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ममता का कोई जेंडर नहीं

  उसने कबीर को अपने सीने से लगा लिया। उसका स्पर्श इतना कोमल था जैसे कोई माँ अपने ही बच्चे को सहला रही हो। उसने अपने बैग से एक साफ रुमाल निकाला, उसे अपनी पानी की बोतल से गीला किया और कबीर के तपते माथे पर रख दिया। फिर वह धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाते हुए एक पुरानी लोरी गुनगुनाने लगी। उसकी आवाज़ में इतना दर्द और इतना सुकून था कि पूरा डिब्बा जो कुछ देर पहले कबीर के रोने से परेशान था, अब एकदम शांत होकर उस दृश्य को देख रहा था।

सर्दियों की एक धुंध भरी सुबह थी। मैं अपने पति विकास और तीन साल के बेटे कबीर के साथ लखनऊ से दिल्ली की यात्रा कर रही थी। ट्रेन अपनी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी, लेकिन मेरे अंदर एक अजीब सी घबराहट चल रही थी। कबीर को पिछले दो दिन से तेज़ बुखार था। डॉक्टर ने कहा था कि शायद मौसम का बदलाव है, लेकिन ट्रेन के इस बंद और घुटन भरे एसी कोच में उसकी हालत और बिगड़ती जा रही थी। वह लगातार रो रहा था और उसका शरीर तवे की तरह तप रहा था। मैंने और विकास ने उसे चुप कराने की हर संभव कोशिश कर ली थी, लेकिन वह किसी भी तरह शांत नहीं हो रहा था।

हमारे आस-पास बैठे सहयात्रियों की आँखों में अब सहानुभूति की जगह चिड़चिड़ाहट ने ले ली थी। सामने बैठे एक बुजुर्ग सज्जन ने तो यहाँ तक कह दिया, "अरे भाई, अगर बच्चा इतना बीमार था तो ट्रेन में सफर क्यों कर रहे हो? दूसरों की नींद भी खराब कर दी।" उनके इस तंज से मेरी आँखें भर आईं। विकास उन्हें जवाब देने ही वाले थे कि तभी कोच का दरवाज़ा खुला और वो चिर-परिचित तालियों की आवाज़ गूँज उठी।

चार किन्नरों की एक टोली हमारे कोच में दाखिल हुई। अमूमन ट्रेन में किन्नरों को देखकर लोग असहज हो जाते हैं। कोई अपना पर्स छिपाने लगता है, तो कोई गहरी नींद में सोने का नाटक करने लगता है। सहयात्रियों ने भी अपने चेहरे फेर लिए। वो टोली हर सीट पर जाकर पैसे मांग रही थी, कुछ लोग खुशी से दे रहे थे, तो कुछ झिड़क रहे थे। कबीर उनके आने की आवाज़ से और ज़ोर से डरकर रोने लगा। मैं उसे सीने से चिपकाकर खिड़की की तरफ मुँह करके बैठ गई, ताकि कोई कबीर को परेशान न करे।

तभी मेरी नज़र उस टोली की एक किन्नर पर पड़ी। वह बाकी सब से बिल्कुल अलग थी। न कोई भड़कीला कपड़ा, न चेहरे पर थोपा हुआ भारी मेकअप और न ही बात-बात पर तालियां बजाकर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश। उसने एक बेहद सादी सी सूती साड़ी पहनी हुई थी। माथे पर एक छोटी सी बिंदी और आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। उसकी उम्र यही कोई पैंतीस-चालीस के आस-पास रही होगी। वह बहुत सुंदर थी, पर उसकी सुंदरता उसके रूप से ज्यादा उसकी सादगी और उसके शांत व्यक्तित्व से छलक रही थी। वह किसी से पैसे नहीं मांग रही थी, बस चुपचाप अपनी एक साथी के पीछे चल रही थी।

कबीर के लगातार रोने की आवाज़ सुनकर उस टोली की एक मुखिया जैसी दिखने वाली किन्नर हमारे पास आई और मज़ाकिया लहजे में बोली, "अरे बाबूजी, बच्चा क्यों रो रहा है? लाओ हमारी नेग दो, हम दुआ देंगे तो बच्चा एकदम चुप हो जाएगा।" विकास ने झुंझलाकर अपनी जेब से दस का नोट निकाला और उसे देकर आगे बढ़ने का इशारा किया।

लेकिन तभी उस सादी सी किन्नर ने अपनी साथी का हाथ पकड़ लिया। उसने बड़ी ही कोमलता से कहा, "रहने दे चमेली, बच्चा बहुत बीमार लग रहा है। देख तो कैसे तप रहा है।"

उसने मेरी तरफ देखा और बहुत ही मीठी, सभ्य और आत्मीय आवाज़ में पूछा, "बहन जी, अगर आप बुरा न मानें तो मैं इसे एक मिनट के लिए गोद में ले लूँ? शायद मैं इसे चुप करा सकूँ।"

मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या कहूँ। समाज के पूर्वाग्रह मेरे दिमाग में भी थे, लेकिन उसकी आँखों में इतनी गहरी ममता और सच्चाई थी कि मेरे हाथ खुद-ब-बखुद कबीर को उसकी ओर बढ़ा दिए। विकास ने मुझे टोकने की कोशिश की, लेकिन मैं चुप रही।

उसने कबीर को अपने सीने से लगा लिया। उसका स्पर्श इतना कोमल था जैसे कोई माँ अपने ही बच्चे को सहला रही हो। उसने अपने बैग से एक साफ रुमाल निकाला, उसे अपनी पानी की बोतल से गीला किया और कबीर के तपते माथे पर रख दिया। फिर वह धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाते हुए एक पुरानी लोरी गुनगुनाने लगी। उसकी आवाज़ में इतना दर्द और इतना सुकून था कि पूरा डिब्बा जो कुछ देर पहले कबीर के रोने से परेशान था, अब एकदम शांत होकर उस दृश्य को देख रहा था।

हैरानी की बात यह थी कि कबीर, जो पिछले दो घंटे से चुप नहीं हो रहा था, उसकी छाती में मुँह छिपाकर ऐसे शांत हो गया जैसे उसे दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह मिल गई हो। कुछ ही मिनटों में कबीर की आँखें बंद होने लगीं और वह सो गया।

उसने कबीर को वापस मेरी गोद में देते हुए कहा, "इसे बुखार की वजह से शरीर में ऐंठन हो रही थी। आप इसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती रहिए, यह ठीक हो जाएगा।"

मैं भावुक हो गई थी। मैंने कहा, "आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। आपने जो किया, वो शायद मैं भी नहीं कर पा रही थी। आपका नाम क्या है?"

उसने एक उदास सी मुस्कान के साथ कहा, "नाम तो कल्याणी है बहन जी। पर अब नाम में क्या रखा है?"

मैंने हिचकिचाते हुए पूछा, "आप... मेरा मतलब है, आप इस टोली के साथ? आप तो बहुत पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई लगती हैं।"

कल्याणी ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के बाहर भागते पेड़ों को देखते हुए बोली, "पढ़ी-लिखी तो हूँ बहन। एक बड़े घर का इकलौता 'बेटा' थी मैं। मेरे भी घर में एक छोटी बहन थी, जिसे मैं कबीर की तरह ही सीने से लगाकर सुलाती थी। लेकिन जब मेरे परिवार को मेरी असलियत का पता चला, तो उनके लिए समाज की इज़्ज़त मेरी जान से ज्यादा बड़ी हो गई। जिस माँ ने मुझे जन्म दिया था, उसने भी मुँह फेर लिया। मुझे घर से निकाल दिया गया। यह शरीर और यह पहचान मेरी गलती नहीं थी, लेकिन सज़ा मुझे ही मिली। आज मेरी बहन का भी एक बेटा होगा, बिल्कुल कबीर जैसा। जब मैंने आपके बच्चे को रोते देखा, तो मुझे अपना वही बचपन और अपना वही घर याद आ गया।"

यह सुनकर मेरी और विकास दोनों की आँखें छलक आईं। वह जो बुज़ुर्ग पहले हमें ताने दे रहे थे, वे भी सिर झुकाए बैठे थे।

विकास ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकालकर कल्याणी को देने चाहे, तो उसने हाथ जोड़ लिए और बोली, "नहीं बाबूजी, एक माँ अपने बच्चे को दुलार करने के पैसे नहीं लेती। इसे बस मेरी दुआ समझ कर रख लीजिए।"

अगला स्टेशन आ गया था। कल्याणी और उसकी टोली नीचे उतर गई। मैं बहुत देर तक खिड़की से उसे जाते हुए देखती रही। वह भीड़ में खो गई थी, लेकिन मेरे दिल में एक ऐसा निशान छोड़ गई थी जो कभी नहीं मिट सकता था। मैंने कबीर को कसकर गले लगा लिया। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि इंसानियत और ममता का कोई रूप, कोई रंग और कोई जेंडर नहीं होता। वह बस एक एहसास है, जो कभी-कभी किसी अनजाने सफर में, किसी बिल्कुल अनजाने चेहरे से मिल जाता है।


दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या समाज के बनाए गए इन दायरों और झूठी इज्ज़त की खातिर किसी अपने को घर से निकाल देना सही है? क्या कल्याणी जैसी ममता की मूरत समाज में सम्मान की हकदार नहीं है? अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद


 लेखक : मुकेश पटेल


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