दीपावली की छुट्टियों में बिना बताए अपने मायके पहुँचने का काव्या का फैसला उसके लिए इतना पीड़ादायक साबित होगा, यह उसने सपने में भी नहीं सोचा था। जैसे ही उसने घर का दरवाजा खोला, अंदर का सन्नाटा उसे कुछ अजीब लगा। अमूमन इस समय उसकी माँ, सुमित्रा देवी, रसोई में काम कर रही होती थीं या दालान में बैठकर स्वेटर बुन रही होती थीं। काव्या ने अपना बैग सोफे पर रखा और सीधे माँ के कमरे की तरफ बढ़ी।
कमरे में सुमित्रा देवी खिड़की के पास जमीन पर बैठी थीं। उनका सिर घुटनों में छिपा था और वे सिसक रही थीं। "माँ?" काव्या ने घबराकर पुकारा।
आवाज सुनते ही सुमित्रा देवी बुरी तरह चौंक गईं। उन्होंने झटपट अपना पल्लू चेहरे पर खींचा और अपनी सिसकियों को दबाते हुए एक झूठी और कांपती हुई मुस्कान के साथ बोलीं, "अरे काव्या! तू आ गई? बताया भी नहीं। ठहर, मैं अभी तेरे लिए चाय बनाती हूँ।"
सुमित्रा देवी जैसे ही उठने लगीं, काव्या की नजर उनके चेहरे पर पड़ गई। पल्लू खिसक चुका था। उनकी बायीं आँख के नीचे एक गहरा, नीला और सूजा हुआ निशान था। होंठ के किनारे से खून रिस कर सूख चुका था और उनकी कलाई पर किसी के जोर से दबोचने के लाल निशान साफ नजर आ रहे थे।
काव्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके हाथ से पानी का गिलास छूटकर जमीन पर गिर पड़ा और कांच के टुकड़े बिखर गए। वह दौड़कर अपनी माँ के पास गई और उनके चेहरे को अपने हाथों में थाम लिया।
माँ की यह दयनीय और लहूलुहान हालत देखकर काव्या की रुलाई फूट पड़ी। उसके जहन में बचपन की वो सारी डरावनी यादें ताजा हो गईं, जब उसके पिता, दीनानाथ जी, बात-बात पर माँ को बेल्ट और डंडों से पीटते थे। बाहर की दुनिया के लिए दीनानाथ जी एक बेहद सम्मानित और आदर्श रिटायर्ड स्कूल प्रिंसिपल थे, लेकिन घर की चारदीवारी के अंदर वे एक खूंखार तानाशाह से कम नहीं थे। काव्या बचपन में बिस्तर के नीचे छिपकर अपनी माँ की चीखें सुना करती थी। जब वह बड़ी हुई, तो उसने कई बार अपनी माँ से आवाज उठाने को कहा, लेकिन सुमित्रा देवी हमेशा यही कहकर उसे चुप करा देती थीं कि "पति का घर ही औरत का असली घर होता है, और थोड़े बहुत झगड़े तो हर परिवार में होते हैं।"
पर आज काव्या वह डरी हुई छोटी बच्ची नहीं थी। वह शहर में रहकर एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली एक स्वतंत्र और आत्मविश्वासी महिला बन चुकी थी।
काव्या ने अपने आंसुओं को सख्ती से पोंछा। उसकी आँखों में अब दुख नहीं, बल्कि एक धधकता हुआ आक्रोश था। उसने अपनी माँ का हाथ कसकर पकड़ा और बेहद शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोली, "माँ, चलो उठो। अपना सारा सामान पैक करो और तैयार हो जाओ। हमें अभी इसी वक्त पुलिस स्टेशन चलना है।"
सुमित्रा देवी अपनी बेटी के मुंह से 'पुलिस स्टेशन' शब्द सुनकर बुरी तरह सिहर उठीं। उनके चेहरे पर चोट के दर्द से ज्यादा समाज का खौफ उभर आया। उन्होंने काव्या का हाथ झटकते हुए अनुनयपूर्वक कहा, "क्या पागल हो गई है तू? कैसी बातें कर रही है? अभी यह बात सिर्फ इस बंद कमरे तक है। अगर पुलिस घर आ गई, तो कल को आस-पड़ोस, समाज-बिरादरी और नाते-रिश्तेदारों तक बात फैल जाएगी। तेरे पिता की इतनी इज्जत है शहर में। लोग क्या कहेंगे? हमारी कितनी बदनामी होगी! तेरे छोटे भाई की शादी होने वाली है, उसके ससुराल वाले क्या सोचेंगे? नहीं बेटी, मैं यह सब नहीं कर सकती।"
सुमित्रा देवी फफक कर रो पड़ीं। वे सदियों से चली आ रही उसी पितृसत्तात्मक सोच की बेड़ियों में जकड़ी हुई थीं, जहाँ औरत की पीड़ा से ज्यादा समाज की खोखली इज्जत मायने रखती है।
काव्या ने अपनी माँ के कंधे पकड़े और उन्हें झकझोरते हुए कहा, "जिसको जो सोचना है सोचने दो माँ! मगर अब मैं तुम्हें और जुल्म सहने नहीं दूंगी। क्या पिता जी की इज्जत तुम्हारे इन बहते हुए घावों पर टिकी है? वो समाज कहाँ है माँ, जब रात के अंधेरे में तुम दर्द से तड़पती हो? क्या पड़ोसियों ने आकर कभी तुम्हारे घावों पर मरहम लगाया? माँ, तुम समझती क्यों नहीं हो... जुल्म करना जितना बड़ा अपराध है, बिना कुछ कहे जुल्म सहना उससे भी बड़ा अपराध है। और आज तक तुम यही अपराध करती आई हो।"
सुमित्रा देवी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने अपनी बेटी की आँखों में एक ऐसी सच्चाई देखी, जिसे वे आज तक नजरअंदाज करती आई थीं।
"माँ," काव्या की आवाज अब नरम पड़ चुकी थी, लेकिन उसका संकल्प अटल था। "तुमने हमेशा मुझे मजबूत बनना सिखाया। मुझे पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा किया ताकि मैं किसी पर निर्भर न रहूँ। फिर तुम अपने लिए इतनी कमजोर क्यों हो? क्या विवाह का मतलब यह है कि कोई इंसान तुम्हें एक जानवर की तरह पीटे और तुम 'सुहाग' के नाम पर अपनी जान दे दो? अगर आज तुमने कदम नहीं उठाया, तो याद रखना माँ, तुम अपनी बेटी को हमेशा के लिए खो दोगी। क्योंकि मैं अपनी जन्मदात्री को हर रोज घुट-घुट कर मरते हुए नहीं देख सकती।"
सुमित्रा देवी के भीतर जैसे कोई बरसों पुराना बाँध टूट गया। उन्होंने अपनी जिंदगी के पैंतीस साल उस आदमी की गुलामी में गुजार दिए थे जिसने उन्हें कभी एक इंसान का दर्जा नहीं दिया। 'लोग क्या कहेंगे' के डर ने उनसे उनका आत्मसम्मान, उनकी खुशियां और उनकी पहचान सब कुछ छीन लिया था।
काव्या ने अलमारी खोली और एक बैग में अपनी माँ के कुछ कपड़े ठूंस दिए। उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ा और उन्हें कमरे से बाहर ले आई। दालान में दीनानाथ जी अख़बार पढ़ रहे थे। अपनी पत्नी को बैग के साथ बेटी के पीछे-पीछे जाते देख उनका अहंकार फुफकार उठा।
"यह क्या तमाशा है? कहाँ जा रही हो तुम दोनों?" उन्होंने अपनी चिर-परिचित कड़क और रौबदार आवाज में कहा।
सुमित्रा देवी एक पल के लिए ठिठकीं, लेकिन काव्या ने पलटकर अपने पिता की आँखों में वो आग दिखाई, जो आज तक इस घर में किसी ने नहीं दिखाई थी। "हम पुलिस स्टेशन जा रहे हैं, मिस्टर दीनानाथ। और अब आप अपनी ये झूठी इज्जत की कहानी पुलिस इंस्पेक्टर को ही सुनाइएगा।"
दीनानाथ जी का अख़बार हाथ से छूट गया। उनकी आवाज गले में ही अटक गई। सुमित्रा देवी ने पहली बार बिना अपना पल्लू नीचा किए, सीना तानकर अपने घर की उस चौखट को पार किया, जो उनके लिए एक जेल बन चुकी थी।
उस दिन एक बेटी ने न सिर्फ अपनी माँ को उस नर्क से आज़ाद कराया, बल्कि समाज के उन खोखले रिवाजों के मुंह पर भी एक करारा तमाचा जड़ा जो एक औरत की चीख को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखना चाहते हैं।
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लेखिका : नीरा आहूजा
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