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विश्वास की दहलीज

 रात के दो बज चुके थे। मुंबई के अपने छोटे से फ्लैट के कमरे में बैठी श्रुति के सामने एक खुला हुआ सूटकेस रखा था। कमरे में पसरा सन्नाटा केवल दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' की आवाज़ से टूट रहा था। कल सुबह ग्यारह बजे उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था। उसे अपने सहकर्मी और प्रेमी अनिर्बान के साथ मैरिज रजिस्ट्रार के ऑफिस जाना था। सब कुछ तय हो चुका था— पहले कोर्ट में दस्तखत होंगे और फिर पास के ही एक मंदिर में वे भगवान को साक्षी मानकर हमेशा के लिए एक-दूसरे के हो जाएंगे। दोनों ने सोचा था कि जब शादी हो ही जाएगी, तब घरवालों को बता देंगे। शादीशुदा जोड़े को वे कब तक नकारेंगे, कभी न कभी तो अपना ही लेंगे। यह सोचकर उन्होंने यह गुपचुप कदम उठाने का फैसला किया था।


श्रुति और अनिर्बान एक ही एडवरटाइजिंग कंपनी में काम करते थे। साथ काम करते-करते कब दोनों एक-दूसरे की जरूरत बन गए, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। लेकिन दोनों के बीच एक बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी। श्रुति उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर के बेहद सख्त और पारंपरिक परिवार से ताल्लुक रखती थी, जबकि अनिर्बान कोलकाता का एक आधुनिक सोच वाला बंगाली लड़का था। दोनों के परिवारों का रहन-सहन, खान-पान, भाषा और रीति-रिवाज़ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने अपने घर पर इस रिश्ते की बात की, तो सीधा 'ना' ही सुनने को मिलेगी। इसी डर ने उन्हें कल सुबह के इस गुप्त फैसले तक पहुँचाया था।


श्रुति के हाथों में वह लाल बनारसी साड़ी थी जो अनिर्बान ने उसे मंदिर में पहनने के लिए लाकर दी थी। लेकिन उस साड़ी को देखकर श्रुति के चेहरे पर दुल्हन वाली चमक नहीं थी, बल्कि उसकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उसका पूरा शरीर एक अजीब सी घबराहट और डर से कांप रहा था। 


उसके कानों में बार-बार अपने पिता की आवाज़ गूंज रही थी। श्रुति के पिता एक साधारण स्कूल मास्टर थे। जब श्रुति की मुंबई में नौकरी लगी थी, तो पूरे मोहल्ले और रिश्तेदारों ने ताने मारे थे— "अकेली जवान लड़की को इतने दूर, इतने बड़े शहर में भेज रहे हो, कल को कुछ ऊंच-नीच हो गई तो मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे।" लेकिन उसके पिता ने सबको चुप कराते हुए कहा था, "मेरी बेटी मेरे गुरूर है। मुझे अपनी परवरिश और अपनी बेटी के संस्कारों पर खुद से ज्यादा विश्वास है। वो कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जिससे हमारा सिर झुके।" 


श्रुति फूट-फूट कर रोने लगी। "कैसा विश्वास?" उसने खुद से सवाल किया। जो लड़की बाजार से अपनी पसंद की एक चुन्नी भी खरीदती थी तो पहले वीडियो कॉल पर अपनी माँ को दिखाती थी, "माँ, ये रंग मुझ पर कैसा लगेगा?" आज वही लड़की अपनी जिंदगी का इतना बड़ा फैसला लेने जा रही है और उसकी माँ को खबर तक नहीं है। क्या बीतेगी उन सीधे-सादे माता-पिता पर जब उन्हें पता चलेगा कि उनकी जिस बेटी पर उन्हें इतना नाज़ था, उसने उन्हें धोखे में रखकर शादी कर ली?


तभी श्रुति के फोन की स्क्रीन रोशन हुई। स्क्रीन पर 'पापा' लिखा आ रहा था। रात के ढाई बजे पापा का फोन? श्रुति का दिल धक से रह गया। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया।


"बेटा, सोई नहीं अभी तक? तेरा व्हाट्सऐप ऑनलाइन दिख रहा था," उधर से पिता की फिक्रमंद आवाज़ आई।


"बस पापा... कुछ काम कर रही थी। आप क्यों जाग रहे हैं?" श्रुति ने अपने आंसुओं को रोकते हुए रुंधे गले से कहा।


"अरे तेरी माँ को नींद नहीं आ रही थी। कह रही थी कि आज अजीब सी घबराहट हो रही है, श्रुति को फोन लगाओ। उसे तो लगता है कि तूने अभी तक खाना भी नहीं खाया होगा। सुन, अपना ध्यान रखना बेटा। काम तो चलता रहेगा, पर तू हमारी जान है। चल अब सो जा।" फोन कट गया।


पिता के इस फोन कॉल ने श्रुति के अंदर चल रहे द्वंद्व को खत्म कर दिया। उसके भीतर का अपराधबोध अब असहनीय हो चुका था। उसने सूटकेस बंद किया, लाल साड़ी को वापस अलमारी में रखा और अनिर्बान का नंबर डायल किया। 


"क्या हुआ श्रुति? तुम ठीक तो हो? घबराहट हो रही है क्या कल के लिए?" अनिर्बान ने फोन उठाते ही पूछा।


"अनिर्बान... मैं कल नहीं आ सकती," श्रुति बिलख-बिलख कर रो पड़ी। "मुझे माफ कर दो। मैं यह शादी नहीं कर सकती।"


फोन के उस पार एक पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। "क्या कह रही हो श्रुति? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती? क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?"


"मुझे तुमसे बहुत प्यार है अनिर्बान, और तुम पर अपनी जान से भी ज्यादा भरोसा है। लेकिन मुझे अपने माता-पिता के आंसुओं पर अपनी खुशियों का महल नहीं खड़ा करना। जो रिश्ता मेरे पिता के विश्वास की चिता पर शुरू होगा, उसमें कभी बरकत नहीं हो सकती। अनिर्बान, मैंने कभी अपनी माँ से बिना पूछे अपनी हेयरस्टाइल भी नहीं बदली, और आज मैं उनके दामाद का चुनाव उनसे छुपाकर कर रही हूँ? नहीं... मैं इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती।"


श्रुति सुबक रही थी। उसे लगा कि अनिर्बान अब उससे हमेशा के लिए दूर चला जाएगा, नाराज होकर फोन काट देगा। लेकिन तभी अनिर्बान की बहुत ही शांत और परिपक्व आवाज़ आई। 


"श्रुति, रोना बंद करो।" अनिर्बान ने गहरी सांस ली। "मैंने तुमसे प्यार तुम्हारे इसी साफ और सच्चे दिल की वजह से किया है। अगर तुम कल छुपकर मेरे साथ शादी कर भी लेतीं, तो शायद मैं तुम्हारे उस रूप को कभी स्वीकार नहीं कर पाता जो अपने परिवार को धोखा दे सके। मैं खुश हूँ कि तुमने आज यह फैसला लिया।"


श्रुति अवाक रह गई। "अनिर्बान..."


"कल की कोर्ट मैरिज और मंदिर की बुकिंग कैंसिल समझो," अनिर्बान ने दृढ़ता से कहा। "हम भागेंगे नहीं श्रुति। हम कायर नहीं हैं। अगले हफ्ते हम दोनों तुम्हारे घर उत्तर प्रदेश चलेंगे। मैं तुम्हारे पिता के सामने हाथ जोड़कर तुम्हें मांगूंगा। वो गुस्सा करेंगे, गालियां देंगे, शायद मुझे घर से निकाल देंगे। लेकिन मैं बार-बार जाऊंगा। हम उन्हें अपने प्यार का यकीन दिलाएंगे। हम छुपकर नहीं, बल्कि उनके आशीर्वाद से दुनिया के सामने एक होंगे।"


अनिर्बान की इन बातों ने श्रुति के मन के सारे बोझ को एक ही झटके में उतार फेंका। उसके आंसू अब डर के नहीं, बल्कि एक असीम सुकून और सही जीवनसाथी चुनने के गर्व के थे। उसने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ रात का गहरा अंधेरा अब धीरे-धीरे सुबह की एक नई और सच्ची रोशनी में तब्दील हो रहा था। 


***


क्या प्यार में भागकर शादी कर लेना ही एकमात्र विकल्प होता है, या फिर अपने माता-पिता का सामना करके उनके आशीर्वाद से अपना घर बसाना ज्यादा सही है? श्रुति और अनिर्बान के इस फैसले पर आपकी क्या राय है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।


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 लेखिका : भूमि तनेजा


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