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रिश्तों की आंच पर पकी मिठा

दोनों एक-दूसरे का उतरा हुआ चेहरा देख रही थीं। आज उनकी भारी बेइज्जती होने वाली थी। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने सब कुछ बिगाड़ दिया है। तभी अचानक किचन के बाहर भारी कदमों की आहट हुई। यह आहट रुक्मिणी देवी की थी। उनके चलने की खनकदार आवाज से ही पूरा घर शांत हो जाया करता था।


जैसे ही रुक्मिणी देवी ने किचन में कदम रखा, अवनि और श्रुति दोनों डर के मारे एक तरफ सिमट गईं। रुक्मिणी देवी ने अपने रौबदार चेहरे और तीखी नजरों से पूरे किचन का मुआयना किया। बिखरा हुआ स्लैब, उफना हुआ दूध, और कड़ाही में पड़ा अजीब सा दिखने वाला हलवा। उन्होंने दोनों बहुओं के पीले पड़े चेहरों को देखा, जिनकी आंखों में आंसू छलकने को बेताब थे।


"बाकी सब लड़कियां बाहर जाकर डाइनिंग टेबल सजाएं और जब तक मैं न कहूं, कोई किचन में नहीं आएगा," रुक्मिणी देवी ने अपनी भारी आवाज में आदेश दिया। पल भर में ही किचन खाली हो गया और दरवाजा अंदर से बंद हो गया।


बनारस के प्रतिष्ठित ‘आनंद भवन’ में पिछले एक हफ्ते से शहनाइयों की गूंज और मेहमानों की चहल-पहल कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। हवेली के बड़े आंगन में फूलों की सजावट अभी भी ताजी थी। मौका ही कुछ ऐसा था—आनंद भवन की मालकिन, राजमाता के नाम से मशहूर, रुक्मिणी देवी के दोनों पोतों, शौर्य और कबीर का विवाह एक साथ संपन्न हुआ था। पूरा शहर इस शाही शादी की चर्चा कर रहा था। विवाह की सभी बड़ी रस्में अब पूरी हो चुकी थीं और दूर-दराज के मेहमान धीरे-धीरे अपने घरों की ओर प्रस्थान करने लगे थे, लेकिन हवेली में अभी भी करीब पचास से साठ करीबी रिश्तेदारों का जमावड़ा लगा हुआ था।


आज हवेली में एक अलग ही सुगबुगाहट थी। आज दोनों नई बहुओं, अवनि और श्रुति की 'पहली रसोई' की रस्म थी। आनंद भवन की परंपरा के अनुसार, नई बहुओं को अपने हाथों से घर के सभी सदस्यों के लिए कुछ मीठा बनाकर खिलाना होता था। यह महज एक रस्म नहीं थी, बल्कि यह घर की स्त्रियों द्वारा बहुओं के धैर्य, उनकी पाक कला और उनके संस्कारों को परखने की एक अघोषित परीक्षा होती थी। अवनि और श्रुति दोनों ही दिल्ली की रहने वाली थीं। उच्च शिक्षा प्राप्त और कॉर्पोरेट दुनिया में काम करने वाली इन दोनों लड़कियों ने कभी इतने बड़े संयुक्त परिवार का सामना नहीं किया था, जहां बात-बात पर परंपराओं का हवाला दिया जाता हो।


सुबह-सुबह घर की औरतों ने तय किया कि अवनि 'मूंग दाल का हलवा' बनाएगी और श्रुति 'केसरिया रसमलाई' तैयार करेगी। जब दोनों बहुओं ने किचन में प्रवेश किया, तो वहां रखे बड़े-बड़े बर्तनों और राशन के ढेर को देखकर उनके होश उड़ गए। साठ लोगों के लिए खाना बनाना! उन्होंने तो आज तक अपने छोटे से परिवार में चार लोगों से ज्यादा का खाना नहीं बनाया था। अवनि के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं और श्रुति के हाथ हल्के-हल्के कांपने लगे।


"अवनि, यह मूंग की दाल तो पांच किलो से भी ज्यादा लग रही है, इसे भूनने में तो मेरी पूरी जान निकल जाएगी," श्रुति ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा।


"मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा श्रुति। ऊपर से यह रसमलाई का दूध... इसे गाढ़ा करने में तो घंटों लग जाएंगे। अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो बड़ी मां क्या कहेंगी?" अवनि की आवाज में डर साफ झलक रहा था।


रुक्मिणी देवी, जिन्हें सब 'बड़ी मां' कहते थे, पूरे घर में अपने सख्त मिजाज और कड़े अनुशासन के लिए जानी जाती थीं। उनका एक-एक शब्द पत्थर की लकीर होता था। घर का कोई भी सदस्य, यहां तक कि उनके बेटे भी, उनके फैसले के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं करते थे। दोनों बहुओं ने अपने-अपने पतियों से बड़ी मां के गुस्से के किस्से सुन रखे थे, जिससे उनका तनाव और भी बढ़ गया था।


किचन का माहौल तब और भी घबराहट भरा हो गया जब शौर्य और कबीर की चचेरी बहनें और बुआएं वहां आ पहुंचीं। "अरे वाह! नई बहुएं तो बड़ी मेहनत कर रही हैं। लेकिन ध्यान रखना, बड़ी मां को मीठे में जरा सी भी कमी बर्दाश्त नहीं है। पिछली बार बड़ी चाची ने खीर में चीनी कम डाल दी थी, तो उन्होंने पूरी खीर गाय को खिला दी थी," एक ननद ने हंसते हुए ताना मारा। दूसरी ने कहा, "हां, और यह मूंग दाल का हलवा... अगर कच्चा रह गया तो दातों में चिपकेगा और फिर जो डांट पड़ेगी, वह अलग।" यह कहकर वे खिलखिलाती हुई वहां से चली गईं, लेकिन अवनि और श्रुति को और भी ज्यादा डरा गईं।


डर और घबराहट के बीच दोनों ने किसी तरह अपना-अपना काम शुरू किया। अवनि ने कड़ाही में घी डालकर मूंग की दाल भूनना शुरू किया, लेकिन घबराहट में आंच तेज होने के कारण दाल नीचे से चिपकने लगी और उसमें से हल्की-हल्की जलने की महक आने लगी। उसने हड़बड़ाहट में पानी डाल दिया, जिससे हलवा भुनने के बजाय एक अजीब सा गीला और गांठदार लेप बन गया। दूसरी तरफ, श्रुति रसमलाई के लिए दूध गाढ़ा कर रही थी, लेकिन ध्यान भटकने के कारण दूध उफन कर बर्तन से बाहर गिर गया और जो बचा वह बहुत ही पतला रह गया। उसमें वह मलाईदार गाढ़ापन बिल्कुल नहीं आ रहा था जो एक अच्छी रसमलाई में होना चाहिए। ऊपर से, उसने छैने के रसगुल्ले चाशनी से निकालकर गरम दूध में डाल दिए, जिससे वे चपटे और सख्त हो गए।


दोनों एक-दूसरे का उतरा हुआ चेहरा देख रही थीं। आज उनकी भारी बेइज्जती होने वाली थी। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने सब कुछ बिगाड़ दिया है। तभी अचानक किचन के बाहर भारी कदमों की आहट हुई। यह आहट रुक्मिणी देवी की थी। उनके चलने की खनकदार आवाज से ही पूरा घर शांत हो जाया करता था।


जैसे ही रुक्मिणी देवी ने किचन में कदम रखा, अवनि और श्रुति दोनों डर के मारे एक तरफ सिमट गईं। रुक्मिणी देवी ने अपने रौबदार चेहरे और तीखी नजरों से पूरे किचन का मुआयना किया। बिखरा हुआ स्लैब, उफना हुआ दूध, और कड़ाही में पड़ा अजीब सा दिखने वाला हलवा। उन्होंने दोनों बहुओं के पीले पड़े चेहरों को देखा, जिनकी आंखों में आंसू छलकने को बेताब थे।


"बाकी सब लड़कियां बाहर जाकर डाइनिंग टेबल सजाएं और जब तक मैं न कहूं, कोई किचन में नहीं आएगा," रुक्मिणी देवी ने अपनी भारी आवाज में आदेश दिया। पल भर में ही किचन खाली हो गया और दरवाजा अंदर से बंद हो गया।


अवनि और श्रुति ने आंखें बंद कर लीं। उन्हें लगा कि अब उनकी डांट पड़ने वाली है। लेकिन तभी रुक्मिणी देवी की आवाज में एक अजीब सी नरमी और अपनापन सुनाई दिया, जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुना था।


"घबराओ मत बच्चियों... जानती हूं, इतने सारे लोगों के लिए पहली बार खाना बनाना आसान नहीं होता," रुक्मिणी देवी ने आगे बढ़ते हुए कहा। अवनि ने अचरज से आंखें खोलीं।


उन्होंने अवनि की कड़ाही की तरफ देखा। "हलवा चिपक गया है और दाल कच्ची है। कोई बात नहीं।" रुक्मिणी देवी ने तुरंत एक बड़ी नॉन-स्टिक कड़ाही निकाली। उसमें थोड़ा और शुद्ध देसी घी डाला और अवनि के बनाए लेप को उसमें पलट दिया। उन्होंने फुर्ती से एक कटोरी में गर्म दूध, थोड़ा सा मावा (खोया) और ढेर सारा इलायची पाउडर मिलाया और उसे हलवे में डालकर धीमी आंच पर भूनने लगीं। खोये और दूध ने कच्ची दाल को तुरंत सोख लिया और जलने की महक को इलायची की तेज खुशबू ने पूरी तरह से दबा दिया। कुछ ही मिनटों में हलवे का रंग सुनहरा हो गया और उसमें से एक बेहतरीन सोंधी महक उठने लगी।


"बड़ी मां... वह... मुझसे..." अवनि हकलाते हुए कुछ कहना चाह रही थी।

"अरे चुप रह पगली! मैंने भी जब पहली रसोई बनाई थी, तो खीर की जगह दलिया बन गया था," रुक्मिणी देवी ने आंख मारते हुए एक ऐसा राज खोला, जिसे सुनकर अवनि की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बह निकले। उसने झट से आगे बढ़कर रुक्मिणी देवी के पैर छू लिए। "जीते रहो बेटा," उन्होंने अवनि के सिर पर हाथ फेरा।


अब बारी श्रुति की थी। रुक्मिणी देवी ने रसमलाई का बर्तन देखा। "दूध बहुत पतला है और रसगुल्ले सख्त हो गए हैं। कोई बात नहीं, इसे 'रसमलाई' नहीं, आज हम 'शाही मलाई कुल्फी डेजर्ट' का नाम देंगे।"


रुक्मिणी देवी ने श्रुति को फ्रिज से कस्टर्ड पाउडर और कंडेंस्ड मिल्क निकालने को कहा। उन्होंने थोड़े से ठंडे दूध में कस्टर्ड पाउडर घोला और उसे उबलते हुए पतले दूध में मिला दिया। पलक झपकते ही दूध एकदम गाढ़ा और मखमली हो गया। फिर उन्होंने कंडेंस्ड मिल्क डालकर मिठास संतुलित की। सख्त हो चुके छैने के रसगुल्लों को उन्होंने छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा और उस गाढ़ी मखमली रबड़ी में मिला दिया। ऊपर से ढेर सारे कटे हुए पिस्ते, बादाम और केसर के धागे डाल दिए। डिश देखने में इतनी शाही और खूबसूरत लग रही थी कि बड़े-बड़े हलवाई भी मात खा जाएं।


श्रुति अवाक खड़ी यह सब देख रही थी। जिस औरत को पूरा घर एक सख्त और कठोर शासक मानता था, उसके अंदर एक इतनी ममतामयी और समझदार मां छिपी होगी, यह किसी ने सोचा भी नहीं था। श्रुति ने भी रुक्मिणी देवी के पैर छुए और उनकी आंखों में झांकते हुए बिना कुछ कहे अपना सारा धन्यवाद व्यक्त कर दिया।


"चलो, अब जल्दी से इसे सुंदर-सुंदर कांच के बाउल में निकालो। बाहर सब इंतजार कर रहे होंगे," रुक्मिणी देवी ने अपना पल्लू ठीक करते हुए वापस अपने पुराने रौबदार अंदाज में कहा और किचन से बाहर चली गईं।


कुछ ही देर बाद, जब डाइनिंग टेबल पर अवनि का 'शाही मूंग दाल हलवा' और श्रुति का 'केसरिया मलाई डेजर्ट' परोसा गया, तो पूरे घर में तारीफों के पुल बंध गए।


"वाह भाभी! क्या हलवा बनाया है, एकदम मुंह में घुल रहा है," शौर्य के छोटे भाई ने उंगलियां चाटते हुए कहा।

"और यह डेजर्ट तो मैंने आज तक किसी फाइव स्टार होटल में भी नहीं खाया। इसका टेक्सचर कितना शानदार है," फूफा जी ने तारीफ करते हुए कहा।


जिन ननदों ने सुबह ताने मारे थे, वे भी चुपचाप कटोरियां साफ करने में लगी थीं। शौर्य और कबीर दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों को गर्व से देखा। लेकिन अवनि और श्रुति की नजरें सिर्फ एक ही चेहरे को ढूंढ रही थीं—रुक्मिणी देवी।


रुक्मिणी देवी अपनी बड़ी सी कुर्सी पर बैठीं मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं। जब रस्म के अनुसार नेग देने की बारी आई, तो उन्होंने दोनों बहुओं को अपने पास बुलाया। उन्होंने दोनों को सोने के भारी कंगन पहनाए और जब उन्होंने बहुओं के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखा, तो अवनि और श्रुति को लगा जैसे उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गई हो। दोनों ने एक बार फिर रुक्मिणी देवी के पैर छुए, लेकिन इस बार डर से नहीं, बल्कि असीम श्रद्धा और प्यार से।


उस दिन अवनि और श्रुति ने सिर्फ एक बेहतरीन डिश ही नहीं बनाई थी, बल्कि उन्होंने आनंद भवन के उस कठोर अनुशासन के पीछे छिपे परिवार के गहरे प्यार और सहयोग का वह मीठा स्वाद भी चख लिया था, जो जिंदगी भर उनके रिश्तों को मजबूती से बांधे रखने वाला था। हवेली की उन पुरानी दीवारों ने आज दो नई पीढ़ियों के बीच पनपते एक खूबसूरत और अनकहे विश्वास को महसूस किया था।


दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के समय में भी संयुक्त परिवारों में नई बहुओं को इसी तरह प्यार और मार्गदर्शन की जरूरत होती है? क्या आपने भी कभी अपनी पहली रसोई में कोई ऐसी ही मीठी सी गड़बड़ की है? अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!


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