सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रायश्चित

 रघुवीर सिंह ने पंडित जी की तरफ देखा, जो अब भीड़ में वापस आ चुके थे. "पंडित जी, आप कह रहे थे कि मेरी बहू को धर्म-कर्म की समझ नहीं है. आज मेरी आंखें खुल गईं. हम घी और लकड़ी जलाकर जिस देवता को प्रसन्न करने का ढोंग कर रहे थे, उसने हमें नहीं बचाया. हमें उस 'कर्म' ने बचाया जिसे मेरी बहू ने चुपचाप किया."

जेठ की दोपहर थी और सूरज मानो आसमान से आग बरसा रहा था. रामपुर गाँव की ज़मीन प्यास से फट चुकी थी. धूल भरी आंधियाँ और सूखे कुएं—यही पहचान रह गई थी उस हरे-भरे गाँव की.

हवेली के बड़े आंगन में एक भारी तनाव पसरा हुआ था. गाँव के मुखिया और अवनि के ससुर, ठाकुर रघुवीर सिंह, अपने पुराने मुनीम और गाँव के पंडित जी के साथ गंभीर चर्चा में मग्न थे. विषय था—'महापर्जन्य यज्ञ'.

"देखिए ठाकुर साहब, इंद्रदेव को प्रसन्न करने का अब यही एक मार्ग बचा है," पंडित जी ने पोथी पत्रा देखते हुए कहा. "ग्यारह दिन का अखंड यज्ञ होगा. इसमें कम से कम पाँच सौ किलो घी, क्विंटलों लकड़ी और... सबसे ज़रूरी बात, कलश स्थापना के लिए शुद्ध गंगाजल के ग्यारह बड़े ड्रम चाहिए होंगे."

रसोई की चौखट पर खड़ी अवनि यह सुनकर सिहर उठी. उसके हाथ में चाय की ट्रे कांपने लगी. अवनि ने कृषि विज्ञान (Agricultural Science) में मास्टर्स किया था. शहर से ब्याह कर जब वह इस गाँव में आई थी, तो उसने यहाँ की मिट्टी को सोना बनाने के सपने देखे थे. लेकिन यहाँ तो मिट्टी पानी के लिए तरस रही थी.

वह अंदर आई और चाय रखते हुए संयत स्वर में बोली, "बाबूजी, माफ़ कीजिएगा... पर क्या मैं कुछ कह सकती हूँ?"

रघुवीर सिंह ने चश्मे के ऊपर से अपनी बहू को देखा. उनकी आँखों में वही पुराना रोब था. "कहो बहू."

"बाबूजी, गाँव के हैंडपंप सूख चुके हैं. तालाब में कीचड़ के सिवा कुछ नहीं है. औरतें तीन-तीन कोस दूर जाकर पीने का पानी ला रही हैं. ऐसे में यज्ञ के लिए ग्यारह ड्रम पानी... और इतनी लकड़ियां जलाना? इससे तो पर्यावरण और गर्म होगा. बारिश तो दूर, यहाँ सांस लेना मुश्किल हो जाएगा."

पंडित जी ने नाक सिकोड़ी, "ठाकुर साहब, आपकी बहू शहर की पढ़ी-लिखी हैं. इन्हें धर्म-कर्म की समझ कम है. ये देवताओं के प्रकोप को विज्ञान के तराजू में तोल रही हैं."

"अवनि!" रघुवीर सिंह की आवाज़ में कड़कड़ाहट थी. "तुम अंदर जाओ. हमारे पुरखे सदियों से यही करते आए हैं. जब विज्ञान नहीं था, तब भी बारिश होती थी. यह आस्था का प्रश्न है, तर्क का नहीं."

अवनि ने अपने पति, विहान की तरफ देखा, जो कोने में सिर झुकाए बैठा था. विहान जानता था कि अवनि सही कह रही है, लेकिन पिता के आगे बोलने का साहस उसमें नहीं था. अवनि मन मसोस कर रह गई.

अगले एक हफ्ते तक गाँव में यज्ञ की तैयारियां जोर-शोर से चलने लगीं. अवनि देख रही थी कि कैसे गाँव का बचा-खुचा राशन और जमा पूंजी इस आयोजन में झोंकी जा रही थी. सबसे दुखद यह था कि गाँव के पुराने तालाब (बावड़ी), जिसे अवनि पुनर्जीवित करना चाहती थी, उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा था.

अवनि ने कई बार विहान से कहा था, "विहान, अगर हम सब मिलकर उस पुरानी बावड़ी की गाद (silt) निकाल दें और वर्षा जल संचयन (Rainwater harvesting) का इंतजाम करें, तो अगली बारिश में हम पानी रोक पाएंगे. यज्ञ से बादल नहीं आएंगे, लेकिन मेहनत से पानी ज़रूर रुकेगा."

विहान ने बेबसी से कहा था, "अवनि, बाबूजी नहीं मानेंगे. तुम क्यों गाँव वालों से बैर मोल लेती हो? काकी-ताई सब बातें बनाती हैं कि नई बहू अपशकुनी बातें करती है."

यज्ञ का दिन आ गया. पूरा गाँव हवेली के बाहर मैदान में इकट्ठा था. एक विशाल पंडाल लगाया गया था. हवन कुंड में आग धधक रही थी और मंत्रोच्चार से वातावरण गूंज रहा था. धुएं के गुबार आसमान की तरफ उठ रहे थे, जिसे देखकर गाँव वाले उम्मीद कर रहे थे कि शायद ये बादलों को न्योता देंगे.

अवनि वहां नहीं बैठी थी. उसे घबराहट हो रही थी. वह चुपचाप हवेली के पिछले हिस्से में चली गई, जहाँ पुरानी बावड़ी थी. पिछले एक महीने से वह रोज़ रात को चुपके से वहां जाती थी और अपने दो-तीन भरोसेमंद मज़दूरों के साथ मिलकर उस बावड़ी की सफाई कर रही थी. उसने अपनी ज्वैलरी गिरवी रखकर एक पुरानी मोटर और पाइप का इंतज़ाम किया था, जिसे उसने बावड़ी के तल में जमा थोड़े से पानी (Groundwater source) तक पहुंचा दिया था. उसे पता था कि यह पानी पीने योग्य नहीं है, लेकिन आपातकाल में काम आ सकता है.

उधर मैदान में यज्ञ अपने चरम पर था. दोपहर के दो बज रहे थे. गर्मी और हवन की आग ने तापमान को असहनीय बना दिया था. अचानक, तेज हवा का एक झोंका आया. लेकिन यह ठंडी हवा नहीं थी, यह 'लू' थी. हवा इतनी तेज़ थी कि पंडाल का एक हिस्सा उखड़ गया और हवन कुंड की चिंगारियां पास ही रखे सूखे चारे के ढेर पर जा गिरीं.

देखते ही देखते, सूखी घास ने आग पकड़ ली.

"आग! आग लग गई!" भगदड़ मच गई.

आग ने विकराल रूप ले लिया. पास ही गाँव का अनाज गोदाम था और दूसरी तरफ स्कूल की पुरानी इमारत, जहाँ यज्ञ के लिए आए मेहमान ठहरे थे. लोग चिल्ला रहे थे, "पानी! पानी लाओ!"

लेकिन पानी था कहां? यज्ञ के लिए मंगवाए गए ग्यारह ड्रम पानी का उपयोग तो पहले ही हो चुका था या वे ड्रम पंडाल के मलबे के नीचे दब गए थे. हैंडपंप सूखे थे. लोग धूल और कपड़े झाड़कर आग बुझाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. लपटें अनाज गोदाम की तरफ बढ़ रही थीं. अगर गोदाम जल गया, तो अकाल के साथ-साथ भुखमरी भी आ जाएगी.

रघुवीर सिंह चिल्ला रहे थे, "कुछ करो! बुझाओ इसे!" पर उनके हाथ खाली थे. पंडित जी खुद अपनी पोथी लेकर भाग खड़े हुए थे.

तभी एक तेज़ धार पानी की बौछार आग की लपटों पर पड़ी.

सबने चौंककर देखा. अवनि, अपने हाथों में एक मोटा पाइप थामे खड़ी थी. उसके कपड़े कीचड़ से सने थे, माथे पर पसीना और कालिख लगी थी, लेकिन उसकी आँखों में गजब का आत्मविश्वास था. उसके पीछे विहान और दो मज़दूर मोटर को संभाले हुए थे.

"विहान, प्रेशर बढ़ाओ!" अवनि चिल्लाई.

पुरानी बावड़ी का वह मटमैला पानी, जिसे गाँव वाले भूल चुके थे, आज अमृत बनकर बरस रहा था. अवनि ने पाइप का मुंह सीधा आग के केंद्र की तरफ कर दिया. वह अकेली किसी योद्धा की तरह डटी हुई थी. गाँव के कुछ युवक दौड़कर आए और उन्होंने पाइप को संभालने में अवनि की मदद की.

रघुवीर सिंह अपनी जगह पर जड़वत खड़े थे. वे देख रहे थे कि जिस बहू को उन्होंने 'अपशकुनी' और 'धर्म-विरोधी' समझा था, आज वही उनके पूर्वजों की विरासत और गाँव के भविष्य को खाक होने से बचा रही थी.

करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया गया. गोदाम बच गया था.

धुआं अभी भी उठ रहा था, लेकिन अब वह विनाश का नहीं, बल्कि राहत का धुआं था. अवनि पाइप छोड़कर वहीं जमीन पर बैठ गई. उसका गला सूख चुका था और हाथ कांप रहे थे.

तभी गाँव की कुछ औरतें, जिनमें विमला काकी सबसे आगे थीं, वहां आ गईं. विमला काकी वही थीं जिन्होंने सुबह अवनि को ताना मारा था कि "यज्ञ में न बैठकर कुल का नाश कर रही है."

विमला काकी ने अवनि की तरफ इशारा करते हुए कहा, "देखो ठाकुर साहब, मैंने तो पहले ही कहा था. ये सब इसी का किया-धरा है. न ये बावड़ी में छेड़छाड़ करती, न ये अपशकुन होता. यज्ञ खंडित हो गया इसकी वजह से. देवता नाराज़ होकर आग बरसा रहे हैं."

रघुवीर सिंह धीरे-धीरे चलते हुए अवनि के पास पहुंचे. अवनि ने डरकर नज़रें झुका लीं. उसे लगा कि अब उसे फिर से डांट पड़ेगी कि उसने बिना पूछे मोटर क्यों लगाई.

रघुवीर सिंह ने अपना हाथ आगे बढ़ाया. अवनि ने झिझकते हुए ऊपर देखा. ससुर जी उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ा रहे थे. अवनि ने उनका हाथ थाम लिया और खड़ी हो गई.

रघुवीर सिंह ने विमला काकी की तरफ देखा, उनकी आँखों में एक नई चमक थी. "बस कीजिए काकी. अब एक शब्द और नहीं."

उनकी आवाज़ में इतनी गंभीरता थी कि भीड़ शांत हो गई.

रघुवीर सिंह ने पंडित जी की तरफ देखा, जो अब भीड़ में वापस आ चुके थे. "पंडित जी, आप कह रहे थे कि मेरी बहू को धर्म-कर्म की समझ नहीं है. आज मेरी आंखें खुल गईं. हम घी और लकड़ी जलाकर जिस देवता को प्रसन्न करने का ढोंग कर रहे थे, उसने हमें नहीं बचाया. हमें उस 'कर्म' ने बचाया जिसे मेरी बहू ने चुपचाप किया."

उन्होंने अवनि के सिर पर हाथ रखा. "मैंने शास्त्रों में पढ़ा था कि 'कर्म ही पूजा है', लेकिन इसका अर्थ आज समझ में आया. अगर आज अवनि ने इस बावड़ी को पुनर्जीवित न किया होता, तो हमारा 'विश्वास' हमें राख के ढेर में बदल देता."

"लेकिन ठाकुर साहब, यज्ञ खंडित हुआ है, प्रायश्चित तो करना पड़ेगा," पंडित जी ने दबी जुबान में कहा.

"प्रायश्चित हम करेंगे पंडित जी," रघुवीर सिंह ने दृढ़ता से कहा. "लेकिन घी जलाकर नहीं. कल से पूरा गाँव—मैं और आप भी—अवनि के साथ मिलकर इस बावड़ी की पूरी खुदाई करेंगे. हम तालाब गहरा करेंगे और मेड़ बनाएंगे. असली यज्ञ वह होगा जब हम सूखी धरती की प्यास बुझाएंगे, न कि हवा में धुआं उड़ाएंगे."

विहान गर्व से अपनी पत्नी को देख रहा था.

शाम ढल रही थी. अभी भी बारिश नहीं हुई थी. लेकिन हवा में एक ठंडक थी—यह ठंडक पानी की बौछार की थी जो अवनि ने बरसाई थी.

रघुवीर सिंह ने अवनि से कहा, "बहू, तुम सही कहती थी. यह मिट्टी सोना है, बस इसे पहचानने वाली जौहरी की नज़र चाहिए थी. आज से इस घर और इस गाँव के फैसलों में तुम्हारी आवाज़ सबसे ऊपर होगी."

तभी, शायद संयोग था या प्रकृति का आशीर्वाद, आसमान में काले बादल घिरने लगे. कुछ ही देर में टप-टप बूंदें गिरने लगीं. लोग इसे चमत्कार कह रहे थे, यज्ञ का फल मान रहे थे. लेकिन रघुवीर सिंह और अवनि एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे. वे जानते थे कि यह बारिश सिर्फ मौसम का बदलाव है, लेकिन असली 'वृष्टि' तो आज विचारों में हुई थी.

अवनि ने हथेली फैलाई और बारिश की पहली बूंद को महसूस किया. यह बूंद किसी मंत्र से नहीं, बल्कि सत्य और साहस की पुकार से उसकी हथेली पर गिरी थी. आज गाँव ने जान लिया था कि सूखे कंठ की प्यास मंत्रों से नहीं, जल-संरक्षण से बुझती है.

अवनि ने एक गहरी सांस ली. हवेली की पुरानी नींव आज एक नई और मजबूत सोच पर खड़ी हो गई थी.


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...