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मायके की चौखट

 दोपहर का वक्त था। घर के काम निपटाकर राधिका अपने सात साल के बेटे आरव को स्कूल से लेकर लौटी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर 'माँ' लिखा देख राधिका के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई, लेकिन दिल के किसी कोने में एक अजीब सी घबराहट भी थी। राधिका आठ महीने की गर्भवती थी और उसके मायके से लगातार उसे डिलीवरी के लिए घर बुलाने का दबाव आ रहा था।

"हेलो माँ, कैसी हो?" राधिका ने फोन उठाते ही पूछा।

दूसरी तरफ से माँ की ममता से भरी लेकिन कुछ उदास सी आवाज आई, "मैं तो ठीक हूँ बिटिया, पर तू कब आ रही है? आठवां महीना खत्म होने वाला है। तेरे बाबूजी भी रोज पूछते हैं कि राधिका कब आएगी। पहला बच्चा भी तो यहीं हुआ था, इस बार भी तू यहीं आ जा। मेरी आंखों के सामने रहेगी तो तसल्ली रहेगी।"

राधिका ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी सांस लेते हुए अपने मन को कठोर किया। "माँ, मैंने आपको कल भी बताया था न, इस बार मैं डिलीवरी के लिए वहां नहीं आ पाऊंगी। आरव अब बड़ा हो गया है, उसकी पढ़ाई का नुकसान होगा। और फिर, यहाँ मेरी डॉक्टर बहुत अच्छी है, मेरी पूरी हिस्ट्री उन्हें पता है। मैं यहीं ससुराल में ही अपनी डिलीवरी करवाऊंगी।"

माँ की आवाज में एक पीड़ा छलक उठी, "बेटा, आरव की छुट्टियां पड़ने वाली हैं। और डॉक्टर तो यहाँ भी अच्छे हैं। तू बहाने मत बना। मुझे पता है तू क्यों नहीं आना चाहती..."

माँ आगे कुछ कह पाती, उससे पहले ही राधिका ने बात काटते हुए कहा, "नहीं माँ, ऐसी कोई बात नहीं है। बस यहाँ सब सेट है। आप लोग परेशान मत होइए, मैं फोन रखती हूँ, आरव को खाना देना है।" राधिका ने जल्दी से फोन काट दिया क्योंकि वह जानती थी कि अगर वह थोड़ी देर और बात करती, तो उसके आंसू छलक पड़ते।

राधिका की सास, सुमित्रा जी, जो दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थीं, अंदर आईं। उन्होंने राधिका के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "राधिका, तुम्हारी माँ का फोन था न? वो तुम्हें डिलीवरी के लिए बुला रही हैं। तू मना क्यों कर रही है? पहली डिलीवरी में भी तो बेटियां मायके ही जाती हैं और दूसरी में भी। तू चली जा, आरव को मैं और समीर मिलकर संभाल लेंगे। तू आराम से अपने मायके जा।"

राधिका ने अपनी सास की तरफ देखा और एक फीकी सी मुस्कान के साथ बोली, "नहीं माँ जी, मैं सच कह रही हूँ। मुझे कहीं नहीं जाना। मेरा घर अब यही है, और मेरी डिलीवरी भी यहीं होगी।"

सुमित्रा जी एक सुलझी हुई महिला थीं। उन्होंने राधिका के चेहरे पर छिपी उस पीड़ा को पढ़ लिया था जिसे वह शब्दों में बयां नहीं कर पा रही थी। उन्होंने राधिका का हाथ अपने हाथों में लिया और पास ही पलंग पर बैठते हुए बोलीं, "बेटियां अपने मायके जाने से तभी कतराती हैं, जब उस आंगन में उनका सम्मान कम हो जाता है। मुझे सच-सच बता राधिका, बात क्या है?"

सास के इतने अपनेपन से पूछने पर राधिका के सब्र का बांध टूट गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह सुबकते हुए बोली, "माँ जी, जब आरव होने वाला था, तब मैं पूरे तीन महीने मायके में रही थी। माँ और बाबूजी ने मेरी बहुत सेवा की, लेकिन मेरी भाभी, पल्लवी, को मेरा वहां रहना बिल्कुल रास नहीं आया। वो बात-बात पर माँ को ताने मारती थीं। कभी मेरे खाने के खर्च को लेकर, तो कभी अस्पताल के बिल को लेकर। 'शादीशुदा ननद को सिर पर बिठा रखा है', 'हमारे खर्चे कम हैं जो अब इनका भी बोझ उठाएं'—ये सब बातें भाभी अक्सर जोर-जोर से कहती थीं ताकि मुझे सुनाई दे।"

राधिका ने आंसू पोंछते हुए आगे कहा, "माँ मेरी वजह से वो सब चुपचाप सुनती थीं, क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि मुझे कोई तकलीफ हो। मेरे भैया भी अपनी पत्नी के सामने कुछ नहीं बोल पाते थे। माँ जी, जिस मायके में मैं पैदा हुई, पली-बढ़ी, वहां मेरे ही नाम पर मेरी माँ को जलील किया जाए, यह मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। एक बेटी कभी नहीं चाहती कि उसकी वजह से उसके माँ-बाप को बुढ़ापे में किसी के ताने सुनने पड़ें। इसलिए मैंने सोच लिया है कि मैं इस बार अपनी माँ को मेरी वजह से रोने नहीं दूंगी। मैं नहीं जाऊंगी मायके।"

सुमित्रा जी की आंखें भी नम हो गईं। उन्होंने राधिका को गले से लगा लिया और उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, "तू बिल्कुल सही कर रही है मेरी बच्ची। एक औरत का असली घर वही होता है जहाँ उसके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे। क्या हुआ अगर तेरा मायका वहां है? क्या मैं तेरी माँ नहीं हूँ? तू यहीं रहेगी। तेरी डिलीवरी मैं करवाऊंगी, बिल्कुल एक सगी माँ की तरह। तुझे मायके की कोई कमी महसूस नहीं होने दूंगी।"

उस दिन राधिका को एहसास हुआ कि मायका सिर्फ ईंट-पत्थर का वह मकान नहीं होता जहाँ हमने जन्म लिया है, बल्कि मायका वह छांव है जहाँ हमें निस्वार्थ प्रेम और सम्मान मिले, चाहे वह हमारी सास का ही आंगन क्यों न हो।

पर सवाल यह उठता है कि आखिर शादी के बाद एक बेटी अपने ही घर में मेहमान और फिर बोझ क्यों बन जाती है? वो भाभियां जो खुद किसी घर की बेटी होती हैं, वे क्यों अपनी ननद को मायके में दो दिन चैन से रहने नहीं देतीं? क्या शादी के बाद एक बेटी का अपने माता-पिता और अपने घर पर कोई अधिकार नहीं रह जाता?

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या राधिका का फैसला सही था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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लेखिका : रीमा साहू


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