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ममता का मौन

   ऐसे कई ताने सुमित्रा ने इन दो दिनों में सुने। लेकिन सबसे ज्यादा दुख उसे इस बात का था कि शारदा इन सारी बातों को एक हल्की सी मुस्कान के साथ सह जाती थी। वह भाग-भाग कर अपने बेटे की हर फरमाइश पूरी करती, भले ही उसके घुटनों का दर्द उसे ऐसा करने से रोक रहा हो। सुमित्रा यह सब देखकर भी चुप थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि जिस शारदा ने अपने पति के गुज़र जाने के बाद, अकेले दिन-रात एक करके आर्यन को पाला-पोसा, आज उसी आर्यन के मन में अपनी माँ के लिए ज़रा भी कद्र क्यों नहीं है। 


सर्दियों की वो सुबह अपनी ही धुन में व्यस्त थी। रसोईघर से आती चाय की सोंधी महक और बर्तनों की खटपट बता रही थी कि घर की मालकिन, शारदा, हमेशा की तरह अपने दिनचर्या के चक्रव्यूह में घिर चुकी है। अचानक दरवाजे की घंटी बजी। शारदा ने पल्लू से अपने हाथ पोंछे और दरवाजा खोला। सामने अपनी ननद सुमित्रा को खड़ा देखकर उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। करीब चार साल बाद सुमित्रा अचानक बिना बताए आई थी। 


"अरे दीदी! आप? और वो भी बिना कोई खबर किए?" शारदा ने चहकते हुए सुमित्रा के हाथ से बैग लिया और उसे अंदर ले आई। 


"बस, मन किया कि अपनी प्यारी भाभी से मिल आऊँ, तो ट्रेन पकड़ी और चली आई," सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए कहा। दोनों ननद-भाभी डाइनिंग टेबल पर बैठकर पुरानी यादों को ताज़ा करने लगीं। सुमित्रा और शारदा का रिश्ता ननद-भाभी से ज्यादा दो सहेलियों का था। थोड़ी देर बाद शारदा का बाईस वर्षीय बेटा, आर्यन, अपने कमरे से बाहर निकला। उसने जल्दबाजी में अपनी बुआ सुमित्रा के पैर छुए, एक फीकी सी मुस्कान दी और फोन पर किसी से बात करते हुए घर से बाहर निकल गया। सुमित्रा ने मुस्कुराकर उसे आशीर्वाद तो दिया, लेकिन आर्यन के इस ठंडे व्यवहार ने उसके मन में एक अजीब सी खटक पैदा कर दी।


सुमित्रा को आए हुए अब दो दिन बीत चुके थे। इन दो दिनों में उसकी पारखी नज़रों ने घर के माहौल को बहुत गहराई से पढ़ लिया था। उसने नोटिस किया कि आर्यन का व्यवहार अपनी माँ के प्रति बिल्कुल भी सम्मानजनक नहीं था। वह बात-बात पर शारदा पर झल्ला उठता था। 


"माँ, मेरी काली शर्ट प्रेस क्यों नहीं है? तुम्हें पता था ना आज मुझे दोस्तों के साथ जाना है!" 

"माँ, खाने में नमक कम है, तुम आजकल ध्यान कहाँ रखती हो?" 


ऐसे कई ताने सुमित्रा ने इन दो दिनों में सुने। लेकिन सबसे ज्यादा दुख उसे इस बात का था कि शारदा इन सारी बातों को एक हल्की सी मुस्कान के साथ सह जाती थी। वह भाग-भाग कर अपने बेटे की हर फरमाइश पूरी करती, भले ही उसके घुटनों का दर्द उसे ऐसा करने से रोक रहा हो। सुमित्रा यह सब देखकर भी चुप थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि जिस शारदा ने अपने पति के गुज़र जाने के बाद, अकेले दिन-रात एक करके आर्यन को पाला-पोसा, आज उसी आर्यन के मन में अपनी माँ के लिए ज़रा भी कद्र क्यों नहीं है। सुमित्रा ने शारदा का वह दौर देखा था जब वह खुद फटी हुई साड़ी पहनकर गुज़ारा कर लेती थी, लेकिन आर्यन की हर महंगी से महंगी ज़िद पूरी करती थी। 


तीसरे दिन की सुबह, घर में एक अजीब सा तनाव फैल गया। आर्यन के कमरे से तेज़-तेज़ चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं। 


"माँ! मेरी वो नीली डायरी कहाँ है? मैंने कल रात यहीं अपनी टेबल पर रखी थी। ज़रूर तुमने ही सफाई के नाम पर कुछ किया होगा!" आर्यन गुस्से में पैर पटकता हुआ बाहर आया।


शारदा रसोई से भागती हुई आई, "बेटा, मैंने तो बस मेज़ से धूल साफ की थी। वो डायरी वहीं दराज के अंदर रख दी थी ताकि सुरक्षित रहे।"


"तुमसे किसने कहा था मेरी चीजों को हाथ लगाने के लिए? मेरे इतने कहने पर भी तुम समझती क्यों नहीं हो! मेरी प्राइवेसी का कोई मतलब है या नहीं? कितनी दफा कहा है मैंने कि मेरे कमरे में मत आया करो, लेकिन हर बार तुम अपनी मनमानी करती हो!" 


आर्यन के शब्दों में जो कड़वाहट और अपमान था, वह किसी भी माँ के दिल को छलनी करने के लिए काफी था। वह अपनी डायरी लेकर वापस कमरे में गया और इतनी ज़ोर से दरवाज़ा बंद किया कि पूरे घर में एक सन्नाटा सा गूंज गया।


शारदा वहीं डाइनिंग टेबल के पास बुत बनकर खड़ी रह गई। उसकी आँखें डबडबा आई थीं। तभी उसकी नज़र सामने खड़ी सुमित्रा पर पड़ी, जो शायद शुरू से ही आर्यन और उसकी बातें सुन रही थी। शारदा को आर्यन का गुस्सा तो पहले भी बुरा लगता था, लेकिन आज अपनी ननद के सामने हुए इस घोर अपमान ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था। एक अजीब सी शर्मिंदगी ने उसे घेर लिया। 


सुमित्रा के लिए अब चुप रहना असंभव था। वह धीरे-धीरे चलकर शारदा के पास आई और उसके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। 


"दीदी, आजकल के बच्चे... काम का तनाव रहता है ना, इसलिए गुस्सा कर देते हैं," शारदा ने अपने आँसू छुपाते हुए एक झूठी सफाई देने की कोशिश की।


"तू मुझे सफाई क्यों दे रही है शारदा?" सुमित्रा की आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। "तनाव किसे नहीं होता? लेकिन क्या उस तनाव की कीमत एक माँ का आत्मसम्मान है? तूने इस घर के लिए, इस लड़के के लिए अपने वजूद को मिटा दिया और इसके बदले में तुझे क्या मिल रहा है? ये ज़िल्लत?"


सुमित्रा सीधे आर्यन के कमरे की तरफ गई और उसने ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। "आर्यन, बाहर आओ।"


आर्यन ने झुंझलाते हुए दरवाज़ा खोला, "क्या है बुआ? मैं बिज़ी हूँ।"


"बिज़ी तो तुम्हारी माँ भी थी बेटा, जब तुम छोटे थे और तुम्हें टाइफाइड हुआ था। वो तीन रातों तक एक पल के लिए भी नहीं सोई थी। बिज़ी तो वो तब भी थी जब तुम्हारे पिता के जाने के बाद वह लोगों के ताने सुनकर भी सिलाई मशीन पर बैठकर तुम्हारे स्कूल की फीस का इंतज़ाम करती थी," सुमित्रा की आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे। 


आर्यन अवाक रह गया। सुमित्रा ने आगे कहा, "एक डायरी अपनी जगह से खिसक गई तो तुम्हें अपनी प्राइवेसी याद आ गई? और उस औरत की प्राइवेसी का क्या जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हारे नाम कर दी? तुम्हें अपनी माँ की कद्र इसलिए नहीं है क्योंकि उसने कभी तुम्हें 'ना' नहीं कहा। तुम भूल गए हो कि जिस ज़मीन पर तुम आज गुरूर से खड़े हो, उसकी नींव में तुम्हारी माँ के आँसू और पसीना मिला हुआ है।"


सुमित्रा के शब्द आर्यन के दिल पर हथौड़े की तरह बज रहे थे। अचानक उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा। उसे याद आया कि कैसे उसकी माँ ने कभी अपने लिए एक नई साड़ी तक नहीं खरीदी ताकि वह आर्यन को कॉलेज के लिए नया लैपटॉप दिला सके। उसका अहंकार एक पल में टूट कर बिखर गया। वह धीरे से बाहर आया। उसने देखा कि शारदा सोफे पर बैठी चुपचाप आँसू बहा रही थी। 


आर्यन दौड़कर अपनी माँ के पैरों के पास बैठ गया और उसने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। "मुझे माफ़ कर दो माँ। मैं सच में अंधा हो गया था। मैं अपने काम और अपने ईगो में यह भूल गया था कि दुनिया में आपके बिना मेरा कोई वजूद नहीं है। मैं वादा करता हूँ कि आज के बाद आपको कभी रोने का मौका नहीं दूँगा।"


शारदा ने रोते हुए अपने बेटे को सीने से लगा लिया। सुमित्रा की आँखों से भी राहत के आँसू छलक पड़े। आज एक माँ को उसका खोया हुआ सम्मान वापस मिल गया था। परिवार के रिश्ते जब कड़वाहट से भर जाते हैं, तो कभी-कभी एक सही मार्गदर्शन उन्हें फिर से उस ममता की छाँव में ले आता है, जहाँ केवल प्यार और आदर बसता है।



क्या आपने भी कभी अनजाने में अपने माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम को 'ग्रांटेड' लिया है? या आपके आस-पास किसी माँ को ऐसे ही तिरस्कार का सामना करना पड़ा है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।


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 लेखिका : कुसुम भार्गव


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