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इंसानियत का कोई कैलेंडर नहीं होता

 मालती और राजू ठिठक कर रुक गए। अलका बिना एक पल गंवाए तेजी से स्टोर रूम की तरफ दौड़ी। उसने यह भी नहीं देखा कि उसे कटर नहीं मिल रहा है। उसने रसोई से चाकू उठाया और बड़ी बेरहमी से उन डिब्बों के टेप काट डाले जिन्हें उसने बड़े सलीके से पैक किया था। उसने डिब्बे से कबीर की सबसे अच्छी और गर्म जैकेट निकाली, एक ऊनी टोपी और मोज़े भी निकाले।


वह दौड़ती हुई वापस दरवाजे पर आई। उसने खुद अपने हाथों से उस कांपते हुए बच्चे को वह गर्म जैकेट पहनाई। ऊनी टोपी उसके सिर पर रखी। जैकेट पहनते ही राजू की आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने राहत की एक बड़ी सांस ली और मुस्कुराते हुए अलका की तरफ देखा। उसकी वह निश्छल मुस्कान अलका को उसकी अब तक की तमाम सालगिरहों और अनाथालय में किए गए सारे दान से कहीं ज्यादा कीमती लगी।


अलका ने मालती को अंदर बुलाया और रसोई में जाकर अपने हाथों से उन दोनों के लिए गर्मागरम चाय और नाश्ता तैयार किया। जब मालती और राजू खा-पीकर और ढेरों दुआएं देकर वहां से गए, तो अलका की आंखों में आंसू थे,

दिसंबर का महीना अपने शबाब पर था। देहरादून की सर्द हवाएं हड्डियों को कंपा देने वाली थीं। अलका अपने आलीशान घर के ड्राइंग रूम में बैठी हीटर की गर्माहट के बीच अपनी सुबह की अदरक वाली चाय का आनंद ले रही थी। उसका जीवन बेहद व्यवस्थित और खुशहाल था। पति सुधीर एक नामी कंपनी में बड़े पद पर थे और दोनों बच्चे, कबीर और सान्या, शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ते थे। अलका को अपने जीवन के अनुशासन और उसूलों पर बहुत गर्व था।


अगले रविवार को सुधीर और अलका की शादी की पंद्रहवीं सालगिरह थी। हर साल की तरह इस साल भी अलका ने एक नियम बना रखा था कि वह अपनी सालगिरह के दिन ही शहर के बड़े अनाथालय में जाकर गरीबों को खाना खिलाएंगी और सर्दियों के कपड़े दान करेंगी। पिछले तीन दिनों से वह इसी काम में जुटी थी। उसने बच्चों के सारे छोटे हो चुके लेकिन अच्छी हालत वाले स्वेटर, जैकेट और कुछ नए कम्बल बड़े सलीके से गत्ते के बड़े-बड़े डिब्बों में पैक कर दिए थे। डिब्बों पर भूरे रंग का चौड़ा टेप लगाकर उन्हें स्टोर रूम में रखवा दिया गया था ताकि रविवार को उन्हें सीधे गाड़ी में रखा जा सके। अपनी इस व्यवस्था को देखकर अलका को एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि मिल रही थी कि वह समाज के लिए कितना कुछ कर रही है।


चाय की चुस्कियां लेते हुए अलका ने शीशे की बड़ी खिड़की से बाहर देखा। घना कोहरा छाया हुआ था और बाहर का तापमान शून्य के करीब महसूस हो रहा था। तभी उसने देखा कि उनके मोहल्ले में झाड़ू लगाने वाली मालती गेट के पास खड़ी है। मालती के साथ उसका छह साल का पोता राजू भी था। राजू के शरीर पर मात्र एक सूती फटी हुई शर्ट थी और वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था। उसके होंठ नीले पड़ गए थे और वह बार-बार अपने छोटे-छोटे हाथों को रगड़ कर खुद को गर्म करने की नाकाम कोशिश कर रहा था।


मालती ने झिझकते हुए शीशे के दरवाजे पर दस्तक दी। अलका ने थोड़ी सी झुंझलाहट के साथ दरवाजा खोला और कहा, "क्या बात है मालती? इतनी सुबह-सुबह कैसे आ गई?"


मालती ने हाथ जोड़कर कांपती हुई आवाज़ में कहा, "मेमसाब जी, माफ करना। आज ठंड बहुत कड़ाके की है। रात भर ये बच्चा सर्दी से ठिठुरता रहा। इसे निमोनिया ना हो जाए, बस यही डर लग रहा है। आपके बच्चों का कोई पुराना ऊनी स्वेटर या जैकेट हो तो दे दीजिये। बड़ा पुन्न लगेगा।"


अलका ने तुरंत अपने उसूलों का चश्मा पहन लिया। उसने कड़क आवाज़ में कहा, "मालती, तुम्हें तो पता है कि मैं ऐसे रोज़-रोज़ दान नहीं करती। हमारे घर का नियम है। रविवार को हमारी सालगिरह है और मैंने सारे पुराने-नए कपड़े, स्वेटर सब कुछ डिब्बों में पैक करके उन पर टेप लगा दिया है। वो सब अनाथालय के लिए हैं। अब मैं वो पैकिंग बीच में नहीं खोल सकती। तुम ऐसा करना, रविवार की शाम को आना, अगर कुछ बच गया तो मैं तुम्हें दे दूंगी।"


मालती का चेहरा उतर गया। उसने निराश आँखों से अलका को देखा, एक गहरी सांस ली और बोली, "ठीक है मेमसाब, जैसी आपकी मर्जी।" वह राजू का हाथ पकड़कर मुड़ने लगी।


तभी ठंड से ठिठुरते हुए राजू ने अपनी दादी से बड़ी ही मासूमियत से पूछा, "दादी, ये रविवार आने में अभी कितने दिन हैं? क्या तब तक मुझे ठंड नहीं लगेगी? मेरी तो आज ही कुल्फी जम रही है दादी। क्या ये सर्द हवा भी रविवार को ही चलेगी?"


राजू की आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन अलका के कानों में वो किसी बम के धमाके की तरह गूंजी। उस मासूम के सवाल ने अलका के भीतर तक झकझोर दिया। उसके कदम वहीं ठिठक गए। एक छह साल के बच्चे ने अनजाने में उसके अहंकार, उसके दिखावटी उसूलों और उसके 'कैलेंडर वाले दान' की धज्जियां उड़ा दी थीं। अलका को अचानक महसूस हुआ कि वह कितनी खोखली हो चुकी है। वह अनाथालय में दान इसलिए नहीं कर रही थी कि उसे लोगों की मदद करनी थी, बल्कि इसलिए कर रही थी ताकि उसकी सालगिरह पर लोग उसकी तारीफ करें। वह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए दान कर रही थी, इंसानियत के लिए नहीं।


राजू का कांपता हुआ शरीर और उसका वह सवाल— "क्या ठंड भी रविवार को ही लगेगी?"—अलका के दिल में तीर की तरह चुभ गया।


"रुको मालती!" अलका के मुंह से अचानक तेज आवाज़ निकली।


मालती और राजू ठिठक कर रुक गए। अलका बिना एक पल गंवाए तेजी से स्टोर रूम की तरफ दौड़ी। उसने यह भी नहीं देखा कि उसे कटर नहीं मिल रहा है। उसने रसोई से चाकू उठाया और बड़ी बेरहमी से उन डिब्बों के टेप काट डाले जिन्हें उसने बड़े सलीके से पैक किया था। उसने डिब्बे से कबीर की सबसे अच्छी और गर्म जैकेट निकाली, एक ऊनी टोपी और मोज़े भी निकाले।


वह दौड़ती हुई वापस दरवाजे पर आई। उसने खुद अपने हाथों से उस कांपते हुए बच्चे को वह गर्म जैकेट पहनाई। ऊनी टोपी उसके सिर पर रखी। जैकेट पहनते ही राजू की आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने राहत की एक बड़ी सांस ली और मुस्कुराते हुए अलका की तरफ देखा। उसकी वह निश्छल मुस्कान अलका को उसकी अब तक की तमाम सालगिरहों और अनाथालय में किए गए सारे दान से कहीं ज्यादा कीमती लगी।


अलका ने मालती को अंदर बुलाया और रसोई में जाकर अपने हाथों से उन दोनों के लिए गर्मागरम चाय और नाश्ता तैयार किया। जब मालती और राजू खा-पीकर और ढेरों दुआएं देकर वहां से गए, तो अलका की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में एक ऐसी गर्माहट थी जो ड्राइंग रूम के हीटर से कहीं ज्यादा सुकून देने वाली थी। आज उसने जान लिया था कि भूख और सर्दी का कोई कैलेंडर नहीं होता, और किसी की मदद करने के लिए किसी खास दिन या सालगिरह का इंतज़ार करना इंसानियत नहीं है।


तभी पीछे से सुधीर आए और उन्होंने अलका के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "आज जो तुमने किया है, उससे बेहतर तरीके से हम अपनी सालगिरह मना ही नहीं सकते थे।" अलका ने मुस्कुराते हुए हामी भरी, क्योंकि आज असल में एक इंसान का जन्म हुआ था।


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