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सोने का पिंजरा: एक अनकही घुटन

  समरजीत बिस्तर के किनारे बैठा और उसने अपनी टाई ढीली करते हुए बिल्कुल एक बॉस वाले अंदाज में कहना शुरू किया, "सृष्टि, तुम अब इस खानदान की बहू हो। मुझे यह बेवकूफी भरे फिल्मी ड्रामे, ये फूलों की सजावट और ये फालतू की महक बिल्कुल पसंद नहीं है। मेरे पास इतना समय नहीं है कि मैं तुम्हारे नखरे उठाऊं या कोई रोमांटिक पति बनने का नाटक करूं। विवाह मेरे लिए परिवार और समाज के प्रति एक जिम्मेदारी से ज्यादा कुछ नहीं है।"


सृष्टि जब लाल सुर्ख जोड़े में सजी, महकते हुए मोगरे के गजरे के साथ अपनी ससुराल की चौखट पर पहुंची थी, तो उसकी आँखों में एक सुनहरे भविष्य के अनगिनत सपने थे। वह स्वभाव से एक बेहद चुलबुली, सपनों में खोई रहने वाली और छोटी-छोटी चीजों में खुशियां तलाशने वाली लड़की थी। उसका विवाह शहर के एक बहुत ही रसूखदार और प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उसके पति, समरजीत सिंह, एक बड़े कारोबारी थे। बाहर से देखने वालों के लिए सृष्टि दुनिया की सबसे खुशकिस्मत लड़की थी, जिसे एक आलीशान हवेली और बेशुमार दौलत मिली थी। लेकिन, सृष्टि नहीं जानती थी कि यह आलीशान हवेली उसके लिए केवल एक ऐसा सोने का पिंजरा साबित होने वाली है, जिसकी तीलियाँ बहुत ठंडी और कठोर हैं। 


विवाह की पहली रात, जिसे लेकर हर नवविवाहिता के मन में एक अजीब सी झिझक और मीठे अरमान होते हैं, सृष्टि के लिए भी कुछ वैसी ही थी। कमरे को रजनीगंधा और गुलाब के फूलों से बड़ी ही खूबसूरती से सजाया गया था। सृष्टि पलंग के एक कोने में सिमटी बैठी थी। उसे मोगरे की महक बहुत पसंद थी, इसलिए उसने अपने बालों में मोगरे का एक भारी गजरा पहन रखा था। उसके दिल की धड़कनें तेज थीं। तभी दरवाजे की कुंडी खुली और समरजीत ने कमरे में कदम रखा। सृष्टि ने संकोच से अपनी नजरें झुका लीं, इस उम्मीद में कि अब कोई प्यार भरा शब्द उसके कानों में पड़ेगा। 


लेकिन समरजीत के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसकी आँखें किसी सर्द रात की तरह सर्द थीं। कमरे में आते ही उसने एक अजीब सी चिढ़ के साथ अपनी नाक सिकोड़ी। "यह कैसी अजीब और तेज गंध है इस कमरे में?" समरजीत ने रूखे स्वर में पूछा। 


सृष्टि घबरा गई। उसने धीमी आवाज में कहा, "वो... यह मोगरे का गजरा है। मुझे इसकी महक बहुत..."


सृष्टि अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि समरजीत ने आगे बढ़कर झटके से उसके बालों से वह गजरा खींचा और उसे पास ही रखे कचरे के डिब्बे में फेंक दिया। सृष्टि दर्द और हैरानी से बस उसे देखती रह गई। इसके बाद समरजीत ने बिस्तर पर बिछी गुलाब की पंखुड़ियों को अपने हाथों से बड़ी ही बेदर्दी से झटक कर नीचे गिरा दिया, जैसे वे कोई कचरा हों। 


सृष्टि का कोमल हृदय वहीं एक झटके में सहम गया। जिस रात को उसने अपने जीवन की सबसे खूबसूरत रात के रूप में देखा था, वह किसी डरावने सपने में तब्दील हो रही थी। 


समरजीत बिस्तर के किनारे बैठा और उसने अपनी टाई ढीली करते हुए बिल्कुल एक बॉस वाले अंदाज में कहना शुरू किया, "सृष्टि, तुम अब इस खानदान की बहू हो। मुझे यह बेवकूफी भरे फिल्मी ड्रामे, ये फूलों की सजावट और ये फालतू की महक बिल्कुल पसंद नहीं है। मेरे पास इतना समय नहीं है कि मैं तुम्हारे नखरे उठाऊं या कोई रोमांटिक पति बनने का नाटक करूं। विवाह मेरे लिए परिवार और समाज के प्रति एक जिम्मेदारी से ज्यादा कुछ नहीं है।"


सृष्टि की आँखों में आंसू तैरने लगे, लेकिन समरजीत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने अपनी हिदायतों का सिलसिला जारी रखा। "इस घर के कुछ नियम हैं, जिन्हें तुम्हें आज और अभी से अपने दिमाग में बैठा लेना चाहिए। पहली बात, तुम बिना वजह घर की बालकनी या खिड़कियों के पास खड़ी होकर बाहर नहीं झांकोगी। हमारे परिवार की औरतें इस तरह लोगों के सामने प्रदर्शन नहीं करतीं। दूसरी बात, इस घर में किसी भी नौकर से तुम जरूरत से ज्यादा बात नहीं करोगी। और सबसे अहम बात, घर के पश्चिमी हिस्से में मेरा अध्ययन कक्ष (स्टडी रूम) है, वहां मेरे काम के कागज होते हैं। बिना मेरी इजाजत के तुम कभी भी उस कमरे में कदम नहीं रखोगी। क्या तुम्हें मेरी सारी बातें समझ आ गईं?"


सृष्टि के गले में जैसे कोई कांटा अटक गया था। वह सिर्फ अपना सिर हिला पाई। उस रात सृष्टि को यह अहसास हो गया कि समरजीत की नजर में उसकी हैसियत सिर्फ एक 'भोग्या', एक शारीरिक आवश्यकता और इस बड़े से घर की एक सजी हुई गुड़िया से ज्यादा कुछ नहीं है। उसके लिए पत्नी का मतलब सिर्फ वंश आगे बढ़ाने वाली और समाज में उसके रुतबे के साथ चुपचाप खड़ी रहने वाली एक मूक मूर्ति था। प्यार, भावनाएं, और एक-दूसरे के मन को पढ़ने की कोशिश—ये सब समरजीत की डिक्शनरी में थे ही नहीं।


दिन बीतते गए और सृष्टि का चुलबुलापन उस बड़ी सी हवेली की खामोश दीवारों में कहीं दफन हो गया। वह एक ऐसी मशीन बन गई जो सुबह उठती, बिना आवाज किए घर के सारे नियम निभाती, और रात को एक अजनबी के साथ बिस्तर साझा करती। उसकी कोई भी इच्छा अब उसकी अपनी नहीं रही थी। उसे कौन सी साड़ी पहननी है, किस पार्टी में जाना है और वहां क्या बात करनी है, सब कुछ समरजीत तय करता था। 


कभी-कभी जब बारिश होती, तो सृष्टि का मन करता कि वह खिड़की खोलकर बारिश की बूंदों को महसूस करे, मिट्टी की सोंधी महक को अपने अंदर उतारे। लेकिन उसे तुरंत समरजीत की चेतावनी याद आ जाती और वह खिड़की के मोटे पर्दे खींच देती। इस शादी में सब कुछ था—सुरक्षा थी, पैसा था, समाज में रुतबा था, लेकिन वह आत्मा नहीं थी जो दो लोगों को एक करती है। 


कैसी विडंबना थी! बाहर के लोग सृष्टि को एक महारानी समझते थे, और सृष्टि अंदर ही अंदर घुट रही थी। नारी के मन की उस गहरी खाई को, उसकी उन छोटी-छोटी भावुक इच्छाओं को, एक पुरुष का अहंकार क्यों नहीं पढ़ पाता? सृष्टि यही सोचकर अपनी किस्मत से समझौता कर चुकी थी। उसने मान लिया था कि हमारे समाज में आज भी बहुत सी लड़कियों की नियति यही है—एक ऐसा जीवन जीना, जो बाहर से सोने का पिंजरा लगता हो, लेकिन जिसके अंदर परिंदे के पंख पहली ही रात काट दिए जाते हैं। उसने अपने आंसुओं को पी लेना सीख लिया था और अपनी उस प्यारी सी मुस्कान के पीछे अपनी सारी चीखें छुपा ली थीं।


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 लेखिका : नंदिता महाजन


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