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स्वाद का इम्तिहान और ममता की मिठा

विवाह के बंधन में बंधकर जब अंकिता ने पहली बार इस प्रतिष्ठित और भरे-पूरे घर की दहलीज पर कदम रखा था, तो उसके मन में उम्मीदों का एक पूरा संसार था। अंकिता ने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर किया था और साथ ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का उसका सपना था। अंकिता के ससुर, विश्वनाथ जी, जो एक रिटायर्ड प्रिंसिपल थे, अपनी इस पढ़ी-लिखी बहू के गुणों के मुरीद थे। जब भी मोहल्ले का कोई व्यक्ति घर आता, विश्वनाथ जी गर्व से कहते, "हमारी बहू केवल रूप की ही नहीं, गुणों की भी धनी है। घर-गृहस्थी और पढ़ाई-लिखाई का ऐसा सुंदर संगम बहुत कम देखने को मिलता है।"

ससुर जी के इन शब्दों से अंकिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता, लेकिन घर के भीतर की हकीकत कुछ और ही थी। उसकी सासू माँ, राजेश्वरी देवी, पुराने खयालात की और बेहद कड़क मिज़ाज महिला थीं। उन्हें बहू की हर बात में कोई न कोई कमी निकालने की आदत थी। चाय में थोड़ी चीनी कम रह जाए, तो ताना; झाड़ू के बाद कोने में तिनका दिख जाए, तो ताना। राजेश्वरी देवी का एक तकियाकलाम बन गया था—"किताबें चाटने से घर नहीं चलते। आजकल की लड़कियों को डिग्री का घमंड होता है, पर रसोई का ककहरा तक नहीं आता।"

विश्वनाथ जी कई बार पत्नी को समझाने की कोशिश करते, "अरे राजेश्वरी, बच्ची अभी नई है। धीरे-धीरे सब सीख जाएगी।" लेकिन सासू माँ की त्योरियाँ चढ़ जातीं और वह बुदबुदातीं, "सीखने की उम्र मायके में होती है, ससुराल में तो परीक्षा ली जाती है।" अंकिता अक्सर आँसू पीकर रह जाती और खुद से वादा करती कि अगली बार वह कोई गलती नहीं होने देगी।

दिवाली का पावन त्योहार सिर पर था। पूरे घर में साफ-सफाई और सजावट का दौर चल रहा था। इस परिवार की पुरानी परंपरा थी कि त्योहार के पकवान बाज़ार से नहीं खरीदे जाते थे। बेसन के लड्डू, मठरी, चकली और समोसे सब कुछ घर पर ही बनता था। अंकिता अपने मायके में दिवाली पर गुलाब जामुन और मिठाइयाँ तो माँ के साथ खूब बनवाती थी, लेकिन कुरकुरी मठरियां और खस्ता मिनी-समोसे बनाना उसने कभी नहीं सीखा था। उसके मायके में नमकीन हमेशा बाज़ार की मशहूर दुकान से मंगाया जाता था।

त्योहार से दो दिन पहले सुबह की धूप आँगन में फैली हुई थी। राजेश्वरी देवी ने रसोई में मैदा गूँथकर तैयार किया, उसमें अजवाइन और घी का मोयन डालकर एक बड़ा परात अंकिता के सामने रख दिया।

"चल बहू, आज तेरी पहली परीक्षा है। ये समोसों की पपड़ी बेलना शुरू कर। अगर समोसे खस्ता नहीं बने, तो आने वाले रिश्तेदारों के सामने मेरी नाक कट जाएगी," राजेश्वरी देवी ने फरमान सुनाया।

अंकिता ने मन ही मन ईश्वर को याद किया और पूरे उत्साह के साथ बेलन संभाल लिया। उसने लोई बनाई और उसे गोल-गोल बेलना शुरू किया। उसने दो समोसों की पट्टियाँ बेलकर थाली में रखी ही थीं कि तभी पास खड़ी राजेश्वरी देवी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।

"बस! यही उम्मीद थी तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई से!" राजेश्वरी देवी की आवाज़ इतनी तेज़ और कर्कश थी कि बैठक तक गूँज गई। "मैंने तुमसे हलवाई जैसे समोसे की पट्टी बेलने को कहा है या पूरी बना रही हो? इतना मोटा और गोल बेलोगी, तो समोसा बनेगा या पापड़? तुम्हारी माँ ने कुछ सिखाकर भी भेजा है या सिर्फ किताबें थमा दी थीं?"

अपनी माँ का नाम सुनते ही अंकिता के कलेजे में एक हूक सी उठी। आँखों में गर्म आँसू उमड़ आए। अगर वह अपने मायके में होती, तो शायद बेलन फेंककर कमरे में चली जाती और माँ उसे पुचकार कर मनाती। लेकिन यह ससुराल था; यहाँ रूठने का हक केवल दूसरों को होता था, सहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ बहू की थी। उसने अपने आँसुओं को पल्लू के कोने से पोंछा और चुपचाप पतली, लंबी पट्टियाँ बेलने लगी।

आवाज़ सुनकर बैठक में अखबार पढ़ रहे विश्वनाथ जी चश्मा ठीक करते हुए रसोई में आ गए। "अरे राजेश्वरी, बात-बात पर बच्ची के मायके को बीच में क्यों घसीटती हो? नई बहू है, प्यार से बता दो कि समोसों की पट्टी थोड़ी लंबी और पतली बेली जाती है। इसमें इतना महाभारत करने की क्या ज़रूरत है?"

"हर बात में आप ही वकालत करने चले आया कीजिए। कल को जब समोसे कड़े हो जाएँगे और रिश्तेदार हँसेंगे, तब मेरी ही इज़्ज़त जाएगी," राजेश्वरी देवी ने मुँह बनाकर जवाब दिया।

अंकिता ने ससुर जी की तरफ कृतज्ञता भरी नज़रों से देखा और अपनी पूरी एकाग्रता काम में लगा दी। उसने बहुत ही ध्यान से, बारीक और लंबी पट्टियाँ बेलीं, अंदर आलू और मसालों का भरावन भरा और बहुत सलीके से समोसों को आकार दिया। जब पहली खेप तेल में धीमी आँच पर तलने के लिए डाली गई, तो रसोई से सोंधी-सोंधी महक उठने लगी।

तलने के बाद समोसे एकदम सुनहरे, खस्ता और मनमोहक लग रहे थे। विश्वनाथ जी से खुशबू के मारे रहा नहीं गया। वे कटोरी लेकर रसोई में आए, "अरे वाह! क्या खुशबू है। ज़रा एक चखने को दो।"

उन्होंने एक गरमा-गरम समोसा उठाया और पहला निवाला लेते ही उनके चेहरे पर तृप्ति की मुस्कान फैल गई। "लाजवाब! बिल्कुल बाज़ार से भी बेहतर। देखा राजेश्वरी, मैंने कहा था ना कि बहू बहुत समझदार है। एक बार में ही सब सीख लिया। इतना कुरकुरा और स्वादिष्ट समोसा तो मैंने बरसों से नहीं खाया।"

सासू माँ को अपनी तारीफ़ के बजाय बहू की तारीफ़ पचना ज़रा मुश्किल था। वे तुनककर आईं, उन्होंने एक समोसा तोड़ा और मुँह बनाकर बोलीं, "इतना ज़्यादा तलने की क्या ज़रूरत थी? समोसे बहुत ज़्यादा सिक गए हैं। बाद में कड़े हो जाएँगे। थोड़ा हल्का तला करो, इन्हें कुछ नहीं पता।"

अंकिता ने बेबसी से सास की ओर देखा। तेल में तैर रहे बाकी समोसों को उसने सासू माँ के कहे अनुसार जल्दी ही कड़ाही से बाहर निकाल लिया। इस तरह लगभग एक तिहाई समोसे कम सिके, हल्के पीले और अंदर से थोड़े कच्चे रह गए।

शाम को जब अंकिता का पति, सुमित, ऑफिस से लौटा, तो उसने बड़ी उम्मीद से नाश्ता माँगा। अंकिता ने हिचकिचाते हुए वही कम सिके हुए समोसे एक प्लेट में हरी चटनी के साथ सुमित को दिए। सुमित ने पहला कौर लिया और उसका मुँह बन गया।

"अंकिता, ये क्या है? समोसा बिल्कुल कच्चा और बेस्वाद लग रहा है। पपड़ी अंदर से सिक ही नहीं पाई है," सुमित ने प्लेट किनारे सरकाते हुए कहा।

उसी समय अंकिता का देवर, मयंक, भी बाहर से खेलकर आया और उसने भी समोसा खाया। "भाभी, ये समोसे तो बिल्कुल भी अच्छे नहीं बने। ऐसा लग रहा है जैसे कच्चा मैदा चबा रहे हों।"

कमरे से निकलकर तुरंत राजेश्वरी देवी दालान में आ गईं और सारा ठीकरा अंकिता के सिर फोड़ते हुए बोलीं, "अब तुम ही देखो बच्चों! मैंने तो कितनी बार समझाया कि आँच का ध्यान रखो, लेकिन तुम्हारी भाभी को अपनी मनमर्ज़ी करने की आदत है। अब भुगतो कच्चा खाकर।"

अंकिता का दिल छलनी हो गया। जिस बात का हुक्म सासू माँ ने खुद दिया था, अब उस पर भी सारा दोष उसी के सिर मढ़ दिया गया था। वह चाहती तो कह सकती थी कि 'माँ जी, आपने ही तो जल्दी निकालने को कहा था', लेकिन उसने घर की शांति की खातिर खामोश रहना ही बेहतर समझा।

मयंक ने रसोई में जाकर जब झाँका, तो उसे दूसरे डिब्बे में रखे हुए गहरे सुनहरे और खस्ता समोसे दिख गए। उसने एक उठाया, खाया और चिल्ला उठा, "अरे वाह! ये वाले समोसे तो गज़ब के बने हैं! एकदम कुरकुरे!" मयंक और सुमित ने मिलकर वे सारे बढ़िया सिके हुए समोसे चट कर दिए।

थोड़ी देर बाद अंकिता जब रसोई में पानी पीने गई, तो उसने देखा कि सासू माँ दबे पाँव रसोई में आकर डिब्बे टटोल रही थीं। वे अपने लिए वही कुरकुरे और बढ़िया समोसे ढूँढने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन अंकिता ने पहले ही समझदारी दिखाते हुए उन कम सिके, मुलायम समोसों को एक अलग बर्तन में निकालकर ढक दिया था। उसने मन ही मन सोच रखा था कि इन्हें शाम को दोबारा हल्की आँच पर सेककर या तो चाय के साथ गली के उन बच्चों को बाँट देगी जो दिवाली पर पटाखे माँगने आते हैं, ताकि अन्न का अपमान भी न हो और किसी का पेट भी भर जाए।

जब सासू माँ को डिब्बे में कोई बढ़िया समोसा नहीं मिला, तो वे झेंप गईं। उन्होंने अंकिता को देख लिया था।

अंकिता ने बिना किसी कड़वाहट के, एक प्लेट में दो कम सिके समोसे लिए और गैस जलाकर उन्हें धीमी आँच पर दोबारा बहुत करीने से सुनहरा और कुरकुरा सेंक दिया। फिर उसने एक कप अदरक की गरमा-गरम चाय बनाई और प्लेट सासू माँ की तरफ बढ़ाते हुए बड़े आदर से कहा,

"माँ जी, आप दोपहर से बहुत थक गई होंगी। आपने सिखाया तभी तो मैं समोसे बना पाई। वो जो कम सिके रह गए थे, उन्हें मैंने दोबारा धीमी आँच पर सेंक दिया है, अब ये बिल्कुल कुरकुरे हो गए हैं। आप चाय के साथ खाकर देखिए।"

राजेश्वरी देवी ने अंकिता की ओर देखा। उन्हें उम्मीद थी कि बहू उनके तानों के बाद मुँह फुलाकर बैठेगी या सुमित से उनकी शिकायत करेगी। लेकिन अंकिता के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी; वहाँ सिर्फ सेवा, संस्कार और एक गहरी समझदारी थी।

राजेश्वरी देवी ने काँपते हाथों से समोसा उठाया और चाय की चुस्की ली। समोसा वाकई बहुत स्वादिष्ट और कुरकुरा था, लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा मिठास अंकिता के व्यवहार में थी।

उस पल राजेश्वरी देवी के भीतर का सारा कठोर अहंकार पिघलकर पानी हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि जिस लड़की को वे हर समय नीचा दिखाने की कोशिश करती रहीं, उसने न सिर्फ उनके घर की मर्यादा को संभाला, बल्कि उनके मान को भी चोट नहीं पहुँचने दी। उसने अपनी हार में भी परिवार की जीत ढूँढ ली थी।

राजेश्वरी देवी की आँखों के कोरों से दो बूँद आँसू छलक पड़े। उन्होंने अंकिता का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।

"बहू... मुझे माफ़ कर दे," राजेश्वरी देवी का गला रुंध गया। "मैं हमेशा सोचती थी कि शहर की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ सिर्फ हुक्म चलाना जानती हैं, रिश्ते निभाना नहीं। लेकिन आज तूने मुझे गलत साबित कर दिया। तूने न सिर्फ समोसे की कसर पूरी कर दी, बल्कि मेरे बिगड़े हुए स्वभाव को भी अपने प्यार से सँवार दिया। विश्वनाथ जी सच कहते थे, तू सचमुच इस घर की अनमोल लक्ष्मी है।"

अंकिता ने झुककर सासू माँ के चरण छू लिए। कमरे के बाहर खड़े विश्वनाथ जी और सुमित के चेहरों पर एक गहरी, सुकून भरी मुस्कान फैल गई। दिवाली के दीये जलने से पहले ही उस घर में आपसी समझ, सम्मान और प्रेम का एक ऐसा पावन उजाला फैल चुका था, जिसे कभी कोई ग़लतफ़हमी बुझा नहीं सकती थी।

प्रिय पाठकों,

क्या एक नई बहू को परखने के लिए केवल रसोई और परंपराओं को ही आधार बनाना सही है? क्या परिवार के बड़ों को बहू की छोटी-मोटी गलतियों को तानों के बजाय प्यार और मार्गदर्शन से नहीं सुधारना चाहिए? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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