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एक आँगन, दो तराजू

 रामकिशन जी के दालान में आज सुबह से ही गहमागहमी का माहौल था। उनके चेहरे की चमक देखते ही बन रही थी। गाँव के सरपंच से लेकर आम किसान तक, हर कोई उन्हें बधाइयाँ देने आ रहा था। कारण भी कुछ ऐसा ही था; उनकी सबसे महंगी और राजस्थानी नस्ल की घोड़ी 'चमेली' ने रात ही एक बेहद खूबसूरत बछेरी (मादा बच्चा) को जन्म दिया था। घर के नौकरों को आदेश दे दिया गया था कि चमेली और उसकी बछेरी की देखभाल में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। रामकिशन जी खुद अपने हाथों से चमेली को गुड़, चना और मेवे खिला रहे थे। उनके बड़े बेटे ने पूछा, "पिताजी, आप इस बछेरी के आने पर इतने खुश क्यों हैं?" रामकिशन जी ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "अरे मूर्ख! यह कोई मामूली बछेरी नहीं है। यह बड़ी होकर चमेली की तरह ही शानदार बनेगी। यह हमारे अस्तबल की शान बढ़ाएगी, और आगे चलकर हमें और भी बेशकीमती नस्लें देगी। यह तो साक्षात लक्ष्मी है, जो हमारे घर धन और शोहरत दोनों लाएगी।"


यह सब घर की दस साल की बेटी, मीनाक्षी, बड़े ध्यान से देख रही थी। मीनाक्षी घर की बड़ी बेटी थी और इन दिनों अपनी माँ, कांता की देखभाल कर रही थी। कांता गर्भवती थी और किसी भी समय अपने दूसरे बच्चे को जन्म दे सकती थी। मीनाक्षी ने देखा कि कैसे अस्तबल में बछेरी के लिए मखमल के गद्दे बिछाए गए थे, ताकि उसे ठंड न लग जाए। पूरा घर उत्सव में डूबा था। शाम होते-होते कांता को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। घर की बूढ़ी दादी और गाँव की दाई को तुरंत बुलाया गया। बाहर रामकिशन जी और उनके बेटे बेचैनी से टहल रहे थे। दादी लगातार भगवान से मन्नतें मांग रही थीं कि इस बार घर में कुल का दीपक ही जले, क्योंकि एक बेटी तो पहले से ही थी।


देर रात कमरे से एक नवजात की रुलाई गूंजी। दादी ने दाई से पूछा, "क्या हुआ है?" दाई ने धीमी और डरी हुई आवाज़ में कहा, "बधाई हो, बेटी हुई है।" यह शब्द सुनते ही जैसे पूरे घर में सन्नाटा छा गया। दादी ने अपना माथा पीट लिया और बड़बड़ाने लगीं, "हे भगवान! मेरे ही कर्म खोटे थे जो यह दूसरी पत्थर की सिल मेरे सीने पर रख दी। अब इसकी शादी, दहेज और दुनिया भर के खर्च कौन उठाएगा!" बाहर बैठे रामकिशन जी के चेहरे का रंग उड़ गया। वे बिना कुछ कहे, बिना अपनी पत्नी या बच्ची का मुँह देखे, अपने कमरे में चले गए और ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर लिया।


अगले कुछ दिन उस घर में किसी बुरे सपने की तरह बीते। जहाँ एक तरफ अस्तबल में चमेली और उसकी बछेरी की मालिश हो रही थी, उन्हें पौष्टिक आहार और साफ पानी समय-समय पर दिया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ कांता के कमरे में एक अजीब सी उदासी और खामोशी पसरी थी। प्रसव के बाद एक माँ को जिस पोषण, हल्दी-सौंफ के पानी और घी-पंजीरी की ज़रूरत होती है, वह कांता के नसीब में नहीं था। उसे रूखी रोटियां और सूखी सब्जी दी जा रही थी। कोई भी रिश्तेदार बच्ची को लाड़ करने नहीं आया। कांता चुपचाप अपने आँसुओं को पीती रही और अपनी नवजात बच्ची को सीने से लगाए पड़ी रही। उसे ऐसा लग रहा था मानो उसने बेटी नहीं, कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।


मीनाक्षी का बालमन यह सब देखकर बुरी तरह आहत था। वह कभी अस्तबल में जाती, जहाँ चमेली की बछेरी को बड़े प्यार से सहलाया जा रहा था, और फिर अपनी माँ के कमरे में आती, जहाँ सन्नाटा और रुलाई के अलावा कुछ नहीं था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक ही घर में दो नए जीवों के आने पर इतना बड़ा भेदभाव क्यों हो रहा है। वह अपनी माँ के पास बैठी और उनके आँसू पोंछते हुए बोली, "माँ, आप रो क्यों रही हो? मेरी छोटी बहन तो बहुत प्यारी है, बिल्कुल एक परी जैसी। फिर दादी और पिताजी इतने नाराज़ क्यों हैं?"


कांता ने अपनी बेटी को गले लगा लिया और रुंधे हुए गले से बोली, "बेटा, हमारे समाज में बेटियों को पराया धन माना जाता है। लोगों को लगता है कि बेटियां सिर्फ एक ज़िम्मेदारी और बोझ होती हैं। इनकी शादी में बहुत खर्च होता है और ये दूसरे घर चली जाती हैं। इसीलिए तुम्हारे पिताजी और दादी दुखी हैं।"


यह सुनकर मीनाक्षी की आँखों में एक अजीब सी चमक और गुस्सा आ गया। वह तुरंत उठी और दालान में बैठे अपने पिताजी और दादी के पास पहुँच गई। वहां रामकिशन जी अपने दोस्तों के साथ बछेरी के नामकरण की चर्चा कर रहे थे। मीनाक्षी ने बिना डरे, अपनी तेज़ और मासूम आवाज़ में पूछा, "पिताजी, क्या चमेली की बछेरी बड़ी होकर हमारी ही होकर रहेगी?"


रामकिशन जी अचानक हुए इस सवाल से चौंके और बोले, "नहीं बेटा, जब यह बड़ी हो जाएगी, तो हम इसे किसी अच्छे घुड़सवार को बेच देंगे या यह किसी और के अस्तबल की शोभा बढ़ाएगी।"


मीनाक्षी ने तुरंत दूसरा सवाल दागा, "तो फिर यह भी तो पराया धन हुई ना? जब यह बड़ी होकर किसी और के अस्तबल में जाएगी और बच्चे पैदा करेगी, तो फिर इसके पैदा होने पर आपने ढोल क्यों बजवाए? और मेरी बहन, जो एक इंसान है, उसके पैदा होने पर माँ को खाने के लिए घी तक क्यों नहीं दिया जा रहा? क्या मेरी छोटी बहन बड़ी होकर कुछ नहीं करेगी? क्या उसका ब्याह नहीं होगा? क्या वह माँ नहीं बनेगी? पिताजी, अगर सिर्फ इस बात से कीमत तय होती है कि कौन हमें क्या देगा, तो फिर हम इंसानों से तो जानवर ही बहुत अच्छे हैं। चमेली को तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसने बछेरी को जन्म दिया है, वह तो उसे उतना ही प्यार कर रही है।"


मीनाक्षी के इस एक सवाल ने जैसे समय को वहीं रोक दिया। रामकिशन जी के हाथ से चाय का कुल्हड़ छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। दालान में बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गए। किसी के पास उस दस साल की बच्ची के मासूम लेकिन ज़हरीले तीर जैसे सवाल का कोई जवाब नहीं था। दादी की नज़रें शर्म से झुक गईं। रामकिशन जी को अचानक महसूस हुआ कि उनके अंदर का इंसान कितना मर चुका था, जो एक बेज़ुबान जानवर की कीमत तो समझ रहा था, लेकिन अपनी ही खून, अपनी ही बेटी की कीमत को चंद सिक्कों और समाज के खोखले रीति-रिवाजों के तराजू में तौल रहा था। मीनाक्षी का वह सवाल सिर्फ उस घर की दीवारों से नहीं टकराया था, बल्कि समाज की उस दोहरी और सड़ी-गली मानसिकता के मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा था।


क्या आपको नहीं लगता कि मीनाक्षी का सवाल आज भी हमारे समाज के कई बंद दरवाज़ों पर दस्तक दे रहा है? आप इस दोहरी मानसिकता के बारे में क्या सोचते हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें, आपकी एक टिप्पणी समाज का नज़रिया बदलने की ताकत रखती है।


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मूल लेखिका : - सरिता रानी


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