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जुदाई

 बरामदे में रखी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर झूलते हुए, 70 वर्षीय नलिनी अपनी गोद में रखी डायरी के पन्नों को पलट रही थी। बाहर सावन की झड़ी लगी थी, ठीक वैसी ही बारिश, जैसी उस दिन हो रही थी जब उसकी विदाई हुई थी। आज वह अकेली थी, लेकिन यह अकेलापन उसे काटता नहीं था, बल्कि एक अजीब-सी शांति देता था। लोग कहते हैं कि बुढ़ापे का अकेलापन एक अभिशाप है, पर नलिनी के लिए यह उसकी 'जीत' का प्रमाण था।

नलिनी अपने अतीत के गलियारों में झांकती है, तो उसे वह सीधी-सादी, पढ़ने में होशियार लड़की याद आती है। उसके पिता, मास्टर दीनानाथ जी, शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में प्रिंसिपल थे। घर में अनुशासन था, पर विचारों की आज़ादी भी थी। नलिनी और उसका भाई, सुबोध, दोनों ही पढ़ाई में अव्वल थे। नलिनी का सपना था कि वह एक ऐसी सर्जन बने जिसके हाथों में जादू हो। उसने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की और शहर के सबसे बड़े कॉलेज में दाखिला लिया।

एम.बी.बी.एस. की डिग्री हाथ में आते ही घर में शादी की शहनाइयां बजने की तैयारी शुरू हो गई। नलिनी आगे पढ़ना चाहती थी, एम.एस. (सर्जरी) करना चाहती थी, लेकिन पिताजी के कंधे पर सामाजिक ज़िम्मेदारियों का बोझ था। एक रिश्ता आया—डॉक्टर विहान का। विहान का परिवार रसूखदार था, उनका अपना नर्सिंग होम था। पिताजी को लगा कि बेटी डॉक्टर है और दामाद भी डॉक्टर, तो नलिनी का करियर भी संवर जाएगा और घर भी।

शादी बड़ी धूमधाम से हुई। नलिनी के मन में भी रंगीन सपने थे। उसे लगा था कि विहान के साथ मिलकर वह चिकित्सा के क्षेत्र में नया मुकाम हासिल करेगी। लेकिन ससुराल की चौखट लांघते ही हकीकत का खुरदरापन सामने आ गया।

सुहागरात की अगली ही सुबह विहान ने नलिनी को एक बड़ा झटका दिया।

"नलिनी, मेरा वीज़ा आ गया है। मुझे अगले हफ्ते लंदन निकलना होगा," विहान ने ऐसे कहा जैसे वह बाज़ार से सब्जी लाने की बात कर रहा हो।

नलिनी अवाक रह गई। "लंदन? पर शादी से पहले तो ऐसी कोई बात नहीं हुई थी? और मैं?"

विहान ने लापरवाही से कंधे उचकाए, "अरे, वो सब तो पापा ने शायद बताया नहीं होगा। मुझे वहाँ एक बड़े हॉस्पिटल में जॉइन करना है। तुम अभी यहीं रहो, माँ-बापा के पास। मेरा सेटलमेंट होते ही मैं तुम्हें बुला लूँगा। वीज़ा में टाइम लगता है।"

नलिनी चुप रह गई। एक नई नवेली दुल्हन और क्या कर सकती थी? विहान एक हफ्ते बाद चला गया। नलिनी के हिस्से में रह गया एक बड़ा सा ससुराल, सास-ससुर की सेवा, और इंतज़ार।

शुरुआत के कुछ महीने तो पत्रों के इंतज़ार में कट गए। उस ज़माने में एस.टी.डी. कॉल करना भी एक युद्ध लड़ने जैसा था। विहान का फोन महीने में एक बार आता, वो भी औपचारिक बातों तक सीमित—"सब ठीक है? माँ-पापा का ख्याल रखना। पैसे भेज दिए हैं।" नलिनी अपनी पढ़ाई, अपनी सर्जरी की प्रैक्टिस के बारे में बात करना चाहती, लेकिन विहान को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।

ससुराल वाले नलिनी को 'बहू' कम और 'मुफ्त की रेजिडेंट डॉक्टर' ज्यादा समझते थे। उनके नर्सिंग होम में नलिनी सुबह से शाम तक मरीज़ देखती, लेकिन उसे एक रुपया भी अपने पास रखने का हक़ नहीं था। "अरे बहू, घर तो तुम्हारा ही है, पैसे का क्या करना?" ससुर जी हंसकर टाल देते।

दो साल बीत गए। नलिनी अब भी 'वीज़ा' के इंतज़ार में थी।

एक दिन, लंदन से विहान का पत्र आया। नलिनी ने धड़कते दिल से लिफाफा खोला। उसे उम्मीद थी कि शायद अब बुलावा आया होगा। पर खत में लिखा था—"नलिनी, मुझे यहाँ फैलोशिप मिल गई है। मुझे अभी 3 साल और लगेंगे। तुम चाहो तो अपनी एम.एस. वहीं किसी लोकल कॉलेज से कर लो। यहाँ आने का अभी कोई स्कोप नहीं है।"

उस एक खत ने नलिनी के अंदर कुछ तोड़ दिया। वह समझ गई कि 'वीज़ा' तो बस एक बहाना था। विहान उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना ही नहीं चाहता था। वह उसे अपने बूढ़े माँ-बाप की देखभाल के लिए एक शिक्षित केयरटेकर बनाकर छोड़ गया था।

उस रात नलिनी रोई नहीं। वह आईने के सामने खड़ी हुई और खुद को देखा। क्या वह इसीलिए डॉक्टर बनी थी कि पति के इंतज़ार में अपनी जवानी और हुनर को दीमक की तरह चाटते हुए देखे? क्या उसका अस्तित्व सिर्फ 'विहान की पत्नी' होने तक सीमित था?

अगली सुबह, नलिनी ने अपने पिता को नहीं, बल्कि अपने कॉलेज के डीन को फोन किया। उसने पता लगाया कि एक दूर-दराज़ के पिछड़े इलाके, 'रामपुर', में सरकारी अस्पताल में सर्जन की सख्त ज़रूरत है, लेकिन कोई वहाँ जाना नहीं चाहता।

नाश्ते की मेज पर नलिनी ने बम फोड़ा।

"बाबूजी, मैं रामपुर जा रही हूँ। मैंने वहाँ की सरकारी नौकरी ज्वाइन कर ली है।"

ससुर जी के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। "क्या बकवास है? घर की बहू नौकरी करने दूसरे शहर जाएगी? लोग क्या कहेंगे? विहान क्या सोचेगा?"

नलिनी ने पहली बार नज़रे उठाकर बात की, "विहान ने पिछले दो सालों में मेरे बारे में क्या सोचा, यह साफ़ है बाबूजी। मैं एक डॉक्टर हूँ, और मेरा काम मरीज़ों का इलाज करना है, सिर्फ़ इस घर की चारदीवारी में घुटकर मरना नहीं। मेरा ट्रांसफर हो गया है, मैं कल निकल रही हूँ।"

ससुराल में कोहराम मच गया। मायके से भी फोन आए, भाई ने समझाया, "दीदी, थोड़ा सब्र करो।" पर नलिनी का सब्र अब स्वाभिमान में बदल चुका था। उसने अपना बैग उठाया, जिसमें उसके कपड़े कम और मेडिकल की किताबें ज्यादा थीं, और घर से निकल गई।

रामपुर एक छोटा सा कस्बा था। अस्पताल की हालत खस्ता थी। नलिनी को वहाँ संघर्ष करना पड़ा। बिजली नहीं थी, उपकरण पुराने थे, और लोग महिला सर्जन पर भरोसा नहीं करते थे। लेकिन नलिनी ने हार नहीं मानी। उसने दिन-रात एक कर दिया। धीरे-धीरे, उसके हाथों का जादू लोगों पर चलने लगा। उसने कई जटिल आपरेशन किए, कई ज़िंदगियाँ बचाईं।

पाँच साल गुज़र गए। नलिनी अब 'डॉक्टर साहिबा' नहीं, बल्कि उस इलाके की 'देवी' बन चुकी थी। उसने वहीं एक अनाथ बच्ची, 'गुड़िया', को गोद ले लिया, जिसका कोई नहीं था। गुड़िया ने नलिनी के खालीपन को भर दिया।

उधर, विहान कभी वापस नहीं आया। सुना था उसने वहीं लंदन में किसी विदेशी महिला से शादी कर ली थी और नलिनी को तलाक के कागज़ भेज दिए थे। नलिनी ने उन कागज़ों पर बिना एक आंसू बहाए हस्ताक्षर कर दिए। उसे लगा जैसे किसी ने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया हो।

नलिनी ने अपनी पूरी ज़िंदगी रामपुर के उस अस्पताल को दे दी। उसने अपने पैसों से वहाँ एक नया विंग बनवाया, लड़कियों के लिए नर्सिंग स्कूल खोला। उसका भाई सुबोध कभी-कभी मिलने आता, तो उसकी तरक्की देख दंग रह जाता। नलिनी ने साबित कर दिया था कि एक औरत को 'पूर्ण' होने के लिए पुरुष की बैसाखी की ज़रूरत नहीं होती।

समय पंख लगाकर उड़ा। नलिनी के बाल सफ़ेद हो गए, लेकिन चेहरे पर अनुभव का तेज आ गया। गुड़िया अब बड़ी हो चुकी थी और खुद भी डॉक्टर बन गई थी।

नलिनी के 65वें जन्मदिन पर, उसे राज्य सरकार द्वारा 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया जाना था। समारोह राजधानी में था। नलिनी स्टेज पर खड़ी थी, हॉल तालियों से गूंज रहा था।

समारोह के बाद, एक व्हीलचेयर पर बैठे बुजुर्ग व्यक्ति को उनका सहायक नलिनी के पास लाया।

"मैम, ये आपसे मिलना चाहते हैं। ये लंदन से आए हैं, दिल के मरीज़ हैं और आपकी बहुत तारीफ सुनी है," सहायक ने कहा।

नलिनी ने चश्मा ठीक करते हुए उस बुजुर्ग को देखा। चेहरे पर झुर्रियां थीं, बाल गिर चुके थे, शरीर लकवे से ग्रस्त था। लेकिन वह आँखें... नलिनी उन आँखों को कैसे भूल सकती थी?

वह विहान था।

विहान ने कांपती आवाज़ में कहा, "डॉक्टर नलिनी...?" उसकी आवाज़ में पहचान का एक धुंधला सा प्रयास था। शायद उसने अखबार में फोटो देखी थी।

नलिनी के दिल की धड़कन एक पल के लिए भी नहीं बढ़ी। न गुस्सा आया, न नफरत, और न ही कोई पुराना प्रेम जागा। वहां सिर्फ़ एक 'शून्यता' थी। एक डॉक्टर और एक मरीज़ के बीच का फासला।

"जी, कहिये? मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ?" नलिनी ने पेशेवर लहज़े में पूछा।

विहान की आँखों में आंसू आ गए। शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वह जिस चमक-दमक के पीछे भागा था, उसने उसे अकेला छोड़ दिया था। उसकी विदेशी पत्नी उसे छोड़कर जा चुकी थी, बच्चे अपनी दुनिया में मस्त थे, और अब बीमारी ने उसे लाचार कर दिया था। उसने सुना था कि भारत में एक डॉक्टर है जो 'जादूगर' है, उसे अंदाज़ा नहीं था कि वह जादूगर वही औरत है जिसे वह 'बोझ' समझकर छोड़ गया था।

"नलिनी... मैं... मैं विहान," उसने अपना परिचय देने की कोशिश की।

नलिनी ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा—एक डॉक्टर की तरह, न कि एक पत्नी की तरह।

"मिस्टर विहान, आप चिंता न करें। हमारे अस्पताल में आपका बेहतरीन इलाज होगा। मेरी बेटी, डॉक्टर गुड़िया, कार्डियोलॉजी विभाग देखती है। वह आपको देखेगी।"

"बेटी?" विहान हक्का-बक्का रह गया।

"जी, मेरी बेटी," नलिनी ने गर्व से मुस्कुराते हुए कहा। फिर उसने अपने सहायक को इशारा किया, "इन्हें वी.आई.पी. वार्ड में शिफ्ट करवा दीजिये।"

नलिनी मुड़ी और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसे विहान से कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि अगर विहान ने उसे छोड़ा न होता, तो नलिनी को कभी अपनी ताकत का पता नहीं चलता। विहान के जाने से जो खालीपन आया था, उसे नलिनी ने अपनी उपलब्धियों, अपनी सेवा और अपनी ममता से लबालब भर दिया था।

आज, 70 साल की उम्र में, जब नलिनी उस बारिश को देख रही है, तो उसे लगता है कि उसकी ज़िंदगी का हर पन्ना विचित्र ज़रूर था, लेकिन कोरा नहीं था। उसने अपनी कहानी की कलम किसी और के हाथ में देने के बजाय, खुद थामी और एक ऐसी दास्तान लिखी जिस पर उसे नाज़ है।

यह अकेलापन नहीं, यह 'एकांत' है—एक ऐसा एकांत जहाँ वह खुद से मिलती है और मुस्कुराती है। क्योंकि अंत में, वह किसी की 'छोड़ी हुई पत्नी' नहीं बनी, बल्कि हज़ारों लोगों की 'उम्मीद' बनी। और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

लेखिका : मीरा भाट


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