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बड़ा दिल

 अभय ने कुछ महीनों पहले ही पिता को खोया था और अब पत्नी भी। घर के कोने-कोने में उसकी मौजूदगी के निशान थे—रसोई में रखा पसंदीदा मग, अलमारी के एक खाने में रखी उसकी नीली साड़ी, और बच्चों के स्कूल बैग पर लगे वही छोटे-छोटे टैग जिन्हें वह हर हफ्ते ठीक करती थी। अभय जब भी बच्चों को उदास आँखों से खिड़की के पास बैठा देखता, मन में एक ही सवाल उठता—“मैं इन्हें कैसे संभालूँगा… और खुद को कैसे?”

उसकी बेटी मीरा बारह साल की थी, उम्र से बड़ी समझदार, लेकिन भीतर से उतनी ही टूटी हुई। छोटा बेटा आरव आठ साल का, जो रात में उठकर माँ को ढूँढता और फिर चुपचाप तकिए में चेहरा छिपाकर रो देता। अभय का दिल हर बार चीर जाता, पर वह रो नहीं पाता था। उसे लगता, अगर वह टूट गया, तो बच्चों का सहारा कौन बनेगा?

उसी समय उसके बड़े भाई नरेश की पत्नी नीलम और छोटे भाई रितेश की पत्नी पायल उसके घर आ गईं। यह वही दो बहुएँ थीं जिन्हें समाज अक्सर “अपनी-अपनी गृहस्थी संभालने” की सलाह देता है, लेकिन उन्होंने किसी सलाह की परवाह नहीं की। वे बिना बताए आ गईं—एक थैले में बच्चों के लिए दूध-बिस्किट, दूसरे में दवाइयाँ और कुछ पुराने कागज़, जो शायद अभय को संभालने पड़ते।

नीलम ने घर में कदम रखते ही सबसे पहले आरव को अपनी गोद में खींच लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “चल मेरे शेर, आज से तेरी मम्मी दो होंगी, एक मैं… और एक पायल चाची।” आरव ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी बाँहों में चिपककर सिसकता रहा। मीरा वहीं खड़ी थी, जैसे किसी को भरोसा करने से डर रही हो। पायल उसकी तरफ बढ़ी, धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा, “मीरा, रोने से कोई मना नहीं कर रहा। बस अकेले मत रोना, ठीक है?”

अभय को लगा जैसे किसी ने उसके कंधों पर रखा बोझ थोड़ा हल्का कर दिया हो। उसने भर्राई आवाज़ में बस इतना कहा, “भाभी… आप लोग—”

नीलम बीच में ही बोल पड़ी, “तुम्हें कॉलेज जाना है ना? जाओ। बच्चों की पढ़ाई, खाना, माँ—सब हम देख लेंगे। तुम्हें बस अपना काम और अपना मन संभालना है।” पायल ने भी सिर हिलाया, “और अगर मन टूटे तो हमें बताना। रिश्ते सिर्फ त्योहारों के लिए नहीं होते।”

अभय की माँ, कमला देवी, पहले से ही बीमार रहती थीं। बेटे की पत्नी के गुजर जाने के बाद तो उनका शरीर जैसे और कमजोर पड़ गया था। कभी-कभी वे कमरे में अकेली बैठकर बुदबुदातीं, “मेरी बहू… इतनी जल्दी चली गई।” और फिर उनकी आँखें खाली हो जातीं। अभय को डर था कि कहीं माँ का मन भी साथ छोड़ न दे।

नीलम और पायल ने घर में आते ही जिम्मेदारियाँ बाँट लीं। नीलम सुबह बच्चों का टिफिन बनाती, मीरा की होमवर्क कॉपी चेक करती, और स्कूल की नोटिस डायरी पढ़ती। पायल कमला देवी की दवाइयाँ समय पर देती, उनके पैरों में तेल मालिश करती, और रात को उनके पास बैठकर कथा सुनाती, ताकि उन्हें नींद आ जाए। दोनों ने अपना घर भी संभाला, अपने बच्चों को भी, लेकिन अभय के घर का दीया भी बुझने नहीं दिया।

कुछ ही दिनों में पड़ोसियों की बातें बदलने लगीं। जो लोग पहले सहानुभूति में सिर्फ “बेचारा” कहकर निकल जाते थे, अब कहते, “ये तो सच में घर की लक्ष्मी हैं… ऐसी भाभियाँ किस्मत वालों को मिलती हैं।” कोई कहता, “बहन का फर्ज तो बहन निभाए, पर यहाँ तो भाभियाँ बहन से बढ़कर बन गईं।” और कोई धीरे से जोड़ देता, “आजकल अपने ही नहीं पूछते, ये तो पराए होकर भी अपने हैं।”

पर हर अच्छा काम आसान नहीं होता। नीलम और पायल के अपने घरों में भी खटास उभरने लगी। नरेश ने एक दिन नीलम से कहा, “हर वक्त वहीं रहती हो… अपने बच्चों का भी तो ध्यान रखो।” रितेश ने पायल को टोका, “हमारा भी घर है… तुम वहाँ ज्यादा समय दे रही हो।” दोनों बहुएँ चुप रहीं, लेकिन रात को एक-दूसरे के सामने बैठकर उनके मन के छाले फूट पड़े।

नीलम बोली, “कभी-कभी लगता है लोग रिश्तों को तराजू पर तौलते हैं। लेकिन जब घर में कोई टूट रहा हो, तो तौलने का वक्त नहीं होता।” पायल ने आँखें पोंछते हुए कहा, “मैं बस यही सोचती हूँ… अगर कल को मेरे साथ कुछ हो जाए, तो क्या मेरी बेटी को भी कोई ऐसे संभालेगा?” नीलम ने उसका हाथ पकड़ लिया, “इसलिए तो हम यह कर रहे हैं। ताकि बच्चों के मन में भरोसा रहे कि दुनिया में रिश्ते अभी भी जिंदा हैं।”

कमला देवी की तबीयत धीरे-धीरे और बिगड़ने लगी। बेटी की मौत का दुख, बहू का न होना, और घर का सन्नाटा—सब मिलकर उन्हें अंदर से खा रहा था। एक दिन अचानक उनकी सांसें तेज चलने लगीं, हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। अभय घबरा गया। अस्पताल ले जाने की तैयारी हुई। नीलम ने अभय के माथे पर हाथ रखकर कहा, “घबराओ मत, हम हैं।” पायल बच्चों को संभालने लगी। मीरा को गले लगाकर बोली, “देखो, दादी ठीक हो जाएंगी। तुम अपने भाई का हाथ मत छोड़ना।”

पर अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “इनका शरीर कमजोर है। अब देखभाल ही सबसे बड़ी दवा है।” अभय पूरी रात अस्पताल में रहा। सुबह जब लौटा तो नीलम ने उसे चाय पकड़ाई और बोली, “एक काम करो, अब से सप्ताह में दो दिन तुम भी बच्चों के साथ पार्क जाओ। उन्हें लगे कि उनका पापा सिर्फ दुख नहीं, खुशियाँ भी दे सकता है।”

अभय के लिए यह बात नई थी। उसने पहले कभी नहीं सोचा था कि दुख में भी बच्चों को मुस्कुराना सिखाया जा सकता है। अगले रविवार वह बच्चों को पार्क ले गया। आरव ने पहली बार झूले पर हँसकर कहा, “पापा… मम्मी होती तो…” फिर वाक्य अधूरा रह गया। अभय ने उसे झूले से उतारा, गोद में बैठाया और कहा, “मम्मी हमसे बहुत प्यार करती थीं। हम उन्हें रोकर नहीं, अच्छा बनकर याद करेंगे।” मीरा दूर खड़ी यह सब देख रही थी, उसकी आँखें भीग गईं—शायद पहली बार उसे लगा कि पापा भी टूटे हैं, पर कोशिश कर रहे हैं।

कुछ महीनों बाद घर में धीरे-धीरे रौनक लौटने लगी। मीरा ने फिर से ड्रॉइंग शुरू कर दी। आरव स्कूल की कविता प्रतियोगिता में भाग लेने लगा। कमला देवी कभी-कभी नीलम के हाथ का खाना खाकर कहतीं, “बहू, तुम तो मेरी बेटी जैसी हो।” नीलम हँसकर कहती, “माँजी, बेटी नहीं… आपकी बहू ही ठीक हूँ, बस आपके हिस्से की भी।”

समय अपनी चाल से चलता रहा। अभय ने कॉलेज की नौकरी छोड़ने का फैसला नहीं किया, लेकिन उसने अपने काम का तरीका बदल दिया। पहले वह घर से भागकर काम में छिप जाता था, अब वह काम से लौटकर घर में अपनी मौजूदगी जोड़ता था। बच्चों के साथ बैठकर पढ़ाई पूछता, माँ से बात करता। उसे समझ आने लगा कि जिम्मेदारी सिर्फ पैसा कमाना नहीं, भावनाएँ संभालना भी है।

इधर, नीलम के बेटे विवान ने कॉलेज में एडमिशन लिया, पायल की बेटी ईशा बारहवीं में आ गई। दोनों के घरों में भी बदलाव आया। नरेश और रितेश को समझ आने लगा कि उनकी पत्नियाँ किसी पर एहसान नहीं कर रहीं, बल्कि परिवार को जोड़ रही हैं। एक दिन नरेश ने खुद अभय से कहा, “भाई, हम भी कभी-कभी कमला माँ के पास आ जाया करेंगे। अब सिर्फ बहुओं पर मत छोड़ो।” अभय ने नम आँखों से सिर हिलाया।

कमला देवी एक दिन रात में नीलम का हाथ पकड़कर बोलीं, “मैंने ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा, पर आज समझ आया कि रिश्ते खून से नहीं, निभाने से बनते हैं।” नीलम ने उनके माथे को चूमा, “माँजी, आप बस हमारे साथ रहिए।”

पर जीवन हर बार इतना समय नहीं देता जितना हम चाहते हैं। एक सुबह कमला देवी ने चाय नहीं पी। उनकी आँखें खुलीं, लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाईं। डॉक्टर आया, उसने धीरे से कहा, “अब ज्यादा देर नहीं।” अभय का दिल बैठ गया। नीलम और पायल दोनों उनके पास बैठ गईं। कमला देवी ने कांपते हाथ से अभय का हाथ पकड़कर बस इतना कहा, “बेटा… बच्चों को… अकेला मत छोड़ना।” और फिर उनकी पलकों ने हमेशा के लिए विश्राम ले लिया।

घर में फिर सन्नाटा उतर आया। लेकिन इस बार वह सन्नाटा अकेलेपन वाला नहीं था—यह सन्नाटा एक साथ रोने वालों का था। अंतिम संस्कार के बाद जब लोग लौटे, किसी ने कहा, “आजकल अपने बेटे भी माँ के साथ नहीं रहते, पर ये बहुएँ… इनका दिल बड़ा है।” किसी ने दबी आवाज़ में कहा, “ऐसे रिश्ते भगवान सबको दें।”

कमला देवी के जाने के बाद अभय ने कुछ समय के लिए कॉलेज से लंबी छुट्टी ले ली। उसने तय किया कि अब वह बच्चों के साथ वक्त बिताएगा। मीरा को उसकी माँ की यादें सुनाता, आरव को साइकिल चलाना सिखाता। नीलम और पायल भी पहले की तरह आती-जाती रहीं, पर अब वे अभय को मजबूत बनते देख संतुष्ट थीं।

कुछ साल बीत गए। मीरा ने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। आरव ने क्रिकेट में रुचि पकड़ ली। एक दिन नीलम ने अभय से कहा, “भाई साहब, अब मीरा बड़ी हो रही है… उसके लिए भी सोचो।” अभय घबरा गया। “मैं… मैं कैसे?” पायल बोली, “तुम अकेले नहीं हो। हम हैं ना। जैसे हमने उसके बचपन को संभाला, वैसे ही उसकी जिंदगी की शुरुआत भी साथ करेंगे।”

मीरा की शादी का रिश्ता आया। लड़का विनीत था, पढ़ा-लिखा, सरल स्वभाव का। अभय ने पहले डरते-डरते बात की। मीरा ने सिर्फ एक बात कही, “पापा, मुझे ऐसा घर चाहिए जहाँ मुझे इंसान समझा जाए, सिर्फ जिम्मेदारी नहीं।” अभय ने मुस्कुराकर कहा, “तू जो चाहती है, वही होगा। अब तेरा पापा पुराने डर वाला नहीं रहा।”

शादी का दिन आया। घर में सजावट हुई। बारातियों का स्वागत, रस्में, विदाई—सब इतनी सुंदरता से हुआ कि लोग दंग रह गए। किसी ने कहा, “वाह! भाई की अधूरी जिम्मेदारी को पूरा करने वाली भाभियों का दिल सच में बहुत बड़ा है।” किसी ने जोड़ दिया, “ये तो बहन से बढ़कर बहन बन गईं।”

विदाई के समय मीरा रो रही थी। नीलम ने उसका आँचल पकड़कर कहा, “रो मत… तू जा रही है, पर हमारा प्यार तेरे साथ जाएगा।” पायल ने उसके माथे पर हाथ रखा, “और जब भी मन भारी हो, फोन कर देना। ये घर तेरा भी है।”

मीरा ने दोनों के पैर छुए और कहा, “आप दोनों मेरी माँ जैसी हो।” अभय की आँखों से आँसू बह निकले। वह बोला, “मैंने ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया, पर इन रिश्तों ने मुझे फिर से जीना सिखाया।”

शादी के बाद रात को घर खाली-खाली लग रहा था। अभय बरामदे में बैठा था। नीलम और पायल उसके पास आकर बैठ गईं। नीलम ने कहा, “देखो अभय, कभी-कभी एक छोटी सी बात पर रिश्तों में दरार आ जाती है। उसे भरने के लिए किसी एक को दिल बड़ा करना पड़ता है।” पायल बोली, “और कभी-कभी… दिल बड़ा करने वाला एक नहीं, कई लोग होते हैं। बस सबको वही याद रखना चाहिए।”

अभय ने गहरी सांस ली और बोला, “आज मुझे समझ आया कि परिवार का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं, साथ निभाना है। जो रिश्ते दुख में साथ खड़े हों, वही असली रिश्ते हैं।”

नीलम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “और जो रिश्ते बोझ नहीं, सहारा बनें—वही घर को घर बनाते हैं।”

उस रात अभय पहली बार बिना डर के सो पाया। क्योंकि अब उसके पास सिर्फ यादें नहीं थीं, बल्कि ऐसे लोग थे जिन्होंने साबित कर दिया था कि दुनिया में अभी भी कुछ रिश्ते निःस्वार्थ होते हैं—और वही रिश्ते टूटे हुए घरों को भी फिर से जोड़ देते हैं।

लेखिका : सुषमा गुप्ता


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