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चौखट का बंटवारा और दरकते रिश्ते

 गाँव की पैतृक हवेली में आज अजीब सी हलचल थी। समीर और अंजलि की शादी को अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए थे, लेकिन अंजलि के तेवरों ने घर के बड़े-बुजुर्गों को चिंता में डाल दिया था। समीर घर का छोटा बेटा था, और उसकी बड़ी बहन, नियति, जिसकी शादी पास के ही शहर में हुई थी, अक्सर अपने मायके आती रहती थी। नियति केवल एक ननद नहीं थी, बल्कि इस घर की नींव थी। माँ के गुजरने के बाद उसने ही समीर और बड़े भाई सुमित को माँ की ममता दी थी।

लेकिन अंजलि को नियति का बार-बार आना खटकने लगा था। उसे लगता था कि नियति का दखल घर के फैसलों में बहुत ज्यादा है। एक दिन जब नियति अपने बच्चों के साथ छुट्टियों में रहने आई, तो अंजलि ने कमरे के बंटवारे को लेकर बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया। वह समीर से बोली, "देखो, मुझे अपनी प्राइवेसी चाहिए। यह घर है या सराय? कभी ननद आ रही हैं, कभी उनके बच्चे। मैं इस माहौल में घुट रही हूँ।"

समीर बेचारा अंजलि के प्यार और बहन के सम्मान के बीच फंस गया था। अंजलि ने धीरे-धीरे चालें चलनी शुरू कीं। उसने घर के बीचों-बीच एक दीवार खींचने की जिद पकड़ ली। सुमित और उसके पिता ने बहुत समझाया, लेकिन अंजलि ने साफ कह दिया, "अगर अलग चूल्हा नहीं जला, तो मैं अपने मायके चली जाऊँगी।" अंततः, हवेली दो हिस्सों में बंट गई।

विभाजन के बाद, अंजलि ने अपना असली पत्ता खेला। उसने समीर को मजबूर किया कि वह घर के मुख्य द्वार पर अपना अलग ताला लगाए और नियति के लिए मायके के रास्ते पूरी तरह बंद कर दे। जब नियति अगली बार भाई दूज पर आई, तो उसने देखा कि जिस दरवाजे पर वह बचपन में दौड़ती थी, वहाँ एक बड़ी सी लोहे की जाली और ताला लटका था। अंजलि ने अंदर से ही कहलवा दिया, "अब यह हिस्सा हमारा है, और यहाँ बाहरी लोगों का आना मना है।"

नियति की आँखों में आँसू थे। उसने अपने भाई समीर को पुकारा, लेकिन समीर अंजलि के दबाव में खिड़की के पीछे छिपा रहा। उस दिन एक बहन के लिए उसके मायके के रास्ते सच में बंद हो गए थे। अंजलि को लगा कि उसने जंग जीत ली है। अब वह अपने हिस्से की मालकिन थी, कोई रोक-टोक करने वाला नहीं था।

समय का पहिया घूमा। दो साल बीत गए। अंजलि और समीर का एक बेटा हुआ। एक रात समीर की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उसे शहर के बड़े अस्पताल ले जाना पड़ा। अंजलि अकेली पड़ गई थी। गाँव में भारी बारिश के कारण सड़कें जाम थीं और कोई उसकी मदद के लिए तैयार नहीं था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। तभी अस्पताल के गलियारे में उसे नियति दीदी दिखीं।

अंजलि को लगा कि नियति उसे ताना देगी या उसकी बेइज्जती करेगी, लेकिन नियति ने दौड़कर अपने भाई का हाथ थामा और डॉक्टरों से बात की। उसने पूरी रात जागकर भाई की सेवा की और अंजलि के बच्चे को भी संभाला। अंजलि शर्म के मारे गड़ गई थी। उसने जिस ननद के लिए घर के दरवाजे बंद किए थे, उसी ने आज दिल के दरवाजे खोल दिए थे।

जब समीर ठीक होकर घर लौटा, तो अंजलि ने सबसे पहले वह लोहे की जाली हटवाई और उस ताले को फेंक दिया। उसने नियति के पैर पकड़कर माफी मांगी। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते दीवारों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की जरूरत में खड़े होने से बनते हैं। आज उस हवेली में फिर से वही पुराना शोर था, लेकिन इस बार वह शोर खुशियों का था।


इस कहानी पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि घर में आने वाली नई बहू को परिवार के पुराने रिश्तों का सम्मान करना चाहिए? क्या ज़िद कभी किसी का भला कर सकती है? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

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