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स्वाभिमान की चौखट: एक बेगानी बेटी का सफर

 पति के अचानक हुए देहांत और ससुराल वालों के धोखे ने सुधा से उसकी छत छीन ली थी। दुनिया की ठोकरें खाने जेठ की चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ, अपने दोनों हाथों में सात साल के आरव और पांच साल की पीहू का हाथ पकड़े जब सुधा अपने मायके के दरवाजे पर पहुंची, तो उसकी आंखें आंसुओं और थकान से भारी हो चुकी थीं। के बाद उसे सिर्फ अपना मायका याद आया था, जहां उसने अपना बचपन बिताया था। दरवाजे की आहट सुनकर अंदर से उसकी बूढ़ी और अस्थमा की मरीज मां, कौशल्या देवी बाहर आईं। अपनी लाडली बेटी को इस बदहाल अवस्था में देखकर मां का कलेजा फट गया। उन्होंने दौड़कर सुधा और दोनों बच्चों को अपने गले से लगा लिया। मां के सीने से लगते ही सुधा का सालों का दर्द आंसुओं के रूप में फूट पड़ा। मां रोते हुए बस इतना ही कह पाई, "तू आ गई मेरी बच्ची, अब कहीं जाने की जरूरत नहीं है। यह तेरा ही घर है।"

लेकिन मां का यह प्यार और आश्वासन उस घर की दीवारों से टकराकर दम तोड़ने वाला था। आंगन के दूसरे कोने से सुधा की दोनों भाभियों, मीनाक्षी और रश्मि की तल्ख आवाजें आना शुरू हो गईं। वे दोनों बरामदे में खड़ी मुंह बिचकाते हुए सुधा को ऊपर से नीचे तक घूर रही थीं। मीनाक्षी ने रश्मि की तरफ देखकर तंज कसते हुए कहा, "लो, आ गई महारानी! अब इस घर में यही देखना बाकी रह गया था। वैसे ही महंगाई ने कमर तोड़ रखी है, हमारे अपने बच्चों के खर्चे पूरे नहीं होते और अब ये तीन नए लोग आ धमके। इनका खर्चा क्या आसमान से गिरेगा?" रश्मि ने भी सुर में सुर मिलाते हुए कहा, "और नहीं तो क्या! हम लोग क्या यहां कोई धर्मशाला खोल कर बैठे हैं? भाइयों की कमाई क्या इन्हीं पर लुटाने के लिए है?"

भाभियों के ये शब्द सुधा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे। मां ने अपनी बहुओं को डपटने की कोशिश की, लेकिन उम्र और बीमारी से जर्जर शरीर वाली कौशल्या देवी की आवाज में अब वो रुतबा नहीं बचा था जो कभी हुआ करता था। खांसते-खांसते वो निढाल हो गईं। सुधा समझ गई थी कि जिस आंगन में उसने भाई के साथ खेलकर बचपन बिताया था, वो आंगन अब उसका नहीं रहा। वह वहां एक अनचाही मेहमान, एक बोझ बन चुकी थी।

सुधा ने अपने आंसुओं को पीते हुए भाभियों के सामने हाथ जोड़ लिए। उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसमें एक मां की मजबूरी थी। "भाभियों, मैं जानती हूं कि मेरे आने से आप लोगों की परेशानियां बढ़ेंगी। लेकिन मेरा और मेरे बच्चों का इस दुनिया में अब कोई और ठिकाना नहीं है। मुझे बस कुछ दिनों के लिए अपने आंगन के एक कोने में आसरा दे दीजिए। मैं यहां बैठकर मुफ्त की रोटियां नहीं तोडूंगी। मुझे बस चार-पांच दिन का वक्त दे दीजिए, मैं कोई न कोई काम ढूंढ लूंगी और यहां से चली जाऊंगी।"

मीनाक्षी ने मुंह बनाते हुए कहा, "ठीक है, जब तक काम नहीं मिलता, तब तक रह लो। लेकिन याद रखना, घर का सारा काम तुम्हें ही करना पड़ेगा।" सुधा ने खामोशी से सिर हिला दिया। उस दिन से सुधा के लिए मायका किसी नरक से कम नहीं था। सुबह उठकर पूरे घर में झाड़ू-पोंछा लगाना, बर्तन मांजना, भाभियों के बच्चों के नखरे उठाना और सबके ताने सुनना उसकी दिनचर्या बन गई। लेकिन उसे सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती जब उसके मासूम बच्चे, आरव और पीहू, भूख लगने पर भाभियों से दूध या बिस्किट मांगते और उन्हें झिड़क कर भगा दिया जाता। रात को जब बच्चे भूखे पेट उसके सीने से लगकर सोते, तो सुधा खुद से वादा करती कि वह जल्द ही उन्हें इस घुटन से बाहर निकालेगी।

अगले दिन से ही सुधा तपती धूप में काम की तलाश में निकल जाती। वह घर-घर जाकर, दुकानों पर और स्कूलों में काम मांगती, लेकिन हर जगह से उसे निराशा ही हाथ लगती। चार दिन बीत गए। घर में भाभियों के ताने अब गालियों में बदलने लगे थे। "पता नहीं कौन सा काम ढूंढ रही है महारानी, बस सुबह निकल जाती है और शाम को मुफ्त की रोटियां तोड़ने आ जाती है," रश्मि अक्सर यही कहती। सुधा सब सुनती, लेकिन वह अपनी मंजिल से नहीं भटकना चाहती थी।

पांचवें दिन की शाम जब सुधा घर लौटी, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही सुकून और स्वाभिमान की चमक थी। मीनाक्षी ने उसे देखते ही ताना मारा, "क्या हुआ ननद रानी? मिल गया काम या फिर से हमारे ही सिर पर बैठकर खाने का इरादा है? पांच दिन की मोहलत मांगी थी तुमने।"

सुधा ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया, उनके सिर पर हाथ फेरा और मीनाक्षी की आंखों में आंखें डालकर एक शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, "हां भाभी, मुझे काम मिल गया है। आप लोगों को अब और परेशान होने की जरूरत नहीं है।"

रश्मि ने अचरज से पूछा, "अच्छा? कहां मिला है काम?"

सुधा ने गर्व से जवाब दिया, "यहां से कुछ ही दूरी पर जो सेठ धर्मदास जी की बड़ी कोठी है, वहीं मुझे काम मिल गया है। वहां कोठी की देखभाल और खाना बनाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई है। उन्होंने मुझे रहने के लिए कोठी के पीछे बना आउटहाउस भी दे दिया है और बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी वही उठाएंगे। मैं आज ही रात को वहां जा रही हूं।"

यह सुनकर दोनों भाभियों के चेहरे उतर गए। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इस बेसहारा औरत को इतनी जल्दी और इतना अच्छा ठिकाना मिल जाएगा। सुधा अपनी मां के कमरे में गई। कौशल्या देवी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने सुधा को सीने से लगा लिया। "मुझे माफ कर दे बेटी, मैं तेरे लिए कुछ नहीं कर पाई। मेरी आंखों के सामने तेरा ये अपमान हुआ और मैं बेबस रही।"

सुधा ने मां के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, "रोइए मत मां। इसी बहाने मुझे यह तो समझ आ गया कि इस दुनिया में इंसान का सबसे बड़ा सहारा उसका खुद का स्वाभिमान होता है। अगर मैं यहां रहकर भाभियों के ताने सहती रहती, तो कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाती। आपने मुझे जन्म दिया है, यही मेरे लिए बहुत है। अब मैं अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने जा रही हूं।"

सुधा ने अपने बच्चों का हाथ पकड़ा और बिना एक भी आंसू बहाए उस घर की दहलीज पार कर ली। पीछे छूट गया था एक ऐसा मायका जिसने उसे बेगाना कर दिया था, और सामने था एक नया सफर जहां उसे सिर्फ अपने दम पर अपनी किस्मत लिखनी थी। कोठी की तरफ बढ़ते हुए सुधा के कदमों में अब कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। वह सिर्फ एक औरत नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी मां थी जो अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार थी।


आपकी क्या राय है?

एक बेसहारा बेटी के साथ मायके में हुए इस व्यवहार पर आपके क्या विचार हैं? क्या सुधा ने उस घर को छोड़कर और अपनी मेहनत से काम ढूंढकर सही किया? क्या आज के समाज में भी बेटियों को इसी तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ जरूर साझा करें।

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लेखिका : गायत्री शर्मा


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