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फासलों के बीच पनपता अहसास

 आज बरसों पुरानी अपनी एक किताब के पन्ने पलटते हुए अचानक एक सूखा हुआ गुलाब का फूल नीचे गिर पड़ा। उस सूखे हुए फूल को देखते ही मुझे अवंतिका याद आ गई। हाँ, अवंतिका... मेरा वो बचपन का प्यार, जिसे मैंने कभी शब्दों में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मेरी खामोशियों ने हमेशा उसी का नाम पुकारा। दूधिया गोरी रंगत, बड़ी-बड़ी गहरी आंखें और एक बेहद शांत, सौम्य स्वभाव। बचपन की उसकी एक आदत अब भी ज्यों की त्यों थी—जब भी वह बात करते हुए थोड़ी झेंप जाती, तो अपनी झुकी हुई पलकों के साथ, माथे पर झूलती अपनी रेशमी लटों को उंगलियों से धीरे से कान के पीछे अड़ा लेती। उफ्फ! उसकी वो सादगी भरी अदा देखकर तो आज भी मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो जाती थीं।


बचपन से ही मैं उसके आगे-पीछे घूमता रहता था। हम दोनों के घर एक ही मोहल्ले में आमने-सामने थे। बीच में बस एक संकरी सी पक्की सड़क थी, जो हमारे घरों को बाँटती थी। बचपन में हम उस सड़क को दिन में दसियों बार नापते थे। कभी किसी छोटी सी बात पर उससे खूब झगड़ा होता, तो कभी घंटों बैठकर एक-दूसरे को स्कूल के किस्से सुनाए जाते। उसकी वो मासूम सी नजरें तब भी यह बिना कहे बयां कर देती थीं कि उसे मेरा आस-पास रहना बहुत पसंद था। मैं भी मोहल्ले के लड़कों से लड़ पड़ता था अगर कोई उसे कुछ कह दे। 


लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, हमारे बीच की वो बेबाक बातचीत कम होती चली गई। बचपन में हमारी जितनी ज्यादा बातें होती थीं, जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वो उतनी ही कम हो गईं। अब हम एक-दूसरे के घर यूँ ही बेधड़क नहीं जा सकते थे। बीच की वो सड़क, जो कभी हमारा खेल का मैदान हुआ करती थी, अब समाज की एक अदृश्य मर्यादा की लकीर बन गई थी। 


अब बस कभी समय मिलता, तो मैं अपनी छत की मुंडेर से उसके घर की तरफ ताक-झांक करता रहता, केवल उसके एक दीदार के लिए। जब कभी वो कपड़े सुखाने या तुलसी में जल चढ़ाने अपनी छत पर आती, तो हमारे बीच नजरों का वो मीठा सा युद्ध शुरू हो जाता। मैं उसे देखता, वो मुझे देखती, फिर अचानक वो अपनी लटों को कान के पीछे करती और शर्मा कर नीचे चली जाती। इन अनकहे और खामोश पलों में ही हमारे प्यार की एक पूरी दुनिया बस चुकी थी।


लेकिन जिंदगी हमेशा खामोश नजारों से नहीं चलती। एक दिन हमारे इस मूक प्रेम कहानी में एक ऐसा तूफान आया जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। सर्दियों की एक ठंडी शाम थी। मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, तभी बाहर से कुछ शोर और रोने की आवाजें आईं। मैं दौड़कर बालकनी में गया तो देखा कि अवंतिका के घर के बाहर भीड़ लगी है। अवंतिका के पिता, जिन्हें हम सभी सम्मान से 'मास्टर जी' कहते थे, उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा था। अवंतिका का कोई भाई नहीं था और उसकी माँ बदहवास होकर रो रही थीं। अवंतिका भी डरी-सहमी सी दरवाजे पर खड़ी कांप रही थी। 


बिना एक पल सोचे, मैं घर से बाहर भागा। मैंने मास्टर जी को अपनी गाड़ी में लिटाया और सीधे शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तरफ गाड़ी दौड़ा दी। रास्ते भर अवंतिका पीछे बैठी रो रही थी। मैंने गाड़ी चलाते हुए पीछे मुड़कर देखा और पहली बार इतने सालों की खामोशी तोड़ते हुए कहा, "रो मत अवंतिका, मैं हूँ ना। मास्टर जी को कुछ नहीं होगा।" मेरे उन चंद शब्दों ने शायद उसे वो हिम्मत दी जिसकी उसे उस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी।


अस्पताल में अगले तीन दिन बहुत भारी गुजरे। मास्टर जी आईसीयू में थे। दवाइयों का इंतजाम करने से लेकर, अस्पताल के भारी-भरकम बिलों को चुकाने और रात-रात भर आईसीयू के बाहर जागने तक, मैंने एक बेटे की तरह हर जिम्मेदारी निभाई। मेरी अपनी माँ भी अवंतिका की माँ को ढांढस बंधाने के लिए दिन-भर अस्पताल में ही रहती थीं। इन तीन दिनों में अवंतिका ने मुझे सिर्फ एक पड़ोसी या बचपन के दोस्त के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में देखा जो उसके परिवार के लिए एक मजबूत ढाल बनकर खड़ा था। 


एक रात जब मैं अस्पताल के कॉरिडोर में कॉफी पी रहा था, अवंतिका मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसकी आंखें सूजी हुई थीं। उसने मुझे देखा, अपनी वो लट कान के पीछे की और रुंधे हुए गले से बोली, "अगर तुम नहीं होते, तो शायद मैं अपने पापा को खो देती। मुझे नहीं पता कि मैं तुम्हारा यह अहसान कैसे चुकाऊंगी।"


मैंने कॉफी का कप नीचे रखा और उसके आंसुओं को देखते हुए कहा, "अपनों के बीच अहसान नहीं होते, अवंतिका। मैंने वो किया जो मेरा दिल हमेशा से तुम्हारे लिए करना चाहता था—तुम्हारा ख्याल रखना।"


उस दिन हमारी नजरें मिलीं, लेकिन इस बार कोई झिझक नहीं थी। उन नजरों में एक गहरी कृतज्ञता और एक ऐसा प्यार था, जिसे अब किसी खामोशी की चादर की जरूरत नहीं थी। 


मास्टर जी जब ठीक होकर घर लौटे, तो दोनों परिवारों के बीच का रिश्ता पूरी तरह बदल चुका था। बीच की वो सड़क अब फासला नहीं रही थी। मास्टर जी ने खुद एक दिन मेरे पिता से बात की। उन्होंने कहा कि जिस लड़के ने बिना किसी रिश्ते के उनके परिवार को इतने बुरे वक्त में संभाल लिया, उससे बेहतर जीवनसाथी उनकी बेटी के लिए और कोई हो ही नहीं सकता। जब मेरी माँ ने मेरे कमरे में आकर मुझे यह बात बताई, तो मुझे लगा जैसे मेरी बचपन से लेकर जवानी तक की सारी अनकही मन्नतें पूरी हो गई हों।


आज जब मैं उस सूखे हुए गुलाब को देखता हूँ, तो अवंतिका रसोई से चाय लेकर आती है। वो आज भी जब मुझे देखती है, तो अपनी वही लट कान के पीछे अड़ा लेती है। हमारा वो खामोश प्यार, जो कभी सिर्फ छतों और खिड़कियों से पनपा था, आज एक खूबसूरत परिवार में बदल चुका है। 


आप अपने प्यार से क्या चाहते हैं? सिर्फ मीठी बातें या एक ऐसा इंसान जो आपके परिवार को अपना मान कर आपके बुरे वक्त में साथ खड़ा रहे? हमें अपने विचार जरूर बताएं।


“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद”


 लेखिका : लक्ष्मी अग्रवाल


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