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भूखी ममता

 उस ऊँचे रसूख वाले खानदान की हवेली के भारी लकड़ी के दरवाजों के पीछे एक ऐसी दुनिया थी, जहाँ घड़ियाँ तो चलती थीं, लेकिन नियम सदियों पुराने थे। विनायक बाबू का घर शहर में अपनी मर्यादा और सख्त अनुशासन के लिए जाना जाता था। उस घर में कदम रखते ही रोशनी की बहू, रागिनी को अहसास हो गया था कि यहाँ की हवा में प्यार कम और बंदिशें ज्यादा हैं।

रागिनी एक पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी, लेकिन उसने विनायक बाबू के बेटे, मानव से प्रेम विवाह किया था, इसलिए वह हर हाल में इस परिवार में ढलने की कोशिश कर रही थी। शादी के दूसरे ही दिन, जब रागिनी सुबह का काम निपटाकर रसोई में खुद के लिए नाश्ता निकालने लगी, तो उसकी सास, सावित्री देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी ठंडी कठोरता थी।

सावित्री देवी ने कहा, "ठहरो रागिनी! शायद तुम्हें किसी ने बताया नहीं। बहु! हमारे परिवार में बहुएं.. सबको खाना खिलाने के बाद ही खाना खा सकती है। यह इस घर की परंपरा है। जब तक घर का आखिरी पुरुष और बड़े-बुजुर्ग भोजन नहीं कर लेते, बहू अन्न का दाना भी मुँह में नहीं डालती।"

रागिनी अवाक रह गई। उसे लगा कि शायद यह केवल एक रस्म है, लेकिन जल्द ही उसे हकीकत का पता चला। घर में मेहमानों का आना-जाना लगा रहता था। कभी-कभी दोपहर का खाना शाम के चार बजे तक खिंच जाता। रागिनी रसोई में पसीने से तर-बतर रोटियाँ सेंकती रहती, सबको परोसती, लेकिन खुद की भूख को मारना उसकी नियति बन गई थी। मानव यह सब देखता था, पर अपने पिता के डर से वह कभी कुछ बोल नहीं पाता था।

एक दिन रागिनी की तबीयत ठीक नहीं थी। उसे चक्कर आ रहे थे और डॉक्टर ने उसे समय पर दवा और भोजन लेने की सलाह दी थी। उस दिन विनायक बाबू के कुछ खास दोस्त घर पर चर्चा के लिए आए हुए थे। बातें लंबी खिंचती गईं। दोपहर के तीन बज चुके थे, लेकिन डाइनिंग टेबल पर हंसी-ठिठोली खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी।

रागिनी रसोई की चौखट पकड़कर खड़ी थी। उसका गला सूख रहा था। उसने हिम्मत जुटाकर सावित्री देवी से धीरे से कहा, "माँ जी, मुझे दवा लेनी है, क्या मैं थोड़ा सा दलिया खा लूँ?" सावित्री देवी ने उसे ऐसी नजरों से देखा जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो। उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, "मर्यादा मत भूलो रागिनी। क्या मेहमानों के सामने तुम अपनी भूख का प्रदर्शन करोगी? चुपचाप अंदर जाओ।"

तभी रसोई के कोने में सफाई करने वाली बूढ़ी काकी, जो बरसों से उस घर का हिस्सा थीं, यह सब देख रही थीं। उन्होंने देखा कि कैसे परंपरा के नाम पर एक जीती-जागती स्त्री का गला घोंटा जा रहा है। अचानक, डाइनिंग हॉल में एक शोर मचा। विनायक बाबू के सबसे करीबी दोस्त, जो एक बड़े समाज सुधारक माने जाते थे, अचानक रसोई की तरफ पानी लेने आए। उन्होंने देखा कि रागिनी दीवार का सहारा लेकर फर्श पर बैठ गई है और सावित्री देवी उसे डाँट रही हैं।

उस बुजुर्ग दोस्त ने सब कुछ भांप लिया। उन्होंने वापस जाकर विनायक बाबू से कहा, "विनायक, तुम बाहर दुनिया को संस्कार सिखाते हो, लेकिन क्या तुम्हारे घर की परंपराएं इतनी खोखली हैं कि वे एक बीमार बहू को दो निवाले देने की अनुमति नहीं देतीं? यह परंपरा नहीं, यह अहंकार है।"

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। विनायक बाबू का सिर शर्म से झुक गया। मानव पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आगे बढ़ा और रागिनी को सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया। उसने सबके सामने कहा, "पिता जी, जिस घर में लक्ष्मी को भूखा रखा जाए, वहाँ खुशहाली कभी नहीं रह सकती। आज से यह नियम इसी वक्त खत्म होता है।"

सावित्री देवी को भी अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने भी सालों तक यही दर्द सहा था और अनजाने में वही दर्द अपनी बहू को दे रही थीं। उस दिन के बाद रसोई की वह काली दीवार गिर गई। अब घर में सब साथ बैठकर खाना खाते हैं, और परंपरा का मतलब 'अपमान' नहीं, बल्कि 'सम्मान' बन गया है।


इस कहानी पर आपकी क्या राय है? क्या आज के समय में भी ऐसी रूढ़िवादी परंपराएं सही हैं? क्या किसी को खिलाना और खुद भूखा रहना ही एक आदर्श बहू की पहचान है? अपनी कीमती राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

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