सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

माँ तो आख़िर माँ होती है

 हॉस्टल के कमरे में अपना सूटकेस बंद करते हुए रिया के हाथ गुस्से से कांप रहे थे। यह उसकी सेमेस्टर की छुट्टियां थीं, वह समय जिसका उसे हमेशा बेसब्री से इंतज़ार रहता था, लेकिन इस बार घर जाने का ख्याल उसे किसी कड़वी दवाई सा लग रहा था।

वजह थी—मल्लिका।

रिया की माँ को गुज़रे हुए तीन साल हो चुके थे। कैंसर जैसी लंबी बीमारी ने घर की खुशियाँ और रिया का बचपन, दोनों छीन लिए थे। पापा पूरी तरह टूट चुके थे। रिया ने ही जैसे-तैसे उन्हें संभाला था। लेकिन छह महीने पहले, पापा ने अचानक मल्लिका से शादी करने का फैसला सुना दिया।

"रिया, बेटा, अकेलापन काटता है," पापा ने कहा था। "मल्लिका एक अच्छी औरत है।"

रिया ने केवल एक फोटो देखी थी। एक हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट महिला, छोटे बाल, डिज़ाइनर कपड़े, हाथ में वाइन का गिलास। रिया के मन में अपनी माँ की छवि थी—सूती साड़ी में लिपटी, माथे पर छोटी सी बिंदी, रसोई में इलायची वाली चाय बनाती हुई एक सरल गृहिणी। मल्लिका उस छवि के ठीक विपरीत थी। रिया को लगा जैसे पापा ने माँ की जगह किसी 'शोपीस' को घर में सजा लिया है।

ट्रेन का सफ़र रिया ने इन्हीं उधेड़बुन में काटा। जब वह स्टेशन पर उतरी, तो ड्राइवर उसे लेने आया था। घर पहुँचते ही उसे बदलाव का अहसास हुआ। गेट का रंग बदल गया था। बगीचे में जहाँ माँ ने तुलसी और गेंदे के पौधे लगाए थे, वहाँ अब अजीब से दिखने वाले विदेशी कैक्टस और बोन्साई सजे थे।

रिया अंदर दाखिल हुई। ड्राइंग रूम का हुलिया ही बदल गया था। पुराने सोफे की जगह इटैलियन लेदर के काउच थे। दीवारों पर मॉडर्न आर्ट टंगी थी।

"ओह, हाय रिया! यू मस्ट बी टायर्ड," सीढ़ियों से उतरते हुए एक खनकती हुई आवाज़ आई।

रिया ने ऊपर देखा। मल्लिका थी। सिल्क का गाउन पहने, हाथ में एक टैबलेट, कानों में ब्लूटूथ। वह उतनी ही 'आर्टिफिशियल' लग रही थी जितनी रिया ने कल्पना की थी।

"नमस्ते," रिया ने बेमन से कहा।

"तुम्हारे डैड अभी मीटिंग में हैं, शाम तक आएंगे। तुम्हारा रूम रेडी है, बट आई एम सॉरी, मैंने उसका इंटीरियर थोड़ा चेंज करवा दिया है। वो पिंक कलर बहुत डल लग रहा था," मल्लिका ने ऐसे कहा जैसे उसने कोई एहसान किया हो।

रिया का खून खौल उठा। उसका कमरा, उसकी यादें, सब कुछ इस औरत ने अपनी मर्जी से बदल दिया? वह बिना कुछ बोले, पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई। अंदर जाकर देखा तो दीवारों पर ग्रे और व्हाइट का कॉम्बिनेशन था। सब कुछ बेहद सलीके से रखा हुआ था, लेकिन उसमें 'घर' वाली बात नहीं थी। यह किसी होटल का कमरा लग रहा था।

रात के खाने पर पापा बहुत खुश नज़र आ रहे थे। वे मल्लिका की तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

"रिया, तुम्हें पता है, मल्लिका ने मेरी डाइट पूरी तरह बदल दी है। अब मैं बहुत फिट महसूस करता हूँ," पापा ने सलाद खाते हुए कहा।

रिया ने चुपचाप अपनी रोटी तोड़ी। खाने में कॉन्टिनेंटल डिशेज थीं। उसे माँ के हाथ की अरहर की दाल और जीरा राइस याद आ रहे थे।

"रिया, तुम इतना कार्ब्स खाती हो?" मल्लिका ने अपनी नाज़ुक उंगलियों से गिलास उठाते हुए टोका, "तुम्हें थोड़ा कॉन्शियस होना चाहिए। इस उम्र में स्किन और फिगर का ध्यान नहीं रखोगी तो आगे मुश्किल होगी।"

रिया ने निवाला प्लेट में ही छोड़ दिया। "मुझे भूख नहीं है," कहकर वह उठ गई।

अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। मल्लिका का दिन सुबह जिम से शुरू होता, फिर घंटों कॉन्फ्रेंस कॉल्स, शाम को किटी पार्टी या क्लब जाना। घर में नौकरों की फौज थी जो उसके एक इशारे पर नाचती थी। रिया को लगता कि वह अपने ही घर में अजनबी है। उसे मल्लिका का हर अंदाज़ बनावटी लगता। उसे लगता कि मल्लिका पापा के पैसों और स्टेटस के लिए आई है, उसे परिवार से कोई लेना-देना नहीं है।

हफ्ता भर ही बीता था कि पापा को एक अर्जेंट बिज़नेस ट्रिप पर सिंगापुर जाना पड़ा।

"रिया, मैं तीन दिन में लौट आऊंगा। मल्लिका है न, कोई दिक्कत नहीं होगी," पापा ने जाते हुए माथे को चूम कर कहा।

पापा के जाते ही रिया ने खुद को कमरे में कैद कर लिया। वह मल्लिका का चेहरा भी नहीं देखना चाहती थी। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था।

अगली शाम, रिया को हल्की ठंड महसूस हुई। उसने सोचा मौसम बदल रहा है, इसलिए होगा। उसने एक पेरासिटामोल ली और सो गई। लेकिन आधी रात को उसकी आँख खुली तो उसका शरीर तप रहा था। सिर में हथौड़े बज रहे थे। गला इतना सूख गया था कि थूक निगलना भी मुश्किल था।

उसने उठने की कोशिश की, लेकिन कमजोरी इतनी थी कि पैर ज़मीन पर रखते ही वह लड़खड़ा गई। पानी का जग खाली था। वह जैसे-तैसे कमरे के दरवाज़े तक पहुँची और बाहर की तरफ पुकारा, "रामू काका..."

लेकिन आवाज़ गले से बाहर ही नहीं निकली। अँधेरे में चक्कर आया और वह धड़ाम से कॉरिडोर में गिर पड़ी।

जब उसकी आँखें खुलीं, तो वह अपने बिस्तर पर थी। माथे पर कुछ गीला महसूस हो रहा था। उसने धुंधली नज़रों से देखा। मल्लिका उसके सिरहाने बैठी थी। उसके वो परफेक्टरली सेट किए हुए बाल बिखरे हुए थे, और उसने अपना महंगा सिल्क गाउन उतारकर एक साधारण सी टी-शर्ट और पजामा पहन रखा था।

"थैंक गॉड, तुम्हें होश आ गया," मल्लिका की आवाज़ में वह खनक नहीं थी, बल्कि एक घबराहट और चिंता थी।

"पानी..." रिया ने बुदबुदाया।

मल्लिका ने तुरंत चम्मच से उसके होठों पर पानी लगाया। "आराम से पियो। 104 डिग्री बुखार था तुम्हें। डॉक्टर आए थे, वायरल इन्फेक्शन है। इंजेक्शन दे दिया है।"

रिया को कुछ समझ नहीं आ रहा था। मल्लिका? यह औरत तो खुद को छूने भी नहीं देती थी, और अब पूरी रात जागकर पट्टियाँ बदल रही थी?

रिया को फिर से उबकाई महसूस हुई। "वाशरूम..." उसने कहा।

मल्लिका ने तुरंत उसे सहारा देकर उठाया। रिया का पूरा भार मल्लिका के कंधों पर था। वाशरूम तक पहुँचते-पहुँचते रिया रोक नहीं पाई और उसने वहीं फर्श पर उल्टी कर दी। उसके कपड़ों पर, मल्लिका के कपड़ों पर—सब जगह गंदगी फैल गई।

रिया शर्म से गड़ गई। उसे लगा अब मल्लिका चिल्लाएगी, नाक-भौं सिकोड़ेगी और नौकरों को बुलाएगी।

लेकिन मल्लिका ने उसे कसकर पकड़ रखा था। "इट्स ओके, रिया। कोई बात नहीं। शरीर से जहर निकलना ज़रूरी है," मल्लिका ने बहुत शांत स्वर में कहा।

मल्लिका ने उसे बेसिन तक पहुँचाया, उसका मुँह धुलाया। फिर उसे वापस बिस्तर पर लिटाया। रिया ने देखा कि मल्लिका ने खुद कोई नौकर नहीं बुलाया। वह खुद बाल्टी और पोंछा लेकर आई और सारी गंदगी साफ की। वह हाई-सोसाइटी लेडी, जो धूल के एक कण पर नौकरों की क्लास लगा देती थी, आज घुटनों के बल बैठकर फर्श साफ कर रही थी।

रिया की आँखों से आंसू बह निकले। बुखार की वजह से नहीं, बल्कि एक अजीब से अपराधबोध की वजह से।

"मल्लिका आंटी..." रिया की आवाज़ कांपी।

"शशश... अभी बात मत करो। कपड़े बदलो, वरना ठंड लग जाएगी," मल्लिका ने एक माँ की तरह उसे स्पंज किया और सूखे कपड़े पहनाए।

अगले दो दिन रिया बिस्तर से नहीं उठी। मल्लिका ने अपना ऑफिस, अपनी मीटिंग्स, अपनी पार्टियां—सब कैंसिल कर दीं। वह हर घंटे रिया का तापमान चेक करती, उसे दवा देती।

तीसरे दिन दोपहर को रिया की तबीयत में कुछ सुधार हुआ। वह तकिए के सहारे बैठ गई। मल्लिका हाथ में एक कटोरा लेकर आई।

"खिचड़ी," मल्लिका ने मुस्कुराते हुए कहा। "मुझे पता है तुम्हें मेरी कुकिंग पर भरोसा नहीं होगा, इसलिए मैंने यूट्यूब देखकर बनाई है। मूंग की दाल वाली, बिल्कुल वैसी जैसी बीमारों को दी जाती है।"

रिया ने एक चम्मच खाया। स्वाद बिल्कुल वैसा ही था जैसा माँ बनाती थीं। सादा, हल्का, और सुकून देने वाला।

"आपने... आपने ये सब क्यों किया?" रिया ने धीरे से पूछा। "आप तो मुझे पसंद भी नहीं करतीं। मैं रूड थी, मैंने आपसे ठीक से बात भी नहीं की।"

मल्लिका कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गई। उसने एक गहरी सांस ली। "रिया, तुम्हें लगता है कि मैं कोई वैम्प हूँ जो तुम्हारे पापा की ज़िंदगी में जबरदस्ती घुस आई हूँ, है न?"

रिया चुप रही।

मल्लिका ने खिड़की की ओर देखा। "मैं 42 साल की हूँ, रिया। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी करियर बनाने में लगा दी। मैंने शादी नहीं की, बच्चे नहीं किए। मुझे लगा मेरा काम ही मेरा परिवार है। लेकिन जब मैं रात को अपने पेंटहाउस में लौटती थी, तो वो सन्नाटा मुझे खाने को दौड़ता था। तुम्हारे पापा से जब मैं मिली, तो पहली बार मुझे लगा कि कोई है जो मुझे सिर्फ एक सफल बिज़नेसवुमन के तौर पर नहीं, बल्कि एक इंसान के तौर पर देखता है।"

मल्लिका ने रिया की ओर देखा, उसकी आँखों में नमी थी। "मैं जानती हूँ कि तुम अपनी माँ को बहुत मिस करती हो। मैं उनकी जगह कभी नहीं ले सकती। मैं वो कोशिश कर भी नहीं रही हूँ। मैं जानती हूँ कि मैं साड़ियाँ नहीं पहनती, मुझे अचार डालना नहीं आता, मैं पूजा-पाठ में उतनी निपुण नहीं हूँ... लेकिन रिया, दिल तो मेरे पास भी है न?"

रिया ने खिचड़ी का कटोरा साइड टेबल पर रखा।

मल्लिका ने आगे कहा, "उस रात जब तुम गलियारे में गिरी थी, मेरा दिल हलक में आ गया था। मुझे पहली बार वो डर महसूस हुआ जो शायद एक माँ को होता है। जब मैंने तुम्हारे माथे पर पट्टी रखी, तो मुझे लगा कि मेरे जीवन का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट ये नहीं है कि मेरी कंपनी का टर्नओवर क्या है, बल्कि ये है कि तुम्हारा बुखार कब उतरेगा।"

रिया को याद आया कि वह मल्लिका के मेकअप और कपड़ों को देखकर उसे 'प्लास्टिक' समझती थी। उसने यह कभी नहीं सोचा कि उस मेकअप के पीछे एक ऐसा चेहरा भी हो सकता है जो रात भर जागकर उसकी तीमारदारी करने से थकता नहीं है। उसने मल्लिका की बाहरी दुनिया देखी थी, लेकिन उसके अकेलेपन और प्यार पाने की चाह को अनदेखा कर दिया था।

"मुझे माफ़ कर दीजिए," रिया की आँखों से आंसू बह निकले। "मैंने आपको बहुत गलत समझा। मैंने आपको मौका ही नहीं दिया।"

मल्लिका ने आगे बढ़कर रिया के आंसू पोंछे। उसके हाथ कोमल थे, ठीक वैसे ही जैसे माँ के हुआ करते थे। "माफ़ी की कोई ज़रुरत नहीं है। सौतेली माँ और बेटी की कहानियाँ वैसे भी समाज ने बहुत डरावनी बना रखी हैं। इसमें तुम्हारी गलती नहीं है।"

"क्या आप सच में यूट्यूब देखकर खिचड़ी बनाना सीख रही थीं?" रिया ने माहौल को हल्का करने के लिए पूछा।

मल्लिका हँस पड़ी। "हाँ, और विश्वास करो, मेरी कंपनी की बैलेंस शीट संभालने से ज़्यादा मुश्किल था ये अंदाज़ा लगाना कि नमक कितना डालना है। मैंने तीन बार चखा तब जाकर तुम्हारे पास लाई।"

कमरे में एक हंसी गूंज उठी। वह तनाव, वह दीवार जो रिया ने अपने और मल्लिका के बीच खड़ी कर रखी थी, वह उस बीमारी की आँच में पिघल चुकी थी।

शाम को जब पापा वापस आए, तो वह सीधे रिया के कमरे में भागे। "रिया! कैसी हो तुम? मैंने अभी फोन देखा मल्लिका का मैसेज था।"

रिया बिस्तर पर बैठी सूप पी रही थी और मल्लिका पास बैठी उसे कोई किस्सा सुना रही थी।

"मैं ठीक हूँ पापा," रिया ने मुस्कुराते हुए कहा। "मल्लिका माँ ने मेरा बहुत ख्याल रखा।"

'माँ' शब्द सुनते ही मल्लिका का हाथ, जो रिया के बालों को सहला रहा था, एक पल के लिए रुक गया। उसने रिया की ओर देखा, उसकी आँखों में एक चमक थी—हीरे जवाहरात की नहीं, बल्कि उस सुकून की जो एक रिश्ते के स्वीकारे जाने पर मिलता है। पापा भी दरवाज़े पर ठिठक गए, उनकी आँखों में कृतज्ञता थी।

मल्लिका उठी और पापा के पास गई। "आप फ्रेश हो जाइये, मैं आपके लिए भी सूप लाती हूँ।"

जब वह कमरे से बाहर जा रही थी, तो रिया ने देखा। मल्लिका ने अभी भी वही पजामा और टी-शर्ट पहन रखी थी, बाल बेतरतीब थे, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था। लेकिन रिया को आज वह दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला लग रही थी।

उसने सीख लिया था कि ममता का कोई एक रूप नहीं होता। वह कभी पुरानी सूती साड़ी में आती है, तो कभी मॉडर्न कपड़ों में। कभी वह लोरी गाकर सुलाती है, तो कभी यूट्यूब देखकर खिचड़ी बनाती है। फर्क सिर्फ देखने वाली नज़रों का होता है।

रिया ने अपने कमरे की दीवारों को देखा। ग्रे और व्हाइट रंग अब उसे 'होटल' जैसा नहीं, बल्कि शांत और आधुनिक लग रहा था। आखिर रंग दीवारों से नहीं, उनमें रहने वाले लोगों के प्यार से खिलते हैं। और आज, उसका घर सचमुच 'घर' बन गया था।

लेखिका : अंजना कपूर


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...