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ममता का कोई गोत्र नहीं होता

 मैं दौड़कर उसके पास गई और बिना कुछ सोचे, बिना किसी झिझक के, मैंने उस गंदे तौलिए में लिपटे बच्चे को अपने सीने से लगा लिया। मैंने अपना पल्लू हटाया और उसे दूध पिलाने लगी। जैसे ही उस बच्चे ने दूध पीना शुरू किया, मेरे अंदर का सारा गुरूर, सारी ऊंच-नीच की दीवारें और बचपन से सिखाई गई हर झूठी मर्यादा आंसुओं के रूप में मेरी आँखों से बह निकली। उस औरत ने हाथ जोड़कर मेरे पैर छूने चाहे, पर मैंने उसे रोक दिया। आज मुझे एहसास हुआ था कि ममता का कोई रंग नहीं होता,

दिसंबर की सर्द रात थी और लखनऊ रेलवे स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। कोहरे के कारण हमारी ट्रेन चार घंटे लेट थी। मैं, पल्लवी, अपने छः महीने के बेटे रुद्रांश को सीने से लगाए बैठी थी। रुद्रांश भूख से रो रहा था, इसलिए मैंने अपनी शॉल की आड़ में उसे दूध पिलाना शुरू कर दिया। मेरे पति, समीर, पास ही बैठे अखबार के पन्ने पलट रहे थे। मेरा जन्म एक बेहद रूढ़िवादी और संभ्रांत परिवार में हुआ था। बचपन से ही मुझे सिखाया गया था कि हम ऊंचे कुल के हैं, हर किसी के छुए बर्तन में पानी नहीं पीना, नीची जाति वालों से दूरी बनाकर रखना और अपनी 'पवित्रता' को हर हाल में बचाए रखना। यही संस्कार मेरी रगों में लहू बनकर दौड़ते थे।

रुद्रांश अभी दूध पी ही रहा था कि वेटिंग रूम का कांच का दरवाजा खुला और एक बूढ़ी सफाई कर्मचारी अंदर आई। उसके मैले कपड़े और बिखरे हुए बाल बता रहे थे कि वह दिन भर की थकी हुई है, लेकिन उसकी बाहों में कुछ ऐसा था जिसने मेरा ध्यान खींच लिया। एक पुराना, गंदा सा तौलिया, जिसमें लिपटा एक नवजात बच्चा बुरी तरह रो रहा था। उसकी रोने की आवाज़ इतनी तेज और दर्दनाक थी कि वेटिंग रूम में बैठे कुछ लोग झुंझलाकर उस बूढ़ी औरत को बाहर जाने का इशारा करने लगे।

वह औरत डरी-सहमी सी एक कोने में खड़ी होकर उस बच्चे को चुप कराने की कोशिश कर रही थी। तभी उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। मैं रुद्रांश को दूध पिला रही थी। उस औरत की आँखों में अचानक एक ऐसी चमक और उम्मीद जागी, जिसे देखकर ही मैं अंदर तक सिहर उठी। मुझे अंदाज़ा हो गया था कि वह क्या सोच रही है। मैंने तुरंत अपनी नज़रें चुरा लीं और रुद्रांश को शॉल से और अच्छे से ढंक लिया।

लेकिन मेरी आशंका सच साबित हुई। वह सफाई वाली औरत धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई मेरे पास आ गई। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने बहुत ही दबी और मिन्नत भरी आवाज़ में कहा, "बहू जी... स्टेशन के पीछे वाले गंदे नाले के पास, कूड़ेदान में पड़ा मिला है यह अभागा। शायद कल रात का ही जन्मा है। भूख से इसकी जान निकली जा रही है। मैंने इसे पानी पिलाने की कोशिश की, पर यह कुछ निगल नहीं पा रहा। मेरे तो थन बरसों पहले सूख गए। अगर आप अपनी छाती से लगाकर इसे दो घूंट दूध पिला दें, तो शायद इस बेसहारे की जान बच जाए।"

यह सुनते ही मेरे अंदर का वो संभ्रांत और रूढ़िवादी संस्कार फन फैलाकर खड़ा हो गया। मैंने घबराहट और गुस्से से समीर की तरफ देखा। समीर ने तुरंत उस औरत को डांटते हुए कहा, "क्या बकवास कर रही हो? चलो हटो यहाँ से। पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं मुंह उठाकर।"

वह औरत फिर भी वहीं खड़ी रही, उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। वह बस मुझे देखे जा रही थी। पर मेरे अंदर दया की कोई जगह नहीं थी। मैं सोच रही थी कि कूड़ेदान में पड़ा बच्चा... न जाने किस जाति का होगा? किस गंदे खून की पैदाइश होगा? किसी के पाप की निशानी, जिसे उसकी अपनी माँ ने ही मरने के लिए फेंक दिया, उसे मैं अपना दूध कैसे पिला सकती हूँ? मेरा दूध सिर्फ मेरे रुद्रांश के लिए है, जो एक ऊंचे और पवित्र कुल का चिराग है। किसी सड़क छाप, अनाथ और गंदे बच्चे को मैं खुद से कैसे सटा सकती हूँ? मेरे लिए यह सोचना बिल्कुल स्वाभाविक था, क्योंकि मैंने अपनी पूरी उम्र यही सब तो देखा और सीखा था। ऊंच-नीच का यह जहर मेरे मन में इतनी गहराई तक उतरा हुआ था कि उस तड़पते हुए बच्चे में मुझे कोई इंसान नहीं, बल्कि सिर्फ 'गंदगी' नज़र आ रही थी। मैंने कड़क आवाज़ में कहा, "तुम इसे किसी अस्पताल ले जाओ। मैं इसे दूध नहीं पिला सकती।"

वह औरत कुछ पल मुझे अविश्वास की नज़रों से देखती रही। उसकी आँखों में एक अजीब सी निराशा थी, जैसे उसने इंसानियत को दम तोड़ते हुए देख लिया हो। वह बिना कुछ कहे वहां से मुड़ी और अपने ठिठुरते हुए हाथों से उस बच्चे को सीने से चिपकाकर वेटिंग रूम से बाहर चली गई।

रुद्रांश अब पेट भर जाने के कारण मेरी गोद में सुकून से सो चुका था। मैं उसे देखकर मुस्कुराई। लेकिन बाहर जाने वाले उस बच्चे की रोने की आवाज़ मेरे कानों में अब भी गूंज रही थी। धीरे-धीरे समय बीतने लगा। दस मिनट, बीस मिनट, आधा घंटा... वेटिंग रूम में सन्नाटा था, पर मेरे मन के अंदर एक भयानक शोर शुरू हो गया था। मेरे स्तन भारी हो रहे थे, जैसे कुदरत मुझसे पूछ रही हो कि जो अमृत उसने एक जीवन को बचाने के लिए दिया है, उसे मैंने अपनी खोखली मर्यादा के नाम पर क्यों रोक लिया?

मुझे अचानक याद आया कि जब रुद्रांश पैदा होने वाला था, तो मेरी जान पर बन आई थी। मुझे खून की ज़रूरत थी और तब यह नहीं पूछा गया था कि वो खून किस जाति के इंसान का है। खून की बोतल पर कोई धर्म या गोत्र नहीं लिखा था। फिर आज... आज मेरे दूध का गोत्र कहाँ से आ गया? वह नवजात बच्चा, जिसे यह भी नहीं पता कि वह इस दुनिया में क्यों आया है, वह सिर्फ भूख जानता है। क्या एक माँ होने के नाते मेरा पहला धर्म उस भूख को मिटाना नहीं था?

मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। मुझे अपनी उसी सोच पर घिन आने लगी जिस पर मुझे कुछ देर पहले तक बहुत गुरूर था। क्या मेरे ऊंचे कुल के संस्कारों ने मुझे इतना पत्थर बना दिया है कि मैं एक बच्चे को अपनी आँखों के सामने भूख से तड़प कर मरने दूं?

मैं अचानक अपनी जगह से उठी। समीर ने चौंक कर पूछा, "क्या हुआ पल्लवी?"

मैंने रुद्रांश को समीर की गोद में थमाया और बिना कोई जवाब दिए वेटिंग रूम से बाहर दौड़ पड़ी। स्टेशन की उस ठंडी हवा में मैं पागलों की तरह उस सफाई वाली औरत को ढूंढने लगी। मेरी आँखें आंसुओं से धुंधली हो रही थीं। काफी ढूंढने के बाद, मैंने देखा कि वह औरत सीढ़ियों के नीचे एक अंधेरे कोने में बैठी है। बच्चा अब रो नहीं रहा था, बस उसकी हल्की-हल्की सिसकियाँ आ रही थीं और वह ठंड और भूख से नीला पड़ रहा था।

मैं दौड़कर उसके पास गई और बिना कुछ सोचे, बिना किसी झिझक के, मैंने उस गंदे तौलिए में लिपटे बच्चे को अपने सीने से लगा लिया। मैंने अपना पल्लू हटाया और उसे दूध पिलाने लगी। जैसे ही उस बच्चे ने दूध पीना शुरू किया, मेरे अंदर का सारा गुरूर, सारी ऊंच-नीच की दीवारें और बचपन से सिखाई गई हर झूठी मर्यादा आंसुओं के रूप में मेरी आँखों से बह निकली। उस औरत ने हाथ जोड़कर मेरे पैर छूने चाहे, पर मैंने उसे रोक दिया। आज मुझे एहसास हुआ था कि ममता का कोई रंग नहीं होता, उसकी कोई जाति नहीं होती। एक बच्चा सिर्फ बच्चा होता है, और एक माँ... सिर्फ माँ।

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 लेखक : मुकेश पटेल


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