानियाँ किसी कल्पना की उड़ान नहीं हैं। वे उस खामोशी का दस्तावेज़ हैं जो हमारे घरों के कोनों में पसरी रहती है। मैंने लिखा, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं नहीं लिखूँगी, तो मेरा अस्तित्व उस कुकर की सीटी और चाय की प्याली में ही सिमट कर रह जाएगा।"

उसने भीड़ में आलोक को ढूंढा। आलोक की नज़रें झुकी हुई थीं।

"मेरी कहानियों का सबसे बड़ा आलोचक मेरे घर में ही है," वंदना ने कहा, और हॉल में हंसी की लहर दौड़ गई, पर आलोक जानता था कि यह हंसी उसके लिए नहीं, उसकी सोच पर तमाचा थी। "उन्होंने मुझे सिखाया कि 'महान साहित्य' क्या होता है, शायद इसीलिए मैं 'सच्चा साहित्य' लिख पाई। क्योंकि महानता अक्सर उन छोटी चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर देती है, जो सच के करीब होती हैं।"

पुरस्कार लेते वक्त पूरा हॉल खड़ा होकर तालियां बजा रहा था। आलोक भी खड़ा हुआ, लेकिन तालियां बजाने के लिए उसके हाथ नहीं उठ रहे थे। उसे अपने भीतर का लेखक बहुत बौना और अपने बगल में रहने वाली पत्नी बहुत विराट नज़र आ रही थी। उसे अपनी हर उस बात पर शर्म आ रही थी जब उसने वंदना की बुद्धिमत्ता का मज़ाक उड़ाया था। उसने महसूस किया कि वह 'शब्द' ढूंढता रह गया, और वंदना ने 'अर्थ' पा लिया था।

कार्यक्रम के बाद, वंदना को पत्रकारों और प्रशंसकों ने घेर लिया। आलोक एक कोने में खड़ा, अजनबी की तरह उसे देखता रहा। आज वंदना उसे वंदना नहीं लग रही थी, वह एक ऐसी पहेली लग रही थी जिसे वह दस साल साथ रहकर भी सुलझा नहीं पाया था।

घर लौटते वक्त कार में सन्नाटा था। लेकिन यह वह सन्नाटा नहीं था जो अक्सर होता था, जब आलोक अपनी दुनिया में व्यस्त रहता था और वंदना अपनी में। यह एक भारी, अपराधबोध से भरा सन्नाटा था।

गाड़ी ड्राइव करते हुए आलोक ने कई बार कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द हलक में अटक गए। घर पहुँचकर, वंदना ने हमेशा की तरह साड़ी बदली और रसोई की तरफ जाने लगी।

"वंदना," आलोक की आवाज़ आई।

वंदना रुकी। उसने पलटकर देखा।

आलोक डाइनिंग टेबल के पास खड़ा था। उसकी आँखों में नमी थी। "क्या... क्या आज चाय मिल सकती है? और... चीनी तुम जितनी डालना चाहो, डाल देना। शायद मिठास की ज़रूरत मुझे ही ज़्यादा है।"

वंदना के होठों पर एक हल्की मुस्कान तैर गई। यह जीत की मुस्कान नहीं थी, यह स्वीकृति की मुस्कान थी।

"मैं बना लाती हूँ," उसने कहा। "और सुनिए, आज राजमा भिगो दूँ? या फिर आप कोई कहानी सुनाना चाहेंगे?"

आलोक ने सिर झुका लिया। "नहीं, आज मैं सुनूंगा। तुम सुनाओ। वो कहानी... जो तुमने उस दिन लिखी थी जब मैं तुम पर चिल्लाया था।"

वंदना ने गैस का चूल्हा जलाया। नीली लपटों के बीच उसे अपना चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था। आज उसे लगा कि वह सिर्फ़ 'आलोक की पत्नी' नहीं है। वह वंदना है, वह अनामिका है। उसने चाय के बर्तन में पानी डाला और उसके उबलने की आवाज़ को सुना।

बाहर बारिश रुक चुकी थी, और बादलों के पीछे से एक धुंधला चाँद झांक रहा था। घर वही था, लोग वही थे, लेकिन उनके बीच का समीकरण हमेशा के लिए बदल चुका था। अब उस घर में एक लेखक और एक गृहिणी नहीं, बल्कि दो इंसान रहते थे जो एक-दूसरे की कहानियों का सम्मान करना सीख रहे थे।

आलोक ने अपना लैपटॉप बंद कर दिया। उसने वंदना की वह पत्रिका उठाई और पहली बार, आलोचक की नज़र से नहीं, बल्कि एक पाठक की नज़र से, एक सीखने वाले की नज़र से 'अनामिका' को पढ़ना शुरू किया।

रसोई से अदरक कूटने की आवाज़ आ रही थी, लेकिन आज वह आवाज़ आलोक को शोर नहीं, संगीत लग रही थी।

लेखक : विनोद वर्मा 


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