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कड़वे सच

 सरिता और नीलम ने बनावटी मुस्कान के साथ बधाई तो दी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी जलन साफ़ झलक रही थी। जब वे घर से बाहर निकलीं, तो उनकी चाल और कानाफूसी बदल गई थी। मीरा बालकनी से देख रही थी कि नीचे ग्रुप की अन्य महिलाएं भी इकट्ठा हो गई हैं और सबकी नज़रें उसके घर की खिड़कियों पर टिकी हैं।

महानगर की एक पुरानी हाउसिंग सोसाइटी के ब्लॉक-सी में रहने वाली मीरा पिछले एक हफ्ते से किसी गहरी योजना में डूबी हुई थी। उसका घर, जो पिछले दो सालों से एक अजीब सी उदासी और खामोशी की चादर ओढ़े हुए था, अब अचानक सक्रियता से भर गया था। दरअसल, मीरा ने तय किया था कि वह अपने घर के नवीनीकरण के बाद एक भव्य 'गृह प्रवेश' और स्नेह-मिलन का आयोजन करेगी। जीवन में मुश्किलें कभी बताकर नहीं आतीं; पहले मीरा के पति, राघव जी की कंपनी घाटे में चली गई, फिर मीरा को खुद एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझना पड़ा। लेकिन अंधेरी रात के बाद सवेरा होता ही है, और मीरा के घर में वह सवेरा उसकी बेटी, तन्वी की मेहनत लेकर आई थी।

तन्वी का चयन एक प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर हुआ था। उसने अपनी पहली कुछ तनख्वाहों को जोड़कर और कुछ लोन लेकर अपने माता-पिता के उस पुराने घर को नया रूप देने का फैसला किया, जिसकी दीवारें सीलन और यादों के बोझ से गिर रही थीं।

पूजा और उत्सव से तीन दिन पहले मीरा जब हाथ में सजावट के भारी थैले लिए अपनी कार से उतरी, तो गेट पर खड़ी उसकी 'किटी ग्रुप' की सहेलियां—सरिता और नीलम—ने उसे घेर लिया। सरिता ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू संभालते हुए टोका, "अरे मीरा! आजकल तो तुम ज़मीन पर पैर ही नहीं रख रही हो। रोज़ नई खरीदारी, रोज़ नए पार्सल। क्या बात है, कोई खज़ाना हाथ लग गया है क्या?"

मीरा ने थकान भरी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "नहीं सरिता, खज़ाना कैसा? बस तन्वी ज़िद पर अड़ी थी कि घर का कायाकल्प करना है। पिछले दो साल हम सबने बहुत मानसिक तनाव झेला है, तो सोचा एक छोटी सी पार्टी और पूजा के बहाने घर में सकारात्मक ऊर्जा आ जाएगी।"

नीलम, जो मीरा के घर के भीतर झाँकने के लिए उत्सुक थी, बोली, "चलो, अब बाहर ही खड़ी रखोगी या अंदर ले जाकर अपनी नई पसंद भी दिखाओगी?"

मीरा उन्हें अंदर ले गई। लिविंग रूम में इटैलियन मार्बल और झूमर देखकर नीलम का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने धीरे से सरिता की कोहनी मारी। मीरा ने अलमारी से कुछ महंगे सिल्क के कुशन कवर्स और पर्दे निकाले। सरिता ने कपड़े की गुणवत्ता परखते हुए कहा, "भाई! तन्वी की नौकरी क्या लगी, मीरा के तो ठाठ ही बदल गए। हम तो आज भी बजट देखकर चादरें खरीदते हैं, और यहाँ तो सीधे डिज़ाइनर शोरूम से सामान आ रहा है।"

मीरा किचन में शरबत बनाने गई, तभी नीलम ने सोफे पर हाथ फेरते हुए फुसफुसाकर सरिता से कहा, "देख रही हो? यह सब तन्वी के पैसों का प्रदर्शन है। राघव जी की तो नौकरी का भी अता-पता नहीं था कुछ समय पहले तक, और अब देखो जैसे पैसों की बारिश हो रही हो।"

तभी मीरा ट्रे लेकर आई। उसने उत्साह में एक छोटा सा मखमल का डिब्बा दिखाया जिसमें सोने के दो कंगन थे। "ये तन्वी ने मेरे जन्मदिन के लिए लिए हैं। वह कहती है कि मम्मा ने हमारे लिए बहुत त्याग किए, अब उसकी बारी है।"

सरिता और नीलम ने बनावटी मुस्कान के साथ बधाई तो दी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी जलन साफ़ झलक रही थी। जब वे घर से बाहर निकलीं, तो उनकी चाल और कानाफूसी बदल गई थी। मीरा बालकनी से देख रही थी कि नीचे ग्रुप की अन्य महिलाएं भी इकट्ठा हो गई हैं और सबकी नज़रें उसके घर की खिड़कियों पर टिकी हैं।

उत्सव का दिन आया। मीरा ने केवल प्रसाद ही नहीं, बल्कि एक शानदार डिनर का भी इंतज़ाम किया था। सोसाइटी के क्लब हाउस को बुक किया गया था ताकि सब आराम से बैठ सकें। राघव जी और उनका बेटा, आयुष, मेहमानों के स्वागत में लगे थे। मीरा रेशमी साड़ी में सजी सबको अटेंड कर रही थी, लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि वातावरण में एक भारीपन है।

पार्टी के बीच में जब मीरा लेडीज़ टेबल के पास से गुज़री, तो उसने रीना और सरिता को बातें करते सुना। रीना कह रही थी, "मुझे तो समझ नहीं आता, लोग बेटियों की कमाई पर इतना गर्व कैसे कर लेते हैं? मैं तो अपनी बेटी का एक रुपया न छुऊं। यहाँ तो पूरा घर ही बेटी के पैसों से चमक रहा है। पता नहीं, कैसी परवरिश है कि माँ-बाप बच्चे की कमाई उड़ा रहे हैं।"

दूसरी महिला ने जोड़ा, "और सुना है तन्वी की नौकरी भी कोई बहुत ऊँचे दर्जे की नहीं है, बस बीस-पच्चीस हज़ार मिलते होंगे। इतने में इतना तामझाम कैसे? दाल में कुछ काला है भाई!"

मीरा का दिल जैसे किसी ने भींच दिया हो। वह तन्वी को देख रही थी, जो बड़े प्यार से बुज़ुर्गों को खाना परोस रही थी। वही तन्वी, जिसने अपनी रातों की नींद खराब करके यह मुकाम पाया था। मीरा ने तय किया कि अब और सहन नहीं करेगी।

जब सब खाना खा चुके और विदा होने का समय आया, तो वही ग्रुप मीरा के पास आकर प्रशंसा के पुल बांधने लगा। "मीरा, क्या लाजवाब इंतज़ाम था! खाना तो एकदम फाइव स्टार था।" सरिता ने मीठे स्वर में कहा।

मीरा ने शांति से सबको रुकने का इशारा किया और मुस्कुराते हुए कहा, "शुक्रिया सरिता भाभी। लेकिन आप सबको एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ। पिछले एक घंटे से मैं सुन रही हूँ कि आप लोग मेरी बेटी की कमाई और हमारे खर्चों को लेकर काफी चिंतित हैं। आप लोगों को लगता है कि बेटी की कमाई खाना पाप है, लेकिन मुझे लगता है कि अपनी संतान को इस काबिल बनाना कि वह अपने माता-पिता का सहारा बन सके, सबसे बड़ा पुण्य है।"

वहाँ सन्नाटा छा गया। मीरा ने आगे कहा, "मेरी बेटी को बीस हज़ार मिलते हैं या पचास, यह उसकी योग्यता है। आपकी बेटियाँ घर बैठी हैं क्योंकि उन्हें 'सस्ती' नौकरी पसंद नहीं, और मेरी बेटी काम कर रही है क्योंकि उसे अपने परिवार की ज़िम्मेदारी का अहसास है। जिस सीढ़ी पर चढ़कर मैं आज खड़ी हूँ, उसे देखने से पहले आप लोगों को वह खाई देखनी चाहिए थी जिसमें हम दो साल से गिरे हुए थे। तब आप में से कोई सलाह देने नहीं आया, तो आज आलोचना करने का हक भी आप खो चुके हैं।"

मीरा ने हाथ जोड़कर सबको विदा किया। सरिता, नीलम और रीना के पास सिर झुकाकर निकलने के अलावा कोई चारा न था। मीरा ने मुड़कर तन्वी को देखा, जिसने अपनी माँ की आँखों में एक नया आत्मसम्मान देखा। उस दिन मीरा ने न केवल नए घर में प्रवेश किया था, बल्कि समाज की खोखली मर्यादाओं और दोहरे मापदंडों की दीवार को भी ढहा दिया था।

उपहार और चमक-धमक तो महज सामान थे, असली सुकून उस दिन मीरा को उन कड़वे सच को बोलने के बाद मिला, जिसने उसके परिवार के स्वाभिमान की रक्षा की थी।


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