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दया की पात्र

 दो दिन बाद, सुमित उन्हें ऋषिकेश के उस आश्रम में छोड़ आया। जाते वक्त उसने कहा, "माँ, पैसे जमा कर दिए हैं। हम लोग आते रहेंगे।" कौशल्या ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन पुकारा नहीं। उन्होंने तय कर लिया था कि अब वे इन रिश्तों के लिए नहीं रोएंगी

बनारस के घाटों से थोड़ी दूर, पुराने शहर की एक संकरी मगर मशहूर गली में कौशल्या देवी का पुश्तैनी मकान था। उस मकान की पहचान सिर्फ उसकी पुरानी ईंटें नहीं थीं, बल्कि वह भीनी-भीनी खुशबू थी जो वहां से चौबीसों घंटे आती रहती थी। कौशल्या देवी शहर की सबसे मशहूर 'अन्नपूर्णा आचार और मसाले' की मालकिन थीं। पति के गुजरने के बाद उन्होंने अपने हुनर को ही अपना साथी बना लिया था। उनके हाथ का बना आम का अचार और गरम मसाला जिसने एक बार चख लिया, वह उम्र भर उसका स्वाद नहीं भूलता था।

कौशल्या के दो बेटे थे, रमन और सुमित। दोनों ने अच्छी तालीम हासिल की थी और अब वे मां के इस छोटे से गृह-उद्योग को एक बड़ी 'कंपनी' में बदलना चाहते थे। कौशल्या को खुशी थी कि उनके बच्चे तरक्की करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें डर था कि मशीनों की आवाज़ में कहीं हाथों का वह जादू न खो जाए, जो वे हर मर्तबान में भरती थीं।

रमन की शादी एक हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट महिला, शालिनी से हुई थी, और सुमित की पत्नी, वंदना भी आधुनिक विचारों वाली थी। घर में धीरे-धीरे आचार की खुशबू की जगह एयर फ्रेशनर ने ले ली थी। कौशल्या अब सिर्फ एक मूर्ति की तरह घर के कोने में बैठी रहतीं। काम का सारा जिम्मा बेटों ने ले लिया था। वे कहते, "माँ, अब आप आराम करो। यह ब्रांडिंग और मार्केटिंग का ज़माना है, आप नहीं समझेंगी।"

धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। कौशल्या को लगने लगा कि जिस घर की नींव उन्होंने अपनी मेहनत से सींची थी, वहां अब वे एक अनचाहे मेहमान की तरह हो गई हैं। एक दिन रमन ने डाइनिंग टेबल पर बात छेड़ी, "माँ, हमें इस पुराने मकान को बेचकर एक बड़े फ्लैट में शिफ्ट होना चाहिए। शहर के पॉश इलाके में एक पेंटहाउस देख रखा है। वहां आपकी सेहत भी ठीक रहेगी, यहाँ की धूल-मिट्टी आपको बीमार कर रही है।"

कौशल्या ने डरते हुए कहा, "बेटा, यह तुम्हारे पिता की निशानी है। यहाँ मेरा कारखाना चलता है, मेरी कारीगर औरतें आती हैं।"

सुमित ने बीच में टोकते हुए कहा, "माँ, वो कारखाना अब हम इंडस्ट्रियल एरिया में शिफ्ट कर रहे हैं। अब हाथ से मसाला कूटने का ज़माना गया। हमने ऑटोमेटिक मशीनें ऑर्डर कर दी हैं। और रही बात मकान की, तो वंदना और शालिनी को यहाँ पुराने ढर्रे में रहने में घुटन होती है।"

कौशल्या चुप हो गईं। उन्हें लगा कि शायद बच्चे सही कह रहे हैं। बुढ़ापे में जिद करना ठीक नहीं। कुछ हफ्तों बाद, बेटों ने कुछ कागज़ात उनके सामने रखे। "माँ, इस पर दस्तखत कर दीजिये। यह नए घर की रजिस्ट्री और कंपनी के नए स्ट्रक्चर के पेपर्स हैं। अब आप 'डायरेक्टर' रहेंगी, बस साइन करने हैं," रमन ने बड़े प्यार से पेन थमाया।

कौशल्या ने जिस विश्वास के साथ उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया था, उसी विश्वास के साथ बिना चश्मा लगाए उन कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए। उन्हें क्या पता था कि वे अपनी ही मिल्कियत से बेदखल होने के वारंट पर साइन कर रही हैं।

मकान बिका, और सब नए आलीशान अपार्टमेंट में आ गए। वहां सब कुछ कांच और मार्बल का था, बस कौशल्या के लिए कोई कोना अपना सा नहीं था। उन्हें एक छोटा सा कमरा दिया गया, जो 'गेस्ट रूम' जैसा लगता था। उनकी पुरानी मसालेदानियाँ, तांबे के बर्तन, सब 'कबाड़' बताकर फेंक दिए गए थे।

कुछ महीने बीते। घर में रमन और सुमित की किटी पार्टी और दोस्तों का आना-जाना लगा रहता। कौशल्या जब भी बाहर ड्राइंग रूम में आकर बैठतीं, बहुओं को खटकने लगता। शालिनी अक्सर अपनी सहेलियों से कहती, "अरे, सासू माँ की याददाश्त अब ठीक नहीं रहती, और वे पुराने ज़माने की बातें करती रहती हैं, थोड़ा अजीब लगता है।"

एक शाम, सुमित और रमन माँ के कमरे में आए। उनके चेहरे पर एक बनावटी गंभीरता थी। रमन ने गला साफ करते हुए कहा, "माँ, हम सोच रहे थे कि आप यहाँ दिन भर बोर होती रहती हैं। हमारे पास आपको समय देने के लिए वक्त नहीं बचता। मेरी एक पहचान वाले का ऋषिकेश में बहुत बड़ा 'वेलनेस सेंटर' है। वह बिल्कुल आश्रम जैसा है, वहां भजन-कीर्तन होता है, आपकी उम्र के बहुत से लोग हैं। हवा भी शुद्ध है।"

कौशल्या का दिल धक से रह गया। वह समझ गईं कि 'वेलनेस सेंटर' एक सभ्य नाम है वृद्धाश्रम का। उन्होंने अपनी नम आँखों से बेटों को देखा। "क्या मैं तुम लोगों पर इतना बोझ बन गई हूँ?"

वंदना दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली, "माजी, बात बोझ की नहीं है। हमारी लाइफस्टाइल अलग है। रात-रात भर पार्टियां होती हैं, आपको डिस्टर्बेंस होता है। और फिर, अगले महीने हमारा यूरोप टूर है, तब आपको कौन देखेगा?"

कौशल्या ने एक गहरी सांस ली। जिस स्वाभिमान से उन्होंने पूरी दुनिया को अपने मसालों का मुरीद बनाया था, वही स्वाभिमान आज जाग उठा। उन्होंने कहा, "ठीक है। अगर तुम लोगों की खुशी इसी में है, तो मैं चली जाऊंगी।"

दो दिन बाद, सुमित उन्हें ऋषिकेश के उस आश्रम में छोड़ आया। जाते वक्त उसने कहा, "माँ, पैसे जमा कर दिए हैं। हम लोग आते रहेंगे।" कौशल्या ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन पुकारा नहीं। उन्होंने तय कर लिया था कि अब वे इन रिश्तों के लिए नहीं रोएंगी।

आश्रम शांत था, लेकिन वहां की शांति में एक उदासी थी। वहां रहने वाले सभी लोग अपने-अपने घरों से ठुकराए हुए थे। लेकिन कौशल्या उन औरतों में से नहीं थीं जो बैठकर मातम मनाएं। दो-चार दिन तो वे गुमसुम रहीं, लेकिन फिर उनके हाथ फड़फड़ाने लगे। उनसे खाली नहीं बैठा गया।

आश्रम की रसोई में खाना बेस्वाद बनता था। एक दिन कौशल्या रसोइये के पास गईं और बोलीं, "भैया, अगर बुरा न मानो तो आज दाल मैं छौंक दूं?" रसोइये ने बेमन से हां कर दी। उस दिन आश्रम की दाल में वह खुशबू थी कि हर कोई उंगलियां चाटता रह गया। धीरे-धीरे कौशल्या ने रसोई की कमान संभाल ली।

एक रविवार, आश्रम में कुछ समाज-सेवी संस्था के लोग आए। उनमें एक युवा लड़की थी, अवनी। अवनी एक एनजीओ चलाती थी जो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम करता था। खाने के वक्त जब उसने कौशल्या के हाथ की बनी 'कढ़ी' चखी, तो वह रुक गई। उसने मैनेजर से पूछा, "यह किसने बनाया है?"

मैनेजर ने कौशल्या की तरफ इशारा किया। अवनी कौशल्या के पास गई और बोली, "दादी, इस कढ़ी में तो जादू है। ऐसा स्वाद तो मैंने बड़े-बड़े होटलों में नहीं पाया। आप पहले क्या करती थीं?"

बातों-बातों में कौशल्या ने बताया कि वह 'अन्नपूर्णा मसाले' की असली मालकिन थीं। अवनी हैरान रह गई। वह बचपन से उस ब्रांड के मसाले खाती आ रही थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से उनका स्वाद बिगड़ गया था। अवनी ने कहा, "दादी, आप यहाँ क्यों अपना हुनर जाया कर रही हैं? मेरे साथ चलिए। मैं एक छोटा सा कैफे शुरू करना चाहती हूँ जहाँ घर जैसा खाना मिले। मुझे आपकी ज़रूरत है। मैं आपको वेतन नहीं, हिस्सेदारी दूंगी।"

कौशल्या हंसीं, "बेटा, अब इस उम्र में क्या काम करूंगी?"

अवनी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, "हुनर की कोई उम्र नहीं होती दादी। और वैसे भी, दूसरों के रहम-ओ-करम पर जीने से अच्छा है कि हम अपनी शर्तों पर जिएं।"

यह बात कौशल्या के दिल में उतर गई। उन्होंने आश्रम छोड़ने का फैसला किया। मैनेजर ने उन्हें रोकने की कोशिश की, बेटों को फोन करने की बात कही, लेकिन कौशल्या ने मना कर दिया। "मेरा फैसला मेरा है," उन्होंने कहा।

अवनी ने शहर के एक पुराने बंगले को किराए पर लेकर उसे 'दादी की रसोई' का नाम दिया। कौशल्या ने वहां अपनी पुरानी रेसिपीज़ को फिर से ज़िंदा किया। न कोई मशीन, न कोई मिलावट। सब कुछ हाथ से बना हुआ। शुरुआत में कम लोग आए, लेकिन जुबान का स्वाद जंगल की आग की तरह फैलता है। देखते ही देखते 'दादी की रसोई' शहर का सबसे चहेता ठिकाना बन गया। लोग वहां सिर्फ खाना खाने नहीं, बल्कि कौशल्या के हाथ का प्यार पाने आते थे। सोशल मीडिया पर उनकी वीडियो वायरल होने लगीं।

उधर, रमन और सुमित की कंपनी घाटे में जा रही थी। मशीनों से बने मसालों में वह बात नहीं थी। पुराने ग्राहक टूटते जा रहे थे। बाज़ार में एक नई हवा थी—'दादी की रसोई' के मसालों की। जब रमन ने यह नाम सुना, तो उसे लगा कि यह कोई संयोग होगा। लेकिन जब उसने इंटरनेट पर अपनी माँ की तस्वीर देखी, जिसमें वे एक एप्रन पहने, मुस्कुराते हुए अवनी के साथ खड़ी थीं और उनके हाथ में 'बेस्ट स्टार्ट-अप ऑफ द ईयर' का अवॉर्ड था, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

शालिनी और वंदना भी सन्न रह गईं। जिस सास को वे 'अनपढ़' और 'पुराने ख्यालात' की समझती थीं, आज वह शहर की सेलिब्रिटी बन चुकी थीं। समाज में उनकी थू-थू होने लगी थी। हर कोई जान गया था कि बेटों ने माँ को निकाल दिया था और माँ ने अपनी सल्तनत खुद खड़ी कर ली।

अपनी गिरती हुई साख और डूबते हुए बिज़नेस को बचाने के लिए दोनों भाई और उनकी पत्नियां 'दादी की रसोई' पहुंचे। वहां लंबी कतार लगी थी। कौशल्या काउंटर पर बैठी थीं, चेहरे पर एक अलग ही तेज था—आत्मविश्वास का तेज।

रमन और सुमित भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और सीधे माँ के पैरों में गिर पड़े। "माँ, हमें माफ कर दो। हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। घर चलिए माँ, वह घर आपके बिना सूना है," रमन रोने का नाटक करते हुए बोला।

कौशल्या ने उन्हें उठाया। उनकी आँखों में अब वह बेचारगी नहीं थी जो उस दिन थी जब वे आश्रम जा रही थीं। उन्होंने शांत स्वर में कहा, "घर? कौन सा घर? वह घर तो तुम लोगों ने बेच दिया था। और जिस आलीशान फ्लैट की तुम बात कर रहे हो, वहां तो सिर्फ कांच की दीवारें हैं, वहां सांस लेने की जगह नहीं है।"

वंदना ने कहा, "माजी, चलिए न। हम पुरानी बातें भूलकर नई शुरुआत करेंगे। कंपनी को आपकी ज़रूरत है।"

यह सुनते ही कौशल्या मुस्कुराईं, एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द कम और समझदारी ज़्यादा थी। "कंपनी को मेरी ज़रूरत है, या मेरे नाम की? देखो, मुझे तुम लोगों से कोई शिकायत नहीं है। तुमने मुझे घर से निकालकर मुझ पर एहसान ही किया। अगर मैं वहां रहती तो घुट-घुट कर मर जाती। यहाँ आकर मुझे पता चला कि मैं सिर्फ 'माँ' या 'दादी' नहीं हूँ, मैं कौशल्या हूँ।"

तभी अवनी वहां आ गई। उसे देखकर सुमित गुस्से में बोला, "तुमने हमारी माँ को बहकाया है। हम पुलिस केस करेंगे।"

कौशल्या की आवाज़ अचानक सख्त हो गई, "खबरदार! अवनी मेरी बेटी जैसी है। इसने मुझे वह सम्मान दिया जो मेरे अपने बेटों ने छीन लिया था। और रही बात मेरे जाने की, तो सुन लो—मैं अब किसी के घर की शोभा बढ़ाने वाली पुरानी तस्वीर नहीं हूँ। मैं यहाँ की मालकिन हूँ और यहीं रहूँगी।"

बेटों ने बहुत मिन्नतें कीं, पोते-पोतियों का वास्ता दिया। कौशल्या ने पोते-पोतियों को प्यार किया, उन्हें अपने हाथ की बनी मिठाई खिलाई, लेकिन बेटों के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, "रिश्ते ज़बरदस्ती नहीं निभाए जाते। तुम लोग जाओ, अपनी मशीनों से मसाले बनाओ। मेरे हाथों का जादू अब सिर्फ 'दादी की रसोई' में मिलेगा।"

बेटे और बहुएं अपना सा मुंह लेकर वापस लौट गए। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को नहीं, बल्कि उस पारस पत्थर को खो दिया है जो लोहे को सोना बनाता था।

उस रात, कौशल्या जब अपने बिस्तर पर लेटीं, तो उन्हें नींद बहुत जल्दी आ गई। यह किसी और के घर में मिली भीख की छत नहीं थी, यह उनकी अपनी कमाई हुई इज़्ज़त की छत थी। खिड़की से बाहर का चाँद उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा था, जैसे कह रहा हो—देर से ही सही, लेकिन तूने अपनी पहचान पा ली।

कौशल्या ने करवट ली और मन ही मन अवनी को धन्यवाद दिया। खून के रिश्तों ने जहाँ छल किया था, वहां दिल के रिश्ते ने नई ज़िंदगी दी थी। 'दादी की रसोई' की महक अब सिर्फ शहर तक सीमित नहीं थी, वह हर उस बुज़ुर्ग के लिए एक उम्मीद बन गई थी जो यह सोचते थे कि साठ साल के बाद ज़िंदगी खत्म हो जाती है।

कहानी बदल चुकी थी। अब कौशल्या किसी दया की पात्र नहीं, बल्कि प्रेरणा की स्रोत थीं।

स्वरचित

के कामेश्वरी


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