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पराये आँगन की 'बेटी

सुजाता के हाथ कांप रहे थे। सामने बिस्तर पर सूटकेस खुला पड़ा था और उसमें काव्या के कपड़े सलीके से रखे जा रहे थे। काव्या, सुजाता की जान, उसकी इकलौती संतान, कल इस घर से हमेशा के लिए विदा होने वाली थी। सुजाता ने काव्या की कॉलेज की डिग्रियां, उसके मेडल और कुछ चुनिंदा किताबें एक अलग बैग में रखते हुए एक गहरी साँस ली। आँखों के पोरों पर जो नमी तैर रही थी, उसे उसने अपनी साड़ी के पल्लू से बहुत ही खामोशी से पोंछ लिया। वो नहीं चाहती थी कि काव्या उसे कमजोर देखे।


काव्या दरवाजे की चौखट पर खड़ी अपनी माँ को खामोशी से निहार रही थी। उसके भीतर भी भावनाओं का एक सैलाब उमड़ रहा था, लेकिन होंठ सिले हुए थे। सुजाता ने पलटकर देखा और अपनी बेटी को गले से लगा लिया। अपनी रुलाई को भीतर ही दबाते हुए वो बोली, "मेरी बच्ची, अब तू एक नए घर जा रही है। वो तेरा अपना घर होगा। शुरू-शुरू में सब नया लगेगा, कुछ चीजें अटपटी भी लगेंगी, लेकिन तू धैर्य मत खोना। तेरी सासू माँ ने खुद कहा था कि उन्हें बहू नहीं, एक पढ़ी-लिखी समझदार बेटी चाहिए। वो तुझे बहुत प्यार देंगी। बस तू एक बात याद रखना, जब भी मन भारी हो या कुछ बात हो, तो मुझे बेझिझक फोन कर लेना।"


काव्या ने बस धीमे से हामी भरी। पर उसकी आँखों में एक अनजाना सा डर तैर रहा था। एक ऐसा डर जो हर उस लड़की की आँखों में होता है जो अपना सब कुछ पीछे छोड़कर एक अनजान दुनिया में कदम रखने जा रही होती है।


विदाई की सुबह बहुत भारी थी। शहनाई की धुन जैसे सुजाता के कलेजे को चीर रही थी। जब काव्या लाल जोड़े में सजी, अपनी नम आँखों से माँ को निहारते हुए कार की तरफ बढ़ी, तो सुजाता के लिए खुद को संभालना नामुमकिन हो गया। कार के शीशे से झांकती काव्या की डबडबाई आँखें मानो बिना कुछ कहे एक ही सवाल पूछ रही थीं, "माँ, क्या बेटियां सच में सिर्फ विदा होने के लिए ही जन्म लेती हैं? मुझे खुद से दूर क्यों कर रही हो?"


कार धूल उड़ाते हुए आँखों से ओझल हो गई और पीछे छोड़ गई एक गहरा सन्नाटा, जो सुजाता के घर की दीवारों पर चिपक सा गया था। शून्य में ताकती सुजाता बस यही सोच रही थी कि एक दिन वो भी इसी तरह अपना घर छोड़कर आई थी, और आज उसकी बेटी भी पराई हो गई।


दिन बीतने लगे। सुजाता का पूरा दिन बस फोन के इंतजार में कटता। वो बार-बार मोबाइल की स्क्रीन देखती कि शायद काव्या का कोई मैसेज आया हो। शुरुआत में काव्या के फोन आते, लेकिन बातचीत बहुत छोटी होती। कभी-कभार ही वो इत्मीनान से बात कर पाती। "हाँ माँ, सब ठीक है... माँ अभी मैं काम कर रही हूँ, बाद में बात करती हूँ।" बस यही चंद शब्द सुजाता के कानों में पड़ते और फोन कट जाता।


काव्या एक सरकारी बैंक में अफसर थी। शादी से पहले सुजाता ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा था कि उसकी बेटी को कभी घर के काम के बोझ तले दबना न पड़े, ताकि वो अपने करियर पर ध्यान दे सके। ससुराल वालों ने भी शादी से पहले बहुत बड़ी-बड़ी बातें की थीं। "अरे समधिन जी, आपकी बेटी तो अफसर है। हम तो गर्व करेंगे कि हमारे घर में एक कमाऊ बेटी आ रही है। उसे घर के चूल्हे-चौके में थोड़े ही फंसाएंगे!" ये शब्द सुजाता को बहुत तसल्ली देते थे।


लेकिन वक्त के साथ फोन कॉल्स की अवधि और भी कम होने लगी। कभी-कभी तो दो-दो दिन तक काव्या से बात नहीं हो पाती थी। सुजाता का मन किसी अनहोनी की आशंका से घबराने लगा। एक माँ का दिल अपनी संतान की पीड़ा को बिना कहे भी भांप लेता है।


एक दिन रविवार की शाम थी। सुजाता ने सोचा कि आज तो काव्या की छुट्टी होगी, शायद वो तसल्ली से बात कर सके। उसने फोन मिलाया। दो-तीन बार घंटी बजने के बाद फोन उठा।


"कैसी है मेरी बच्ची?" सुजाता ने चहकते हुए पूछा।


उधर से एक भारी और थकी हुई सी आवाज़ आई, "ठीक हूँ माँ।"


आवाज़ में वो खनक नहीं थी, जो काव्या की पहचान हुआ करती थी। "क्या हुआ काव्या? तेरी आवाज़ ऐसी क्यों लग रही है? और तू आजकल मुझसे ठीक से बात भी नहीं करती। क्या वहां सब ठीक तो है?" सुजाता का धैर्य अब जवाब दे रहा था।


काव्या, जो महीनों से अपने अंदर एक ज्वालामुखी दबाए बैठी थी, माँ की ममता भरी आवाज़ सुनकर फूट-फूट कर रो पड़ी।


सुजाता का दिल धक्क से रह गया। "रो मत मेरी बच्ची, मुझे बता क्या बात है? दामाद जी ने कुछ कहा?"


"नहीं माँ, वो तो अपने काम में व्यस्त रहते हैं। लेकिन सासू माँ... उनका बर्ताव बिलकुल अलग है। बैंक में दिन भर माथापच्ची करने के बाद जब मैं शाम को थकी-हारी घर लौटती हूँ, तो वो उम्मीद करती हैं कि मैं सीधे किचन में जाकर पूरे परिवार के लिए खाना बनाऊँ। जब मैं कहती हूँ कि मैं थक गई हूँ, तो ताना मारती हैं कि 'चार पैसे क्या कमाने लगी, खुद को घर का मालिक समझने लगी है। औरत की असली जगह तो रसोई ही होती है। हमने तो सोचा था पढ़ी-लिखी संस्कारी लड़की है, घर भी संभालेगी और बाहर भी, पर ये तो नखरे दिखाती है'।"


काव्या रोते हुए आगे बोली, "माँ, सुबह उठकर सबके लिए नाश्ता बनाओ, फिर भागकर बैंक जाओ, वहां दिन भर काम का तनाव झेलो और शाम को लौटकर फिर से वही बर्तन और चूल्हा। रविवार को भी छुट्टी नहीं मिलती। सासू माँ कहती हैं कि छुट्टी के दिन तो कम से कम घर को चमका कर रखो, पूरे हफ्ते तो तुम नदारद रहती हो। माँ, मेरा दम घुटता है यहाँ। मेरी मेहनत, मेरी नौकरी, सब उनकी नजरों में बस एक दिखावा है। उन्हें मेरी थकावट नहीं दिखती, उन्हें सिर्फ अपनी 'आदर्श बहू' चाहिए जो सुपरवुमन की तरह सब कुछ बिना थके कर सके।"


सुजाता सन्न रह गई। उसके कानों में सासू माँ के वो शब्द गूंजने लगे - 'हमें बहू नहीं, बेटी चाहिए।'


उसे एहसास हुआ कि यह समाज कितना खोखला है। यहाँ 'बेटी' शब्द का इस्तेमाल सिर्फ एक मीठे जुमले की तरह किया जाता है, ताकि लड़कियों के माता-पिता को तसल्ली दी जा सके और समाज में अपना बड़प्पन दिखाया जा सके। असलियत में एक बहू से इस समाज की उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं। उसे पढ़ा-लिखा और कमाने वाला तो होना चाहिए, ताकि घर का रुतबा बढ़े, लेकिन घर की चारदीवारी के अंदर उसे एक दासी की तरह ही खटना पड़ता है।


"सब समझ रही हूँ मैं..." सुजाता के अपने आंसू भी अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। "जमाना चाहे कितना भी बदल जाए, लेकिन औरतों को लेकर इस समाज की मानसिकता आज भी वहीं अटकी है। दुख तो इस बात का है काव्या, कि एक औरत के दर्द को दूसरी औरत, एक सास बनकर, कभी क्यों नहीं समझ पाती? क्यों एक माँ की ममता का रंग सास बनते ही अचानक गायब हो जाता है?"


उस रात फोन कटने के बाद सुजाता बहुत देर तक अंधेरे कमरे में बैठी रही। वो मोबाइल को सीने से लगाए बस यही सोच रही थी कि क्या कभी वो दिन आएगा जब किसी दूसरे के घर जाने वाली बेटी को सच में वो प्यार और सम्मान मिलेगा, जिसकी वो हकदार है, या ये 'बेटी' बनाने के वादे हमेशा ऐसे ही एक छलावा मात्र बनकर रह जाएंगे।


क्या आपको भी लगता है कि समाज में बहुओं से दोहरी उम्मीदें रखी जाती हैं और 'बेटी' कहने का वादा अक्सर खोखला साबित होता है? अपने विचार कमेंट करके जरूर बताएं।


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