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फर्ज के सिक्के और प्रेम का मोल

अभिषेक अपने कांच के बड़े से केबिन में बैठा लैपटॉप की स्क्रीन पर उंगलियां दौड़ा रहा था। तिमाही समीक्षा की रिपोर्ट तैयार करनी थी और कंपनी के सीईओ के साथ शाम को एक बड़ी बैठक तय थी। गुरुग्राम की उस बहुमंजिला इमारत की बाईसवीं मंजिल से नीचे की सड़कें चींटियों की कतार जैसी नजर आ रही थीं। ठीक उसी वक्त उसकी डेस्क पर रखा फोन थरथराने लगा। स्क्रीन पर बड़े अक्षरों में 'बाबूजी' चमक रहा था। अभिषेक ने एक नज़र फोन को देखा और माथे पर गहरी शिकन के साथ नज़रें फेर लीं। काम का दबाव इतना था कि किसी भी बाहरी दखल से उसका पारा चढ़ जाता। फोन की घंटी बजी और कट गई, लेकिन अगली ही सांस में वह फिर से बजने लगा।


अभिषेक ने झुंझलाकर फोन उठाया और बिना किसी औपचारिकता के बोला, "हाँ बाबूजी, बोलिए क्या बात है? आप जानते हैं न कि इस समय मैं ऑफिस में कितना व्यस्त रहता हूँ? क्या कोई बहुत ज़रूरी काम है?"


दूसरी तरफ कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। फिर एक बहुत ही धीमी, झिझक से भरी आवाज़ उभरी, "अभि, बेटा... डिस्टर्ब तो नहीं करना चाहता था। वो बस... घर का बोरवेल का पंप खराब हो गया है। तीन दिन से पानी नहीं आ रहा। बाल्टी भर-भरकर पड़ोस से लाना पड़ रहा है। मिस्त्री बोला है कि मोटर जल गई है, नई लगानी पड़ेगी।"


अभिषेक ने अपनी रिवाल्विंग चेयर को पीछे की तरफ घुमाया और लंबी सांस खींची। "बाबूजी, हद है! अभी दस दिन पहले ही तो मैंने आपको घरेलू खर्चों के लिए बीस हजार रुपये ट्रांसफर किए थे। इतनी जल्दी वो पैसे खत्म भी हो गए? हर महीने कोई न कोई नई आफत आ जाती है। कभी बिजली का तार बदलवाना है, कभी सीलन आ गई है। मुझे समझ नहीं आता कि लखनऊ के उस छोटे से घर में इतना खर्च कहाँ से निकल आता है?"


"बेटा, वो पैसे... तुम्हारी अम्मा के घुटनों का इंजेक्शन लगना था, उसमें चले गए। बाकी कुछ राशन का बिल था..." पिता की आवाज़ में एक अजीब सी विवशता थी।


"ठीक है बाबूजी, मैं शाम तक ऑनलाइन कुछ और भेज दूंगा। अभी प्लीज मुझे काम करने दीजिए, मेरा एक बड़ा क्लाइंट बैठा है।" अभिषेक ने पिता की पूरी बात सुने बिना ही लाल बटन दबा दिया।


फोन काटने के बाद भी अभिषेक का मन शांत नहीं हुआ। उसे ऐसा लगा जैसे वह अपने परिवार के लिए सिर्फ एक चलता-फिरता एटीएम बनकर रह गया है। कॉर्पोरेट दुनिया की अंधी दौड़, ईएमआई का दबाव, बच्चे की इंटरनेशनल स्कूल की भारी फीस और जीवनशैली के खर्चों के बीच जब भी घर से फोन आता, तो बात सीधे पैसों पर ही खत्म होती। अभिषेक को लगता था कि रिटायरमेंट के बाद छोटे शहर में रहने वाले माता-पिता यह बात नहीं समझ पाते कि महानगरों में कॉर्पोरेट की नौकरी में खून-पसीना एक करके पैसा कमाना कितना कठिन होता है।


रात को करीब नौ बजे जब वह थका-हारा अपने फ्लैट पर लौटा, तो उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। उसने अपना लैपटॉप बैग सीधे डाइनिंग टेबल पर पटका और सोफे पर गिर सा पड़ा। उसकी पत्नी, अंकिता, रसोई से निकलकर आई और उसने पानी का गिलास आगे बढ़ाया। पति के चेहरे के बदलते भावों को पढ़ना अंकिता के लिए मुश्किल नहीं था।


"आज फिर ऑफिस में कोई समस्या हुई क्या, अभिषेक?" अंकिता ने प्यार से उसके बाल सहलाते हुए पूछा।


"ऑफिस तो छोड़ो अंकिता, घर से बाबूजी का फोन था," अभिषेक ने एक ही घूंट में पानी खत्म करते हुए कहा। "मुझे तो समझ ही नहीं आता कि उनकी जरूरतें कभी खत्म क्यों नहीं होतीं। हर महीने मैं नियम से पैसे भेजता हूँ, फिर भी हर पखवाड़े कोई नया बिल तैयार रहता है। आज मोटर जल गई, कल छत टपक रही थी, परसों किसी की शादी थी। कभी उन्होंने फोन करके यह नहीं पूछा कि बेटा तू इतनी देर रात तक काम करता है, तेरी तबीयत कैसी है? बस पैसे भेज दो, यही एक काम रह गया है मेरा।"


अंकिता ने कुछ देर तक अभिषेक के तनाव से भरे चेहरे को देखा, फिर धीरे से बोली, "अभिषेक, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि वे सिर्फ पैसों के लिए फोन करते हैं? क्या तुमने कभी खुद से यह सवाल पूछा है कि पिछली बार तुमने अपने बाबूजी या अम्मा से सिर्फ यह पूछने के लिए कब बात की थी कि वे कैसे हैं? जब भी फोन बजता है, तुम या तो काट देते हो या फिर सीधे पूछते हो कि कितने पैसे चाहिए। जब संवाद का रास्ता ही सिर्फ जरूरतों से होकर गुजरेगा, तो तुम्हें यही महसूस होगा न।"


अभिषेक ने कोई जवाब नहीं दिया। वह टीवी की काली स्क्रीन को घूरता रहा।


अंकिता ने बात आगे बढ़ाई, "इस शुक्रवार को बुद्ध पूर्णिमा की छुट्टी है और आगे वीकेंड। पूरे तीन दिन मिलेंगे। चलो, हम सब लखनऊ चलते हैं। वैसे भी बिटिया परी को अपने दादा-दादी से मिले लगभग एक साल हो गया है। वहां चलकर खुद देख लेते हैं कि मोटर की क्या समस्या है और घर की क्या हालत है।"


अभिषेक ने अनमने ढंग से सहमति में सिर हिला दिया। उसके मन में यह बात बैठ चुकी थी कि वह लखनऊ जाकर अपने पिता को दो टूक समझाएगा कि वे अपने खर्चों पर लगाम लगाएं और हर छोटी-बड़ी बात के लिए उस पर निर्भर रहना बंद करें।


शुक्रवार की सुबह वे अपनी एसयूवी से लखनऊ के लिए रवाना हुए। यमुना एक्सप्रेसवे से होते हुए जब दोपहर बाद उनकी गाड़ी लखनऊ के पुराने मोहल्ले की संकरी गली में मुड़ी, तो अभिषेक को अपने बचपन की यादें छूकर गुजरीं। लेकिन जैसे ही गाड़ी उनके पैतृक घर के सामने रुकी, अभिषेक का दिल थोड़ा बैठ गया।


घर का मुख्य लोहे का गेट, जिस पर कभी हरा चमकदार पेंट हुआ करता था, अब जंग की मोटी परत से ढका हुआ था। आंगन में लगी तुलसी की क्यारी सूखी हुई थी और वहां रखे गमलों की मिट्टी सूखकर दरक चुकी थी। गाड़ी का हॉर्न सुनते ही एक दुबले-पतले, सफेद बालों वाले बुजुर्ग चप्पल घसीटते हुए बाहर आए। वह बाबूजी थे। उनकी रीढ़ की हड्डी में हल्का सा झुकाव आ गया था और आंखों पर चढ़ा पुराना चश्मा एक तरफ से धागे से बंधा हुआ था।


"अरे! तुम लोग अचानक? बताया भी नहीं बेटा!" बाबूजी के चेहरे पर जो असीम खुशी और हैरानी की चमक उभरी, उसने दोपहर की सारी थकान मिटा दी। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर परी को अपनी बांहों में भरने की कोशिश की, लेकिन घुटनों के दर्द की वजह से हल्का सा कराह कर रुक गए।


अंदर से अम्मा भी लाठी टेकते हुए आ गईं। "मेरा बच्चा आ गया!" अम्मा ने अभिषेक के माथे को चूमा तो उनकी हथेलियों का खुरदरापन अभिषेक के गालों पर चुभा।


घर के अंदर कदम रखते ही अभिषेक ने महसूस किया कि घर का वातावरण कितना बदल चुका था। बैठक के पुराने पंखे से घुर-घुर की तेज आवाज आ रही थी और वह बहुत धीमी गति से घूम रहा था। जिस सोफे पर वह बैठा, उसका कपड़ा कई जगहों से घिस चुका था। सामने की दीवार पर सीलन के गहरे धब्बे थे, जिनका प्लास्टर झड़-झड़कर फर्श पर गिर रहा था। रसोई से अम्मा के खांसने की आवाज आ रही थी क्योंकि एग्जॉस्ट फैन बंद पड़ा था।


शाम को जब चाय की मेज सजी, तो अभिषेक ने मौका देखकर बात शुरू की। "बाबूजी, मैंने जो पैसे भेजे थे, उनसे यह मोटर ठीक क्यों नहीं हुई? और घर की यह हालत क्यों हो रखी है? ऐसा लगता है जैसे बरसों से यहां किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।"


बाबूजी ने अपनी चाय का कप नीचे रखा। उनकी आंखों में एक अजीब सा संकोच तैर गया। "बेटा, मोटर बनवाने वाला आया था। उसने कहा कि बोरिंग में ही कचरा आ गया है, बड़ा खर्च होगा। मैंने सोचा कि अभी बाल्टी से पानी खींचकर काम चला लेते हैं, जब तुम्हारे पास सहूलियत होगी तब करवा लेंगे।"


"सहूलियत की क्या बात है बाबूजी? मैं तो पैसे भेज ही रहा हूँ। पर मुझे यह समझ नहीं आता कि वो पैसे जाते कहाँ हैं?" अभिषेक का स्वर थोड़ा तीखा हो गया।


तभी अम्मा ने धीरे से टोकते हुए कहा, "बेटा, तू अपने पिता पर नाराज मत हो। तेरे बाबूजी अपने ऊपर एक धेला भी खर्च नहीं करते। पिछले महीने जो पैसे तूने भेजे थे, उनमें से आधा पैसा तो हमारे पुराने नौकर रामू की बेटी की शादी में चला गया। उसकी नौकरी छूट गई थी और घर में खाने के लाले थे। तेरे पिता ने कहा कि इंसानियत पहले है।"


अभिषेक ने माथा पकड़ लिया। "यही तो मेरी शिकायत है! आप लोग अपनी हैसियत और अपनी जरूरतें भूलकर दुनिया की भलाई करने निकल पड़ते हैं। यहां घर की दीवारें गिर रही हैं, मोटर बंद पड़ी है, और आप दूसरों की शादियों में पैसे बांट रहे हैं।"


बाबूजी ने सिर झुका लिया, उनके पास बेटे के इस व्यावहारिक तर्क का कोई जवाब नहीं था। रात का खाना भारी मन से खाया गया। माहौल में एक अनकहा तनाव घुल चुका था।


अगली सुबह अभिषेक ने फैसला किया कि वह खुद बाजार जाएगा और मोटर तथा बिजली के सामान का इंतजाम करेगा। उसने बाबूजी से कहा, "चलिए बाबूजी, मेरे साथ चलिए। आप मुझे उस दुकान पर ले चलिए जहां से आप घर का सामान लेते हैं।"


दोनों पिता-पुत्र पैदल ही पास के बाजार की ओर निकले। अभिषेक तेज कदमों से चल रहा था, जबकि बाबूजी को अपनी सांसें संभालते हुए उनके साथ चलने के लिए लगभग दौड़ना पड़ रहा था। अभिषेक ने देखा कि बाबूजी की चमड़े की चप्पल पीछे से घिसकर बिल्कुल पतली हो चुकी थी और उनका कुर्ता भी कॉलर के पास से हल्का सा फटा हुआ था।


बाजार में बिजली की बड़ी दुकान पर जब वे पहुंचे, तो दुकानदार ने बाबूजी को देखते ही हाथ जोड़े, "अरे मास्टर साहब! प्रणाम। आज बहुत दिनों बाद बाजार की तरफ निकले? सब खैरियत?"


बाबूजी ने मुस्कुराकर कहा, "हाँ रमेश, आज मेरा बेटा आया है दिल्ली से। बहुत बड़ी कंपनी में डायरेक्टर है।" बाबूजी के चेहरे पर वह गर्व देखकर दुकानदार भी प्रभावित हुआ।


"अरे वाह भइया! मास्टर साहब तो जब भी आते हैं, बस आपके ही चर्चे रहते हैं। बताते रहते हैं कि कैसे उनके बेटे ने अपनी मेहनत से इतना बड़ा मुकाम हासिल किया है। पूरे मोहल्ले में आपकी ही मिसाल देते हैं," दुकानदार ने श्रद्धा से कहा।


अभिषेक चुपचाप सुनता रहा। जिस पिता को वह घर में अपनी शिकायतों का कटघरा समझ रहा था, वह पिता बाहर की दुनिया में अपने बेटे की सफलताओं का ताज पहनकर घूम रहा था।


सामान लेने के बाद जब वे लौट रहे थे, तो रास्ते में एक दवा की दुकान पड़ी। बाबूजी वहां एक पल के लिए ठिठके।


"क्या हुआ बाबूजी?" अभिषेक ने पूछा।


"बेटा, वो... दो मिनट रुकना। तुम्हारी अम्मा की दर्द की दवा और मेरी बीपी की गोली लेनी थी। चार दिन पहले खत्म हो गई थीं," बाबूजी ने बहुत झिझकते हुए कहा।


अभिषेक सन्न रह गया। "चार दिन से दवा खत्म थी? तो आपने ली क्यों नहीं? और मुझे फोन पर क्यों नहीं बताया?"


बाबूजी ने अपनी नजरें सड़क की धूल पर टिका दीं। उनकी उंगलियां अपने पुराने, मुड़े-तुड़े कुर्ते की जेब को टटोलने लगीं। "बेटा, तू जब भी फोन उठाता है, बहुत गुस्से में होता है। तू कहता है कि ऑफिस का बहुत काम है, खर्चे बहुत हैं। मुझे लगा कि दो-चार दिन बाद जब तू शांत होगा या जब खुद फोन करेगा, तब बोल दूंगा। मेडिकल वाले का पिछला हिसाब भी बाकी था, तो बिना पैसे के जाना अच्छा नहीं लगा।"


यह सुनकर अभिषेक के पैरों के नीचे से जैसे जमीन ही सरक गई। जिस पिता ने अपनी पूरी जवानी उसकी एक-एक ख्वाहिश को पूरा करने में लगा दी थी, आज वही पिता चार दिन से बिना जरूरी दवाइयों के सिर्फ इसलिए जी रहा था ताकि बेटे को उसका फोन एक बोझ न लगे। उसे वह दिन याद आ गया जब कॉलेज के दिनों में उसे एक महंगे लैपटॉप की जरूरत थी। तब बाबूजी ने अपनी प्रोविडेंट फंड की बचत से बिना एक पल सोचे उसे लैपटॉप दिलवाया था, और खुद दो साल तक वही पुराना स्वेटर पहनकर सर्दियों में साइकिल से स्कूल पढ़ाने जाते रहे थे।


अभिषेक ने बिना कुछ बोले मेडिकल स्टोर पर जाकर पूरे तीन महीने की दवाइयां खरीदीं और दुकानदार का पिछला सारा बकाया चुकता किया। घर लौटते हुए पूरे रास्ते उसके गले में एक अजीब सा फंदा फंसा रहा।


दोपहर में जब सब आराम कर रहे थे, तो अभिषेक चुपचाप घर के पिछले हिस्से में बने बाबूजी के छोटे से अध्ययन कक्ष में गया। वहां मेज पर धूल जमी थी। मेज की दराज हल्की सी खुली हुई थी। अभिषेक ने जैसे ही उसे खोला, उसकी नजर बाबूजी की पुरानी डायरी पर पड़ी। पन्ने पलटते हुए उसने देखा कि उसमें किसी बड़े खर्च का हिसाब नहीं था। उसमें लिखा था:

'अभिषेक की स्कूल फीस - 1200'

'अभिषेक के नए जूते - 800'

'अभिषेक की कोचिंग - 3000'

और डायरी के आखिरी पन्ने पर एक छोटी सी पर्ची चिपकी हुई थी, जिस पर बाबूजी की कांपती लिखावट में दर्ज था:

'बेटे का भेजा हुआ पैसा: 20,000


  • अम्मा के घुटने का इलाज: 9,000


  • बिजली का बिल: 4,200


  • मोहल्ले के अनाथ बच्चे की स्कूल फीस: 2,500


  • घर का राशन: 4,000

  • बाकी बचा: शून्य।

  • (नोट: मेरी बीपी की दवा अगले महीने बेटे के पैसे आने पर लूंगा, अभी काम चल जाएगा।)'


उस पन्ने पर आंसुओं की एक पुरानी बूंद सूखी हुई थी। उस कागज के टुकड़े ने अभिषेक के अहंकार, उसकी तथाकथित कॉर्पोरेट समझदारी और उसके सारे तर्कों की धज्जियां उड़ा दी थीं। उसके पिता कोई लापरवाह इंसान नहीं थे, वे तो आज भी उसी त्याग की भट्टी में जल रहे थे जिसमें उन्होंने अपने बेटे का भविष्य गढ़ा था। फर्क सिर्फ इतना था कि तब वे अपने बेटे के लिए त्याग करते थे, और आज वे अपने बेटे के गुस्से और चिढ़ से बचने के लिए खुद की तकलीफों का घूंट पी रहे थे।


अभिषेक के हाथों से डायरी छूट गई और वह वहीं कुर्सी पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा।


तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने मुड़कर देखा तो अंकिता खड़ी थी। उसकी आंखों में भी आंसू थे।


"अभिषेक, माता-पिता कभी अपने बच्चों पर बोझ नहीं होते। वे तो वह मजबूत नींव होते हैं जिन पर हमारी सफलता की इमारत खड़ी होती है। जब हम बड़े हो जाते हैं, तो हमें लगता है कि हम उन्हें पाल रहे हैं क्योंकि हम उनके बैंक खाते में कुछ हजार रुपये डाल देते हैं। लेकिन सच तो यह है कि उन्होंने हमें पालने के लिए अपनी पूरी जिंदगी, अपने सपने और अपना मान-सम्मान तक न्योछावर कर दिया। उन्हें तुम्हारे पैसों से ज्यादा तुम्हारे समय, तुम्हारी मीठी आवाज और तुम्हारे सम्मान की जरूरत है।"


अभिषेक उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी आंखें पोंछीं। उसके भीतर का अंधकार अब पूरी तरह छंट चुका था।


वह सीधे बैठक में गया जहाँ बाबूजी तकिए के सहारे लेटे हुए अखबार पढ़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन टूटे हुए चश्मे की वजह से बार-बार आंखें मल रहे थे। अभिषेक चुपचाप जाकर फर्श पर बाबूजी के पैरों के पास बैठ गया।


बाबूजी हड़बड़ाकर उठने लगे, "अरे बेटा, क्या हुआ? नीचे क्यों बैठ गए? कोई परेशानी है?"


अभिषेक ने बाबूजी के पैरों को थाम लिया और अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया। उसके आंसुओं से बाबूजी का पाजामा भीगने लगा। "मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी... मुझे माफ कर दीजिए। मैं इतना अंधा हो गया था कि पैसों के घमंड में यह भूल गया कि मेरी असली दौलत आप दोनों हैं। मैं आपको पैसे तो भेजता रहा, लेकिन कभी बेटा बनकर आपके पास नहीं आया। मैं अपनी जिम्मेदारियों को अहसान समझने लगा था।"


बाबूजी का गला भर आया। उन्होंने कांपते हाथों से अभिषेक के सिर को ऊपर उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। "अरे पगले, तू रोता क्यों है? माता-पिता कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं होते। तू खुश रहे, तरक्की करे, हमारे लिए तो बस यही सबसे बड़ी दवा है।"


कमरे के दरवाजे पर खड़ी अम्मा और अंकिता की आंखों से भी खुशी के आंसू बह रहे थे। घर की दीवारें भले ही पुरानी थीं, लेकिन उस पल उस घर की हवाओं में एक ऐसा अपनापन घुल गया जिसने बरसों की दूरियों को एक झटके में मिटा दिया।


अगले दो दिनों में अभिषेक ने घर का पूरा नक्शा बदल दिया। उसने कारीगरों को बुलाकर बोरवेल की नई मोटर लगवाई, घर की सीलन वाली दीवारों की मरम्मत का काम शुरू करवाया और अम्मा और बाबूजी दोनों को शहर के सबसे अच्छे अस्पताल ले जाकर उनका पूरा चेकअप करवाया। बाबूजी के लिए नया चश्मा बना और अम्मा के लिए आरामदायक व्हीलचेयर मंगवाई गई ताकि वे आसानी से धूप में बैठ सकें।


रविवार की शाम जब वापसी का समय आया, तो माहौल बिल्कुल अलग था। आंगन का सूखापन दूर हो चुका था, नए पौधों के गमले सज चुके थे। अभिषेक ने अपनी जेब से एक चेकबुक या फोन निकालने के बजाय बाबूजी के हाथ में एक छोटी सी डायरी थमा दी।


"यह क्या है बेटा?" बाबूजी ने पूछा।


"बाबूजी, यह आपकी जिम्मेदारियों की डायरी नहीं है। इसमें मैंने एक नया संयुक्त बैंक खाता खोला है, जिसका डेबिट कार्ड आपके पास रहेगा। आपको मोहल्ले में किसी की मदद करनी हो, घर में कुछ बनवाना हो, या अम्मा के लिए कुछ लाना हो—आपको कभी किसी से मांगने या सोचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। और सबसे जरूरी बात..." अभिषेक ने मुस्कुराते हुए बाबूजी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए, "...अब से रोज रात को नौ बजे मेरा फोन आएगा। और अगर मैं भूल जाऊं, तो आप बिना झिझके मुझे डांटकर फोन कर सकते हैं। अब हमारा रिश्ता सिर्फ जरूरतों का नहीं, हमारे हक का होगा।"


बाबूजी ने नम आंखों से मुस्कुराते हुए अभिषेक की पीठ थपथपाई।


जब गाड़ी धीरे-धीरे गली से बाहर निकली, तो अभिषेक ने पीछे मुड़कर देखा। बाबूजी और अम्मा गेट पर खड़े होकर हाथ हिला रहे थे। बाबूजी की आंखों पर नया चश्मा चमक रहा था और अम्मा के चेहरे पर एक निश्चिंतता भरी मुस्कान थी। अभिषेक ने एक गहरी और सुकून भरी सांस ली। आज कई सालों बाद उसका दिल हल्का था। उसने समझ लिया था कि बैंक बैलेंस कितना भी बढ़ जाए, असली सुकून अपनों के चेहरे की मुस्कान और उनके आशीर्वाद में ही मिलता है।


माता-पिता की उम्र जब ढलने लगती है, तो वे बच्चों की डांट और उपेक्षा से ठीक वैसे ही डरने लगते हैं जैसे कभी बचपन में हम उनकी डांट से डरा करते थे। क्या कभी आपने अपने व्यस्त जीवन में ठहरकर यह सोचा है कि आपके माता-पिता आपकी किस मजबूरी को अपनी चुप्पी बनाकर जी रहे हैं? अपने बुजुर्ग माता-पिता के प्रति अपनी भावनाओं और अनुभवों को कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।


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