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हक़

 "खटाक!" चाय का प्याला दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गया. चीनी मिट्टी के टुकड़े फर्श पर बिखर गए और उनके साथ ही बिखर गया सुमन का वह भ्रम, जिसे वह पिछले सात सालों से 'गृहस्थी' का नाम दे रही थी.

"हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? तुमने एफडी (FD) तुड़वा दी? वो भी मुझसे पूछे बिना? क्या तुम भूल गई हो कि इस घर में पैसे से जुड़ा कोई भी फैसला लेने का हक़ सिर्फ मेरा है?" विनय की आवाज़ में शेर जैसी दहाड़ थी, लेकिन आँखों में एक असुरक्षित भेड़िए का डर.

सुमन अपने गाल पर हाथ रखे सन्न खड़ी थी. गाल पर पांच उंगलियों के निशान उभर आए थे, जो विनय के पौरुष का नहीं, बल्कि उसके खोखले अहंकार का प्रमाण थे.

"विनय, वह एफडी मेरे नाम पर थी. मेरे पीएफ (PF) के पैसे थे जो मैंने शादी से पहले जमा किए थे," सुमन ने कांपती आवाज़ में, लेकिन नज़रें मिलाकर कहा. "और मैंने वह पैसा किसी अय्याशी में नहीं उड़ाया. अनाथालय की छत टपक रही थी, बारिश का मौसम आने वाला है. वहां के बच्चों के लिए मैंने..."

"अनाथालय!" विनय ने उसे बीच में ही काट दिया. "खुद का घर संभल नहीं रहा, चली हैं समाज सेविका बनने. जब देखो तब अपनी टीचर होने की धौंस जमाती रहती हो. दो कौड़ी की मास्टरी क्या मिल गई, दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ गया है."

रसोई के दरवाजे पर खड़ी सास, सावित्री देवी, ने पान चबाते हुए आग में घी डाला, "अरे लल्ला, मैंने तो पहले ही कहा था, ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू घर तोड़ेगी. औरत की अकल चोटी के पीछे होती है. अब देखो, घर का पैसा बाहर लुटा रही है. इसे लगता है कि कमाती है तो घर इसी के दम पर चल रहा है."

सुमन ने एक बार अपनी सास की ओर देखा. वही सावित्री देवी, जिनके घुटनों का ऑपरेशन पिछले महीने सुमन की उसी सैलरी से हुआ था, जिसे आज 'दो कौड़ी' का कहा जा रहा था. सुमन कुछ कहना चाहती थी, बताना चाहती थी कि घर की ईएमआई से लेकर राशन तक, सब उसी की सैलरी से जाता है क्योंकि विनय का 'स्टार्टअप' पिछले तीन साल से सिर्फ घाटे का सौदा बना हुआ है. लेकिन वह चुप रही. आज शब्द बेमानी थे.

"खबरदार जो आज के बाद अपनी सैलरी से एक रुपया भी इधर-उधर किया," विनय ने उंगली दिखाते हुए चेतावनी दी. "अगले महीने से तुम्हारा एटीएम कार्ड मेरे पास रहेगा. समझी? अब जाओ, और ये फैला हुआ कचरा साफ़ करो."

विनय पैर पटकता हुआ अपने कमरे में चला गया. सावित्री देवी भी बड़बड़ाती हुई पूजा घर की ओर बढ़ गईं. हॉल में सिर्फ सुमन बची थी और फर्श पर बिखरे हुए चीनी मिट्टी के टुकड़े.

सुमन ने झुककर उन टुकड़ों को उठाना शुरू किया. एक नुकीला टुकड़ा उसकी उंगली में चुभ गया. खून की एक नन्हीं बूंद निकल आई. उसने उस बूंद को देखा. अजीब बात थी, उसे दर्द नहीं हो रहा था. शायद गाल पर पड़ा थप्पड़ इतना तेज़ था कि उसने बाकी सारे दर्द सुन्न कर दिए थे. या शायद, आत्मा पर लगी चोट के आगे यह शारीरिक चोट बहुत मामूली थी.

उसने टुकड़े डस्टबिन में डाले. घड़ी देखी. सुबह के आठ बज रहे थे. स्कूल जाने का समय हो गया था.

रोज़ की तरह वह रोई नहीं. उसने विनय को मनाने की कोशिश नहीं की. उसने सास के पैर पकड़कर माफ़ी नहीं मांगी. वह चुपचाप बाथरूम गई, चेहरा धोया, अपनी साड़ी ठीक की, और अपना पर्स उठाकर घर से निकल गई.

पीछे से सावित्री देवी की आवाज़ आई, "अरे, नाश्ता कौन बनाएगा? महारानी चल दीं अपना पर्स लटकाकर."

सुमन ने अनसुना कर दिया और दरवाजा बाहर से बंद कर दिया.

सड़क पर ऑटो का शोर था, धुआं था, और भागती हुई ज़िंदगी थी. लेकिन सुमन के भीतर एक भयानक सन्नाटा था. बस में खिड़की वाली सीट पर बैठकर वह बाहर देख रही थी, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. उसकी आंखों के सामने सिर्फ अपने सात साल के वैवाहिक जीवन का लेखा-जोखा चल रहा था.

शादी के वक्त उसके पिता ने कहा था, "सुमन, लड़का होनहार है, अपना बिज़नेस करता है. तुम सरकारी स्कूल में टीचर हो, दोनों मिलकर बहुत अच्छी ज़िंदगी बिताओगे."

शुरुआत अच्छी थी. लेकिन जैसे-जैसे विनय का बिज़नेस लड़खड़ाने लगा और सुमन का करियर स्थिर होता गया, विनय का व्यवहार बदलने लगा. पहले ताने, फिर रोक-टोक, और आज... हाथ उठा दिया.

सुमन को याद आया कि कैसे वह अपनी सैलरी आते ही विनय के हाथ में रख देती थी, ताकि उसे 'छोटा' महसूस न हो. कैसे उसने अपनी ज़रूरतें मारकर घर की ज़रूरतें पूरी कीं. लेकिन बदले में उसे क्या मिला? एक थप्पड़ और अपना एटीएम कार्ड सरेंडर करने का फरमान?

स्कूल पहुँचते ही रोज की तरह बच्चों का शोर उसके कानों में पड़ा.

"गुड मॉर्निंग मैम!"

"नमस्ते मैम!"

कक्षा 8 के बच्चे अपनी जगह पर खड़े होकर उसका स्वागत कर रहे थे. सुमन ने जबरदस्ती अपने चेहरे पर मुस्कान ओढ़ी. वह ब्लैकबोर्ड की तरफ मुड़ी और चॉक उठाया. हाथ थोड़ा कांप रहा था.

"मैम, आप ठीक तो हैं?" पहली बेंच पर बैठी कोमल ने पूछा. कोमल वही लड़की थी जिसके पास किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, और सुमन ने पिछले हफ्ते उसे चुपके से किताबें दिलवाई थीं.

कोमल की मासूम आंखों में चिंता देखकर सुमन का वह बांध टूट गया जो उसने सुबह से रोक रखा था. उसकी आंखें भर आईं. उसने जल्दी से पल्लू से आंखें पोंछीं.

"हाँ बेटा, बस थोड़ी धूल चली गई थी आंख में," उसने झूठ बोला.

लंच ब्रेक में वह स्टाफ रूम में अकेली बैठी थी. उसके सामने उसकी सहकर्मी, राधिका, अपना टिफिन खोल रही थी.

"सुमन, क्या हुआ? आज तुम बहुत गुमसुम हो. और ये गाल पर..." राधिका की नज़र उस लाल निशान पर पड़ गई जिसे फाउंडेशन भी पूरी तरह छिपा नहीं पाया था.

सुमन कुछ पल चुप रही. फिर उसने राधिका की ओर देखा. "राधिका, क्या एक औरत की कमाई सिर्फ उसके पति की जागीर होती है? क्या हमारा अपनी मेहनत की कमाई पर कोई हक नहीं होता?"

राधिका समझ गई. उसने धीरे से सुमन का हाथ थाम लिया. "हक तो होता है सुमन, लेकिन हम औरतें अक्सर शांति बनाए रखने के लिए अपना हक छोड़ देती हैं. और जब हम अपना हक छोड़ते हैं, तो सामने वाला उसे अपना अधिकार समझ लेता है."

सुमन को लगा जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में रोशनी जला दी हो. 'शांति बनाए रखने के लिए'. हाँ, यही तो करती आई थी वह अब तक. झगड़ा न हो, इसलिए चुप रही. विनय का पुरुषार्थ आहत न हो, इसलिए अपनी उपलब्धियां छिपाती रही.

शाम को स्कूल की छुट्टी हुई. सुमन के कदम घर की तरफ नहीं बढ़े. वह सीधे बैंक गई.

बैंक मैनेजर उसे जानता था.

"नमस्ते मैडम, कैसे आना हुआ?"

"नमस्ते सर. मुझे अपना अकाउंट फ्रीज़ करवाना है. और एक नया अकाउंट खोलना है, जिसमें नॉमिनी सिर्फ मेरी माँ होंगी," सुमन की आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी.

"जी... जी बिल्कुल. लेकिन आपका तो जॉइंट अकाउंट है पति के साथ?"

"उसी से मेरा नाम हटवाना है. मेरी सैलरी अब मेरे पर्सनल अकाउंट में आनी चाहिए."

बैंक का काम निपटाकर जब वह बाहर निकली, तो सूरज ढल रहा था. डूबते सूरज की नारंगी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी. उसे लगा जैसे यह सूर्यास्त नहीं, बल्कि उसके जीवन के एक अंधकारमय अध्याय का अंत है.

वह घर पहुंची. शाम के सात बज रहे थे.

दरवाजा खोलते ही टीवी की तेज़ आवाज़ सुनाई दी. विनय सोफे पर पैर फैलाकर बैठा मैच देख रहा था. सावित्री देवी माला जप रही थीं.

सुमन को देखते ही विनय ने टीवी का रिमोट सोफे पर पटका. "आ गई? सात बज रहे हैं. चाय कहां है? और सुबह जो तमाशा करके गई थी, उसके लिए माफ़ी मांगने का इरादा है या नहीं?"

सुमन ने अपनी सैंडल उतारी और बैग मेज पर रखा.

"चाय नहीं बनेगी विनय. और माफ़ी... माफ़ी तो बिल्कुल नहीं मिलेगी."

विनय चौंककर खड़ा हो गया. "क्या बकवास कर रही हो? दिमाग फिर गया है क्या?"

सुमन धीरे-धीरे चलकर विनय के सामने आई. अब उसकी आंखों में न डर था, न आंसू. वहां सिर्फ बर्फ जैसी ठंडक थी.

"विनय, आज सुबह तुमने कहा था कि मेरी मास्टरी दो कौड़ी की है. तुमने कहा था कि मैं घर का पैसा लुटा रही हूँ. तो मैंने सोचा कि हिसाब कर ही लेते हैं."

उसने अपने बैग से एक डायरी निकाली और टेबल पर रख दी.

"यह पिछले तीन साल का हिसाब है. घर की ईएमआई: 25 हज़ार महीना. राशन: 10 हज़ार. माँ जी की दवाइयां: 5 हज़ार. बिजली, पानी, मेंटेनेंस: 5 हज़ार. कुल मिलाकर 45 हज़ार रुपये महीना. मेरी सैलरी 50 हज़ार है. 5 हज़ार जो बचते थे, वो मैं इमरजेंसी के लिए रखती थी. उसी में से मैंने अनाथालय में दान दिया."

सावित्री देवी की माला रुक गई. विनय की बोलती बंद थी.

"और तुम्हारा योगदान?" सुमन ने तीखी नज़र से विनय को देखा. "पिछले दो साल से तुम्हारे बिज़नेस ने घर में एक रुपया नहीं दिया. उल्टा, मेरी सेविंग्स से तुमने दो बार अपनी मशीनरी ठीक करवाई. फिर भी, मुझे लगा कि पति-पत्नी गाड़ी के दो पहिए हैं, एक कमज़ोर पड़े तो दूसरे को संभाल लेना चाहिए. लेकिन आज मुझे समझ आया कि तुम पहिया नहीं, बल्कि वो कील हो जो टायर को पंक्चर कर रही है."

"तुम... तुम मुझे पैसे का ताना मार रही हो?" विनय चिल्लाया, लेकिन उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था.

"ताना नहीं मार रही, आईना दिखा रही हूँ," सुमन ने शांत स्वर में कहा. "तुमने कहा था कि मेरा एटीएम कार्ड तुम्हें चाहिए. माफ़ करना, मैंने वह कार्ड ब्लॉक करवा दिया है. और अपनी सैलरी का अकाउंट भी बदलवा दिया है."

"क्या?" सावित्री देवी अपनी जगह से चीखीं. "अरे, बहू होकर ऐसा अनर्थ करेगी? पति से पैसा छिपाएगी?"

"पति से नहीं, उस आदमी से छिपा रही हूँ जो मेरा सम्मान नहीं करता," सुमन ने सास की ओर मुड़कर कहा. "माँ जी, जब मैं स्कूल में पढ़ाती हूँ, तो सौ बच्चे मुझे 'मैम' कहकर इज़्ज़त देते हैं. और जिस घर को मैं अपने खून-पसीने से सींच रही हूँ, वहां मुझे 'जूती' समझा जाता है. यह सौदा मुझे अब मंज़ूर नहीं है."

"तो क्या चाहती हो? घर छोड़कर जाओगी?" विनय ने डराने की कोशिश की. "जाओ, अभी निकल जाओ. देखूंगा कहां रहोगी."

सुमन हंसी. एक फीकी, व्यंग्यात्मक हंसी.

"विनय, यह फ्लैट मेरे नाम पर भी है. लोन मैं भर रही हूँ. अगर किसी को जाना होगा, तो वो तुम होगे. लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगी. मैं तुम्हें सड़क पर नहीं निकालूंगी, क्योंकि मेरे संस्कार मुझे वह अमानवीयता नहीं सिखाते जो तुम आज सुबह दिखा चुके हो."

वह अपने बेडरूम की ओर बढ़ी और अलमारी से एक सूटकेस निकाला.

"मैं जा रही हूँ. कुछ दिनों के लिए नहीं, हमेशा के लिए. मैं अपनी दोस्त राधिका के साथ रहूंगी, जब तक कि मुझे कोर्ट से लीगल सेपरेशन और इस घर का बंटवारा नहीं मिल जाता."

विनय के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसे अंदाज़ा नहीं था कि सुबह का एक थप्पड़ शाम तक उसकी पूरी दुनिया हिला देगा. उसे लगा था कि सुमन रोएगी, गिड़गिड़ाएगी, और वह उसे माफ करने का नाटक करके अपना वर्चस्व कायम रखेगा. लेकिन यहाँ तो बाज़ी पलट चुकी थी.

"सुमन, तुम मज़ाक कर रही हो न? छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हो," विनय ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की.

सुमन ने झटका देकर अपना हाथ छुड़ाया. "हाथ मत लगाना विनय. आज सुबह जब यह हाथ उठा था, तब वह रिश्ता टूट गया था. उस वक्त अगर तुमने अपनी गलती मानी होती, तो शायद गुंजाइश थी. लेकिन तुम अहंकार में इतने अंधे थे कि तुम्हें लगा मैं लाचार हूँ."

उसने अपना सूटकेस उठाया.

"औरत तब तक लाचार दिखती है, विनय, जब तक वह प्यार और लिहाज़ करती है. जिस दिन वह आत्मसम्मान चुन लेती है, उस दिन वह चट्टान बन जाती है."

सुमन मुख्य दरवाजे तक पहुंची. सावित्री देवी अब रोने का नाटक कर रही थीं, "अरे, रोक लो इसे. जग-हंसाई होगी. नाक कट जाएगी हमारी."

सुमन रुकी. उसने पीछे मुड़कर देखा.

"जग-हंसाई तो तब होती माँ जी, जब लोग यह कहते कि एक पढ़ी-लिखी, कमाऊ औरत रोज़ अपने पति से पिटती है और फिर भी चुप रहती है. आज मैं अपनी नाक नहीं, अपनी रीढ़ की हड्डी बचाकर जा रही हूँ."

दरवाजा खुला और सुमन बाहर निकल गई.

सीढ़ियां उतरते वक्त उसे लगा कि उसका सूटकेस बहुत भारी है, लेकिन उसका मन... मन इतना हल्का था जितना पिछले सात सालों में कभी नहीं था.

घर के अंदर, विनय सोफे पर गिर पड़ा. अंधेरा गहरा रहा था. उसे भूख लगी थी, लेकिन आज उसे पता था कि चाय का प्याला अब कभी नहीं आएगा. वह 'दो कौड़ी' की मास्टरी वाली औरत अपने साथ उसकी पूरी दुनिया, उसका आराम और उसकी झूठी शान लेकर जा चुकी थी. फर्श पर अब कोई कांच का टुकड़ा नहीं था, लेकिन विनय को चुभन महसूस हो रही थी—पछतावे की वह चुभन, जो बहुत देर से होती है.


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