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शीशे का घर और पत्थर के लोग

 दिसंबर के महीने की वह कंपा देने वाली सर्द रात थी। पूरे शहर को एक घने और दमघोंटू कोहरे ने अपनी सफेद चादर में लपेट रखा था। मैं अपने ऑफिस के काम से देर रात निवृत्त होकर बस स्टैंड पर खड़ा था। ठंडी हवाएं सीधे हड्डियों को भेद रही थीं और वहां खड़े चंद लोग अलाव तापने या मफलर में अपना चेहरा छिपाने की जद्दोजहद में लगे थे। शहर की वह भागदौड़ और गाड़ियों का शोर उस रात के सन्नाटे में कहीं दब सा गया था। मैं अपने हाथों को रगड़कर गर्माहट पैदा करने की कोशिश कर रहा था, तभी मेरी नज़र एक ऐसे दृश्य पर पड़ी जिसने मुझे भीतर तक सुन्न कर दिया।


कोहरे को चीरते हुए एक बेहद वृद्ध और जर्जर शरीर वाले बुजुर्ग धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए मेरी तरफ आ रहे थे। उनकी उम्र कम से कम अस्सी साल रही होगी। कमर इस कदर झुक गई थी कि उनका शरीर लगभग एक धनुष के आकार का हो गया था। उनके शरीर पर एक पुराना, कई जगह से उधड़ा हुआ सूती स्वेटर और एक मटमैली शॉल थी, जो उस हाड़ कंपा देने वाली सर्दी को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही थी। उनके हाथों में प्लास्टिक की एक छोटी सी डलिया थी, जिसमें कुछ सस्ते पेन, चाबियों के छल्ले और रुमाल रखे हुए थे। ठंड और कमजोरी के कारण उनके हाथ इस तरह कांप रहे थे जैसे हवा में कोई सूखा पत्ता कांपता है। उनके चलने की गति इतनी धीमी थी कि मानो हर एक कदम उठाने के लिए उन्हें अपनी बची-खुची सारी ऊर्जा लगानी पड़ रही हो।


वहाँ मौजूद लोग उन्हें अनदेखा कर रहे थे। कुछ लोग तो उन्हें देखकर ही मुंह फेर लेते, जैसे कोई अवांछित वस्तु देख ली हो। वह बुजुर्ग किसी के सामने हाथ नहीं फैला रहे थे, बस अपनी कांपती आवाज़ में धीरे से कहते, "बाबूजी, एक पेन ले लीजिए... बेटा, एक रुमाल ले लो।" उनका यह स्वर इतना धीमा था कि गाड़ियों की आवाज़ में गुम हो जाता। तभी अचानक एक जल्दबाजी में जाते हुए व्यक्ति का कंधा उनसे टकरा गया। बुजुर्ग का संतुलन बिगड़ा और वह नीचे गिरते-गिरते बचे, लेकिन उनके हाथों की डलिया छिटक कर गिर गई। सारे पेन और छल्ले उस ठंडी सड़क पर बिखर गए। वह आदमी बिना मुड़कर देखे या क्षमा मांगे वहां से चला गया।


मुझसे यह दृश्य देखा नहीं गया। मैं तुरंत अपनी जगह से भागा और उनके पास पहुंचकर ज़मीन पर बिखरे सामान को बटोरने लगा। मेरी मदद करते देख बुजुर्ग की धुंधली और मोतियाबिंद से सफेद हो चुकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उन्होंने अपने कांपते हाथों से मेरे सिर पर हाथ रखा और भर्राई हुई आवाज़ में बोले, "जीते रहो बेटा, भगवान तुम्हें बहुत तरक्की दे।" मैंने उनका सारा सामान डलिया में रखा और उन्हें सहारा देकर पास ही चाय की एक दुकान के किनारे रखी बेंच पर बिठाया। उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था। मैंने चाय वाले को दो कड़क गर्म चाय देने का इशारा किया।


चाय का कुल्हड़ उनके हाथों में देते हुए मैंने बहुत संकोच के साथ पूछा, "बाबा, इतनी भयानक सर्दी की रात में आप इस तरह सड़क पर क्यों घूम रहे हैं? आपके घर में कौन-कौन है? क्या आपके बेटे-पोते नहीं हैं जो आपको इस उम्र में काम करना पड़ रहा है?"


मेरे इन सवालों को सुनते ही उनके चेहरे की झुर्रियों में छिपी एक गहरी उदासी छलक पड़ी। चाय का घूंट भरते हुए उनकी आंखें डबडबा आईं। कुछ पल के सन्नाटे के बाद उन्होंने एक गहरी आह भरी और बोले, "बेटे तो हैं बाबूजी... बल्कि सच कहूं तो मेरा एक ही बेटा है, जो मेरी जान का टुकड़ा था। मैं एक सरकारी स्कूल में मास्टर था। जीवन भर ईमानदारी की रोटी खाई और पाई-पाई जोड़कर अपने बेटे को एक बड़े शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई। खुद सालों तक फटे जूते पहने, अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिए, ताकि मेरे बेटे के सपनों में कोई कमी न आए।"


उनकी बातें मेरे दिल में सुई की तरह चुभ रही थीं। उन्होंने आगे बताया, "बेटे को अच्छी नौकरी मिल गई। उसने शहर में एक बड़ा घर बनाने की सोची। मैंने अपनी जिंदगी भर की कमाई, अपनी पेंशन और प्रोविडेंट फंड का सारा पैसा उसके उस नए घर में लगा दिया। मुझे लगा कि बुढ़ापे में मैं और मेरी पत्नी अपने पोते-पोतियों के साथ उसी बड़े आंगन में खेलेंगे। लेकिन घर बनते ही बेटा बदल गया। बहू को मेरे खांसने की आवाज़ से चिढ़ होने लगी। उसे मेरा पुराने ढंग से रहना और मेरे कपड़े गंदे लगने लगे। पहले मुझे मेरे ही पैसों से बने उस घर के एक छोटे से स्टोर रूम में शिफ्ट किया गया। मेरी पत्नी तो यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और दो साल पहले ही मुझे अकेला छोड़कर चली गई।"


बुजुर्ग की आंखों से अब आंसू बहकर उनकी सफेद दाढ़ी में समा रहे थे। उन्होंने अपनी शॉल से आंसू पोंछते हुए कहा, "पत्नी के जाने के बाद मैं उनके लिए एक बोझ बन गया। रोज़ के ताने और तिरस्कार सहना मेरी नियति बन गई। और फिर... पिछले महीने की कड़कड़ाती ठंड में, मेरे ही बेटे ने मुझे घर के दरवाज़े से बाहर निकाल दिया और कहा कि मेरे रहने से उनके घर का माहौल खराब होता है और उनके दोस्तों के सामने उनकी बेइज्जती होती है।"


मैं अवाक रह गया। मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। मैंने गुस्से और दुख के मिले-जुले भाव से पूछा, "बाबा, तो आपने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की? आप इस तरह भीख क्यों... मेरा मतलब है, आप इस तरह दर-बदर क्यों भटक रहे हैं?"


उन्होंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा, जिसमें स्वाभिमान की एक अद्भुत झलक थी। "शिकायत किसकी करूं बेटा? अपने ही खून की? अगर उसे सज़ा हो गई तो क्या मैं चैन से सो पाऊंगा? और रही बात मेरे भटकने की, तो मैं भीख नहीं मांगता। जब तक इन हाथों में थोड़ी भी जान है, मैं मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाऊंगा। किसी के आगे हाथ फैलाने से बेहतर है कि मैं अपना स्वाभिमान बचाकर रखूं। इंसान जब भीख मांगता है, तो वह केवल पैसे नहीं, अपना आत्मसम्मान भी उस कटोरी में डाल देता है।"


मेरी बस आ चुकी थी और वह हॉर्न बजा रही थी, लेकिन मेरे कदम उस जगह से हिलने का नाम नहीं ले रहे थे। मैंने उस बुजुर्ग को देखा, जो अपनी डलिया उठाकर वापस कोहरे में विलीन होने के लिए तैयार थे। मैंने अपनी जेब में पड़े सारे पैसे निकाले और उनके हाथ में देने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने सख़्ती से मना कर दिया और केवल दस रुपये लेकर मुझे एक पेन पकड़ा दिया।


वह धीरे-धीरे अपनी लाठी के सहारे अंधेरे में ओझल हो गए, लेकिन मेरे मन में एक ऐसा तूफ़ान छोड़ गए जो कभी शांत नहीं होने वाला था। मैं बस में अपनी सीट पर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखते हुए बस यही सोच रहा था कि इंसानियत किस कदर मर चुकी है। हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ एक पिता अपने बच्चों के लिए खुद को राख कर देता है, और वही बच्चे उसी पिता को कचरे की तरह बाहर फेंक देते हैं।


दोस्तों, इस कहानी को पढ़ने के बाद आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं? क्या आज के दौर में रिश्तों की अहमियत सिर्फ पैसों और सहूलियत तक सिमट कर रह गई है? क्या एक पिता का जीवन भर का बलिदान इतना सस्ता होता है कि उसे इस तरह बेघर कर दिया जाए? कृपया अपने विचार कमेंट करके ज़रूर बताएं।


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