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एक माँ का आँचल

 "मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची," विमला जी सुबकते हुए बोलीं। "मैंने तुझे अच्छे कपड़े दिए, अच्छी शिक्षा दी, लेकिन मैं तेरी एक अच्छी दोस्त नहीं बन पाई। मुझे नहीं पता था कि मेरे घर की खामोशी तुझे इतना अकेला कर देगी कि तू किसी अजनबी पर भरोसा कर लेगी। आज के बाद मैं तेरी माँ बाद में, तेरी सबसे अच्छी दोस्त पहले बनूँगी।"

सोलह-सत्रह साल की उम्र भी कितनी अजीब होती है। यह वह वक्त होता है जब असल जिंदगी की सच्चाइयां बहुत चुभने लगती हैं और सपनों की एक ऐसी काल्पनिक दुनिया हसीन लगने लगती है, जिसका धरातल से कोई वास्ता नहीं होता। इस उम्र में भावनाओं का समंदर उफान पर होता है और अगर इस समंदर को सही किनारा न मिले, तो कश्तियां अक्सर भंवर में फँस जाती हैं। ऐसी ही एक भंवर में फँस रही थी सुहानी।

सुहानी एक बहुत ही होनहार और शांत स्वभाव की लड़की थी। उसके माता-पिता, विमला और राजेश, मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे और दोनों ही नौकरीपेशा थे। उनका मानना था कि बच्चों को अच्छे स्कूल में डाल देना, उनकी हर भौतिक ज़रूरत पूरी करना और अनुशासन में रखना ही परवरिश की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। विमला जी स्वभाव से थोड़ी सख्त थीं। ऑफिस से थकी-हारी आतीं और घर के कामों में लग जातीं। उनका सुहानी से संवाद बस इतना ही होता था—"होमवर्क कर लिया?", "आज टेस्ट में कितने नंबर आए?", या "दिन भर फोन में आँखें मत गड़ाए रखा करो।"

सुहानी के मन में क्या चल रहा है, वह स्कूल में किन उलझनों का सामना कर रही है, उसके शरीर और मन में उम्र के साथ क्या बदलाव आ रहे हैं—इन सब पर बात करने की फुर्सत विमला जी के पास कभी नहीं रही। नतीजतन, सुहानी अपने ही घर में एक अजनबी सी हो गई। जब घर में कोई आपकी बात सुनने वाला न हो, तो मन बाहर के लोगों में अपनापन ढूँढने लगता है। सुहानी के साथ भी यही हुआ। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में उसकी मुलाकात 'रवि' नाम के एक लड़के से हुई। रवि ने बहुत चालाकी से सुहानी की उस कमज़ोरी को पकड़ लिया था। वह सुहानी की तारीफें करता, उसकी हर छोटी-बड़ी बात बड़े ध्यान से सुनता और उसे यह अहसास दिलाता कि इस दुनिया में सिर्फ वही है जो सुहानी को सच में समझता है।

सुहानी धीरे-धीरे अपने माता-पिता से और कटती चली गई। वह उस फंतासी दुनिया में इतनी खो चुकी थी कि उसे रवि का हर झूठ सच लगने लगा था। विमला जी ने बेटी में आते इस बदलाव को देखा ज़रूर, लेकिन उन्होंने इसे सिर्फ 'आजकल के बच्चों की बिगड़ती आदत' समझकर सुहानी पर पाबंदियां और बढ़ा दीं। उन्होंने उसका फोन छीन लिया और उसे डांट-डपट कर सुधारने की कोशिश की। लेकिन सख्ती कभी भी संवाद की कमी को पूरा नहीं कर सकती। सख्ती ने सुहानी को बागी बना दिया। रवि के उकसाने पर, अपनी नादानी और एक झूठे प्यार के छलावे में आकर सुहानी ने घर से भागकर रवि के पास शहर जाने का फैसला कर लिया।

एक दोपहर, जब विमला जी ऑफिस में थीं, सुहानी ने अपना बैग पैक किया और घर से निकल गई। लेकिन शायद एक माँ के दिल का कोई ऐसा रडार होता है जो किसी अनहोनी को पहले ही भांप लेता है। विमला जी को उस दिन ऑफिस में बहुत घबराहट हो रही थी। सिर में दर्द का बहाना बनाकर वे आधे दिन की छुट्टी लेकर घर आ गईं। घर का दरवाज़ा खुला था और सुहानी अपने कमरे में नहीं थी। विमला जी के हाथ-पैर फूल गए। तभी उनकी नज़र सुहानी के डेस्क पर पड़ी उसकी एक खुली हुई डायरी पर गई। डायरी के पन्नों पर सुहानी की घुटन, उसका अकेलापन और रवि के साथ भागने की पूरी योजना लिखी हुई थी।

विमला जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके सामने एक पल में सुहानी का पूरा बचपन घूम गया। उन्हें याद आया कि कैसे सुहानी बचपन में स्कूल से आते ही उन्हें अपनी छोटी-छोटी बातें बताने के लिए दौड़ती थी, लेकिन वो 'काम में व्यस्त हूँ' कहकर उसे टाल देती थीं। आज विमला जी को अहसास हुआ कि एक माँ का फर्ज़ सिर्फ औलाद को पालना नहीं होता, बल्कि उन पर ऐसी नज़र रखना होता है जो जासूसी की नहीं, बल्कि दोस्ती की हो। बच्चों को ऐसे माहौल और कंपनी की ज़रूरत होती है जहाँ वे अपनी गलतियां भी बिना डरे बता सकें। और एक जवान होती बेटी के लिए उसकी माँ से बेहतर संगिनी और कौन हो सकती है?

विमला जी ने बिना एक पल गंवाए सीधा बस स्टैंड की तरफ दौड़ लगाई। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे और दिल ईश्वर से बस एक ही प्रार्थना कर रहा था कि वे समय पर पहुँच जाएं। बस स्टैंड पर यात्रियों की भारी भीड़ थी। विमला जी पागलों की तरह हर चेहरे में अपनी बेटी को ढूँढ रही थीं। तभी उनकी नज़र एक कोने में खड़ी सुहानी पर पड़ी। वह डरी हुई, सहमी हुई सी बार-बार अपना फोन देख रही थी। शायद रवि वहां नहीं आया था या उसे धोखा दे चुका था।

विमला जी दौड़कर सुहानी के पास गईं। सुहानी ने जब अपनी माँ को देखा, तो वह डर के मारे पीछे हट गई। उसे लगा कि अब उसे सबके सामने ज़ोरदार थप्पड़ पड़ेगा और बहुत डांट पड़ेगी। लेकिन विमला जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बेटी को कसकर अपने सीने से लगा लिया और बीच बस स्टैंड पर फूट-फूट कर रो पड़ीं।

"मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची," विमला जी सुबकते हुए बोलीं। "मैंने तुझे अच्छे कपड़े दिए, अच्छी शिक्षा दी, लेकिन मैं तेरी एक अच्छी दोस्त नहीं बन पाई। मुझे नहीं पता था कि मेरे घर की खामोशी तुझे इतना अकेला कर देगी कि तू किसी अजनबी पर भरोसा कर लेगी। आज के बाद मैं तेरी माँ बाद में, तेरी सबसे अच्छी दोस्त पहले बनूँगी।"

सुहानी जो अब तक एक काल्पनिक दुनिया के छलावे में जी रही थी, माँ के इस स्पर्श और आंसुओं से जैसे नींद से जाग गई। उसके अंदर का सारा डर और भ्रम टूट गया। वह भी विमला जी के गले लगकर ज़ार-ज़ार रोने लगी। "मुझे माफ कर दो माँ, मैं बहुत बड़ी गलती करने जा रही थी।"

उस दिन सुहानी तो घर लौटी ही, लेकिन साथ ही लौटी एक नई विमला जी। उन्होंने अपनी परवरिश का तरीका पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने सुहानी को समय देना शुरू किया। रोज़ रात को दोनों माँ-बेटी अपनी दिनचर्या साझा करतीं, हँसतीं और एक-दूसरे के दिल का हाल जानतीं। सुहानी ने भी धीरे-धीरे खुद को संभाला और अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया। कुछ ही सालों में उसने अपनी एक अलग पहचान बनाई। समाज क्या कहता है, लोग कैसे ताने मारते हैं, इन सबसे दूर विमला जी ने अपनी बेटी के अतीत को कभी उस पर हावी नहीं होने दिया। क्योंकि अब सुहानी के पास दुनिया की सबसे मज़बूत ढाल थी—उसकी माँ की दोस्ती।

क्या आपने भी अपने बच्चों के साथ वो दोस्ताना रिश्ता कायम किया है जहाँ वे आपसे कुछ भी छिपाने से पहले दस बार सोचें नहीं, बल्कि आपको सब कुछ बताकर सुकून महसूस करें? बच्चों को सुधारने के लिए सज़ा से ज़्यादा समझने की ज़रूरत होती है। आपको यह कहानी कैसी लगी, हमें अपने विचार ज़रूर बताएं।

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लेखिका : गायत्री शर्मा


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