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पिंजरे की तितली

 


कस्बे के सबसे पुराने चौराहे पर दीनानाथ की कपड़ों की एक बड़ी सी दुकान थी और उसी दुकान के ठीक पीछे उनका पुश्तैनी मकान था। दीनानाथ उम्र के उस पड़ाव पर था जहाँ बालों की सफेदी को छिपाना अब मुमकिन नहीं रह गया था। चेहरे पर चेचक के गहरे दाग और चलने में एक हल्का सा लंगड़ापन, दीनानाथ के व्यक्तित्व को और भी नीरस बना देता था। लेकिन इसी दीनानाथ के घर की देहरी पर जब नंदिनी ने अपने कदम रखे थे, तो पूरे कस्बे में कानाफूसी शुरू हो गई थी। नंदिनी, मानो साक्षात संगमरमर से तराशी गई कोई मूरत थी। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, दूधिया रंगत और लंबी घनी जुल्फें किसी को भी एक पल में सम्मोहित कर सकती थीं।


नंदिनी और दीनानाथ की उम्र में पूरे बाइस साल का फासला था। यह विवाह किसी प्रेम या आकर्षण का परिणाम नहीं था, बल्कि परिस्थितियों की एक क्रूर साजिश थी। नंदिनी के पिता एक साधारण से स्कूल मास्टर थे, जो एक गंभीर बीमारी का शिकार हो गए थे। परिवार पर कर्ज का पहाड़ टूट पड़ा था। उस मुश्किल घड़ी में दीनानाथ ने न केवल उनके कर्ज चुकाए, बल्कि उनके इलाज का भी पूरा खर्च उठाया। बदले में, कर्ज के बोझ तले दबे पिता ने अपनी सबसे कीमती पूंजी, अपनी बेटी नंदिनी का हाथ दीनानाथ के हाथों में सौंप दिया। नंदिनी ने भी एक आदर्श बेटी की तरह बिना कोई सवाल किए इस बेमेल रिश्ते को स्वीकार कर लिया। दीनानाथ स्वभाव का बुरा नहीं था, वह नंदिनी की जरूरतें पूरी करता था, लेकिन एक जवान लड़की को जिस भावनात्मक जुड़ाव, जिस प्रेम और जिस हमउम्र साथी की लालसा होती है, वो उस घर की ऊँची दीवारों में कहीं घुट कर रह गई थी।


सर्दियों की एक उदास और कोहरे भरी सुबह थी। नंदिनी हमेशा की तरह घर के बाहरी बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थी। यह बरामदा सीधे मुख्य सड़क की तरफ खुलता था। दीनानाथ अंदर कमरे में अपनी दवाइयाँ खाकर अभी भी गहरी नींद में सो रहा था, और उसकी भारी खर्राटों की आवाजें बाहर तक आ रही थीं। नंदिनी की नजरें अपनी सलाईयों पर थीं, लेकिन उसका मन कहीं दूर अतीत के उन पन्नों में खोया था, जहाँ उसने भी कभी किसी राजकुमार के सपने देखे थे। उसके चेहरे पर एक अजीब सी रिक्तता और गहरी उदासी छाई हुई थी।


तभी कोहरे को चीरती हुई एक मोटरसाइकिल दुकान के बाहर आकर रुकी। उस पर शहर के दो नौजवान लड़के बैठे थे। शायद वे किसी सफर पर निकले थे और रास्ता भटक गए थे। कड़ाके की ठंड से दोनों काँप रहे थे। उनमें से एक लड़का, जो दिखने में बेहद सुदर्शन और ऊर्जावान था, बरामदे की तरफ बढ़ा।


"जी सुनिए..." लड़के की आवाज सुनकर नंदिनी ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं।


नंदिनी को देखते ही वह लड़का जैसे ठिठक सा गया। उसकी नजरें नंदिनी के सौन्दर्य पर कुछ पल के लिए ठहर सी गईं। फिर थोड़ा झिझकते हुए उसने कहा, "माफ़ कीजिएगा, हम रास्ता भटक गए हैं और हमारी गाड़ी का क्लच वायर टूट गया है। क्या यहाँ आस-पास कोई मैकेनिक मिलेगा? और अगर थोड़ी सी आग तापने की जगह मिल जाती तो..."


नंदिनी ने बिना कुछ बोले पास ही रखी अँगीठी उनकी तरफ खिसका दी और मैकेनिक का रास्ता बताने के लिए अंदर से दीनानाथ को आवाज दी। दीनानाथ खांसते हुए, अपने बिखरे हुए सफेद बालों और ढीले-ढाले कपड़ों में लंगड़ाते हुए बाहर आया। उसने अपनी कर्कश आवाज में उन लड़कों को रास्ता समझाया।


दोनों लड़के आग तापते हुए मैकेनिक का इंतजार करने लगे। दीनानाथ वापस अंदर जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। नंदिनी फिर से अपना स्वेटर बुनने लगी। लेकिन उन दोनों लड़कों की नजरें बार-बार नंदिनी और अंदर बैठे दीनानाथ के बीच झूल रही थीं। वे आपस में बहुत धीमी आवाज में बात करने लगे, लेकिन सुबह के उस सन्नाटे में उनकी फुसफुसाहट नंदिनी के कानों तक पहुँच ही गई।


"यार, दुनिया में वाकई कोई न्याय नहीं है," पहले लड़के ने गहरी सांस लेते हुए कहा। "देखा तुमने? कितनी खूबसूरत है ये, बिल्कुल किसी अप्सरा जैसी। और वो आदमी... उसे तो ठीक से चला भी नहीं जा रहा। कम से कम बीस साल का फर्क होगा दोनों में।"


दूसरे लड़के ने अपनी जैकेट की जिप चढ़ाते हुए सहमति में सिर हिलाया, "सच में यार, किस्मत भी कैसी-कैसी चाल चलती है। बेचारी की जिंदगी तो एक तरह से कैद ही है। ऐसे बूढ़े और कुरूप इंसान के साथ ये अपनी जवानी कैसे काट रही होगी? क्या इसे कभी प्यार का एहसास भी हुआ होगा?"


"पैसे का खेल होगा या कोई मज़बूरी," पहले ने अफ़सोस जताते हुए कहा। "पर जो भी हो, देखकर बहुत तकलीफ होती है। एक गुलाब का फूल जैसे बबूल के पेड़ पर खिल गया हो।"


मैकेनिक के आने पर दोनों लड़के उठ खड़े हुए। जाने से पहले उन्होंने एक आखिरी बार गहरी और सहानुभूति भरी नजरों से नंदिनी को देखा। उनके चेहरे पर उस बेमेल जोड़ी के लिए एक स्पष्ट तरस था। वे अपनी गाड़ी लेकर वहाँ से चले गए और धुंध में कहीं गायब हो गए।


नंदिनी वहीं अपनी जगह पर बुत बनी बैठी रही। उसके हाथ रुक गए थे। उन अजनबी लड़कों की बातें किसी नुकीले तीर की तरह उसके सीने के आर-पार हो गई थीं। उन्होंने वो सच कह दिया था जिसे वह खुद से भी छिपाने की कोशिश कर रही थी। उसने मुड़कर अंदर देखा, जहाँ दीनानाथ अपनी उसी दुनिया में मगन था, इस बात से पूरी तरह बेखबर कि उसकी युवा पत्नी के मन में क्या उथल-पुथल मची है। नंदिनी ने अपनी पलकें नहीं झपकाईं, लेकिन उसकी आँखों की कोर से एक गर्म आँसू छलक कर उसके हाथ में पकड़े आधे बुने स्वेटर पर आ गिरा। वह आँसू सिर्फ उन लड़कों की बातों का नहीं था, बल्कि उसके उस जीवन का था जो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया था।


आपको क्या लगता है, क्या हमारे समाज में ऐसे बेमेल विवाहों में स्त्री की खामोशी उसकी मज़बूरी होती है या परिवार के लिए उसका महान त्याग? क्या उसे अपनी खुशियों का गला घोंटने का अधिकार है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएँ।


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